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भारत में सवर्ण विरोधी नीतियों को बढ़ावा देने से 'जातीय राष्ट्रवाद' को मिलेगा बल!

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भारत में सवर्ण विरोधी नीतियों को बढ़ावा देने से 'जातीय राष्ट्रवाद' को मिलेगा बल! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत में जड़ जमा चुकी जातीय सियासत से देर सबेर जातीय राष्ट्रवाद की भावना को बल मिलता प्रतीत होता है। यहां पर जिस तरह से दलित और ओबीसी नेताओं व उनके पिट्ठू बुद्धिजीवियों के द्वारा सवर्णों के खिलाफ सामाजिक विष-वमन जारी है, साहित्यिक और राजनीतिक प्रहार तेज किये जाने का प्रचलन बढ़ा है, सियासी रूप से सवर्णों को हाशिए पर धकेला जा रहा है, उनके बच्चों के लिए सरकारी शिक्षा और नौकरियों में निरंतर अवसर सीमित किये जा रहे हैं, उनको दलित-ओबीसी विरोधी कृत्य में फंसाने के लिए मजबूत कानून लाए जा रहे हैं, कतिपय दलित-ओबीसी अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से सवर्णों के खिलाफ कार्य किये जाते हैं, इन सब बातों से तो यही महसूस किया जाता है कि ऐसा सवर्ण विरोधी संवैधानिक व व्यवहारिक षड्यंत्र अपनी सारी हदें पार करता जा रहा है। लिहाजा सवर्णों की मजबूत प्रतिक्रियाएं भी स्वाभाविक हैं। यदि समय रहते भारतीय संसद और सुप्रीम कोर्ट नहीं चेता तो भारत में सवर...

अतीत के भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य से खिलवाड़ कबतक?

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अतीत में हुए भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य को कानूनी शिकंजे में कसना न्यायसंगतता का तकाजा नहीं? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अतीत के भेदभाव को आधार बनाकर सवर्ण समाज के वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को दंडित करने या आरक्षण जैसी नीतियों से बांधना न्यायसंगतता के सिद