विपक्षियों के ‘रिजीम चेंज’ वाले एजेंडा से क्या देश की राजनीति का भला हो पाएगा?
विपक्षियों के ‘रिजीम चेंज’ वाले एजेंडा से क्या देश की राजनीति का भला हो पाएगा?
"इस देश में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने एक लंबे कालखंड तक शासन किया, लेकिन जिस तरह से अराजक तत्वों को बढ़ावा मिला, नक्सलियों और आतंकियों को संरक्षण मिले, अंडरवर्ल्ड को शह मिला, इस्लामिक चरमपंथियों को बढ़ावा मिला, उससे आमलोगों के मनोस्तिष्क में यह बात घर कर गई कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल हिन्दू विरोधी राजनीति कर रहे हैं!"
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
अमेरिकी इशारे पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का ‘रिजीम चेंज’ वाला एजेंडा (प्रशांत भूषण के शब्दों में), इस हेतु ‘ वामपंथी अर्बन नक्सलियों’ की बढ़ती सक्रियता और इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में हांफती दिल्ली की विधि-व्यवस्था से सीधा सवाल उठता है कि क्या ऐसी राजनीति से देश का भला हो पाएगा?
इस देश में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने एक लंबे कालखंड तक शासन किया, लेकिन जिस तरह से अराजक तत्वों को बढ़ावा मिला, नक्सलियों और आतंकियों को संरक्षण मिले, अंडरवर्ल्ड को शह मिला, इस्लामिक चरमपंथियों को बढ़ावा मिला, उससे आमलोगों के मनोस्तिष्क में यह बात घर कर गई कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल हिन्दू विरोधी राजनीति कर रहे हैं!
परिणाम यह हुआ कि लोगों ने 2014 में देश की सत्ता पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा को सौंप दी। फिर क्या था, इन सबों को सांप सूंघ गया। उधर, सत्ता मिलने के बाद मोदी-शाह की टीम ने जो क्रमबद्ध रूप से सुधार दर सुधार किए और हिन्दू हित के कार्य किए, उससे सबको लाभ मिला। सरकार ने हर वर्ग के लिए लाभकारी योजना चलाई। उससे न केवल एनडीए को मजबूती मिली, बल्कि 2019 और 2024 में भी मोदी सरकार केंद्र में पूरे दमखम के साथ लौटी। विभिन्न प्रदेशों में भी भाजपा या एनडीए की सरकार बनी।
मोदी सरकार ने अपनी स्वतंत्र वैश्विक कूटनीति और निष्पक्ष घरेलू नीति को इतना कारगर बनाया कि देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा या एनडीए की सरकार बन चुकी है। विगत दस-बारह वर्षों में भारत की आशातीत प्रगति को देखकर उसके 'तथाकथित' मित्र अमेरिका के पेट में मरोड़े लेने लगे, उसने मोदी सरकार को अस्थिर करने के लिए एक से बढ़कर एक षड्यंत्र रचे, सार्वजनिक बयान दिए, जॉर्ज सोरोस को लगाया, ईसाई मिशनरियों को लगाया, लेकिन मोदी की फौलादी सरकार ने सबको विफल कर दिया।
भारत के नेता प्रतिपक्ष और कुछ अन्य विपक्षी सांसदों का जो आचरण है, वह हमारी संसदीय विफलता की कहानी कहने को काफी है। यदि कोई विदेशी एजेंट या अर्बन नक्सलियों का संरक्षक संसद सदस्य होने के नाते पुलिस कार्रवाई से बच निकलता हो तो ऐसे देश का पतन देर-सबेर सुनिश्चित है। कानूनी एजेंसियों को चाहिए कि विदेशी तत्वों, अपराधी तत्वों से मिला हुआ कोई भी जनप्रतिनिधि हो, जांच में सबूत मिलते ही अविलंब उसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए और जेल में डाल देना चाहिए, अन्यथा राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ होते रहेंगे, जो देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण सियासी स्थिति है।
लिहाजा, यह सवाल केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की दिशा, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून के शासन और राजनीतिक जवाबदेही का भी है। इस बहस में तीन अलग-अलग प्रश्नों को समझना जरूरी है। पहला, क्या सरकार बदलने की कोशिश और शासन-व्यवस्था में बदलाव की मांग को एक ही नजर से देखा जाना चाहिए? दूसरा, भाजपा नेता ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में करते हैं, वह कितना तथ्यात्मक है और कब वह राजनीतिक आरोप बन जाता है? तीसरा, यदि कानून-व्यवस्था कमजोर पड़ती है, तो उसकी जवाबदेही किसकी है—केंद्र सरकार, राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन या राजनीतिक नेतृत्व की?
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग वैध है, लेकिन हिंसा, गैरकानूनी गतिविधियों और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोपों की जांच ठोस साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। इसी कसौटी पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को परखा जाना चाहिए।
सीधा सवाल है कि मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि क्या है? 16 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर शुरू हुई राजनीतिक बहस अब ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता-व्यवस्था में परिवर्तन की मांग तक पहुंच गई है। यही वजह है कि भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि विपक्ष के कुछ नेताओं और प्रदर्शनकारियों की बयानबाजी लोकतांत्रिक विरोध से आगे जाकर सरकार को अस्थिर करने की दिशा में है। कुछ भाजपा नेताओं ने इसे बांग्लादेश जैसी घटनाओं से जोड़कर देखा है।
वहीं, विपक्ष और आंदोलन से जुड़े पक्षों का तर्क है कि मतदाता सूची की निष्पक्षता, चुनावी लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। सत्ता परिवर्तन की मांग अपने-आप में असंवैधानिक नहीं है। यहां मूल अंतर समझना जरूरी है, वह यह कि निर्वाचन के जरिए सरकार बदलना, सरकार के इस्तीफे की मांग करना और गैरकानूनी तरीकों से सत्ता पलटने की कोशिश करना—तीनों एक जैसी बातें नहीं हैं। किसी आंदोलन को तीसरी श्रेणी में रखने के लिए नारेबाजी या राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर प्रमाण देखना होगा।
जहां तक ‘अर्बन नक्सल’ की बहस की बात है तो सड़कों पर जो कुछ दिखाई दिया, वह राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आंदोलन कम, लक्षित गुंडागर्दी करने वाले लोगों का हुजूम ज्यादा दिखा। इन लोगों ने दिल्ली पुलिस की पुरुष और महिला जवानों पर हमले किए। लिहाजा राष्ट्रीय सुरक्षा या राजनीतिक आरोप, इन बातों को कानून की कसौटी पर कसकर देखना होगा। दरअसल ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए राजनीतिक विमर्श में किया जाता है जिन पर शहरी क्षेत्रों में माओवादी विचारधारा या गतिविधियों को समर्थन देने का आरोप लगाया जाता है। लेकिन यह शब्द अपने-आप में किसी व्यक्ति के अपराध का कानूनी प्रमाण नहीं है।
इस विषय पर तीन कसौटियां जरूरी हैं: एक, राष्ट्रीय सुरक्षा: यदि किसी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ हिंसक गतिविधियों, प्रतिबंधित संगठनों से संबंधों या गैरकानूनी साजिश के प्रमाण हों, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। दो, असहमति का अधिकार: सरकार की आलोचना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, पत्रकारिता और नीतिगत विरोध को केवल असहमति के आधार पर अपराध नहीं माना जाना चाहिए। तीन, निष्पक्ष जांच: आरोपों की जांच साक्ष्यों, उचित कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा के आधार पर होनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर वर्णित संवैधानिक व्यवस्था स्वतंत्र न्यायपालिका, मौलिक अधिकारों और कानून के शासन को लोकतंत्र के बुनियादी तत्वों में रखती है। इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि किसी राजनीतिक विरोधी को कौन-सा विशेषण दिया जाए, बल्कि यह है कि उसके विरुद्ध आरोपों के समर्थन में प्रमाण क्या हैं और कानून का पालन किस तरह किया जा रहा है।
दिल्ली के विभिन्न धरना प्रदर्शन के दौरान यह महसूस किया कि क्या दिल्ली की विधि-व्यवस्था हांफ रही है? यह गंभीर सवाल है, लेकिन इसका उत्तर केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं मिल सकता। इसके लिए अपराध के आंकड़े, जांच की गुणवत्ता, अदालतों में लंबित मामलों, दोषसिद्धि, पुलिस की जवाबदेही और नागरिकों की सुरक्षा जैसे संकेतकों को देखना होगा।
भारत के गृह मंत्रालय के अनुसार, पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था मुख्यतः राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अपराध रोकना, जांच करना और अभियोजन चलाना राज्यों की प्राथमिक जिम्मेदारी है; केंद्र सरकार सहायता और समन्वय करती है। इसका अर्थ है कि विधि-व्यवस्था की विफलता का आकलन करते समय यह भी देखना होगा कि संबंधित घटना किस राज्य में हुई, प्रशासन ने क्या कदम उठाए और न्यायिक प्रक्रिया कहां तक पहुंची।
अब कसौटी और जवाबदेही का सवाल की चर्चा करते हैं:-
एक, अपराध नियंत्रण- क्या पुलिस समय पर कार्रवाई कर रही है? दो, राजनीतिक हिंसा- क्या सभी पक्षों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होती है? तीन, न्यायिक प्रक्रिया- क्या जांच और सुनवाई समयबद्ध हैं? चार, नागरिक स्वतंत्रता- क्या शांतिपूर्ण विरोध की अनुमति है? पांच, राष्ट्रीय सुरक्षा- क्या हिंसक या गैरकानूनी गतिविधियों के खिलाफ प्रमाण-आधारित कार्रवाई होती है?
गंभीर सवाल है कि क्या ऐसी राजनीति से देश का भला हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर राजनीतिक दलों के इरादों के अनुमान से नहीं, बल्कि उनके आचरण और परिणामों से तलाशना चाहिए। यदि राजनीति का केंद्र केवल सत्ता गिराना, विरोधियों को बदनाम करना और संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ाना बन जाए, तो शासन की वास्तविक समस्याएं पीछे छूट सकती हैं। दूसरी ओर, यदि सरकार हर आलोचना को देश-विरोधी गतिविधि बताने लगे, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
देशहित की राजनीति में इन बातों का महत्व है: एक, चुनावी निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों का पारदर्शी और प्रमाण-आधारित समाधान देना। दो, सत्ता परिवर्तन के लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक रास्तों का सम्मान करना। तीन, हिंसा और गैरकानूनी गतिविधियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करना। चार, पुलिस, चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना। पांच, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ठोस नीतिगत बहस करना।
वस्तुतः राष्ट्रहित की कसौटी पर होने वाली राजनीति से ही देश का भला हो सकता है। आज की बहस में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राजनीतिक आरोपों को प्रमाण न मान लिया जाए और लोकतांत्रिक विरोध को अपने-आप राष्ट्रविरोध न समझ लिया जाए। इसी तरह, विरोध के नाम पर हिंसा या गैरकानूनी गतिविधियों को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब विपक्ष सरकार को जवाबदेह बनाए, सरकार आलोचना का जवाब तथ्यों से दे, संस्थाएं निष्पक्ष रहें और कानून सब पर समान रूप से लागू हो। देश का भला किसी एक दल की राजनीतिक जीत से नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था से होगा जिसमें सत्ता भी जवाबदेह हो, विपक्ष भी जिम्मेदार हो और नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।
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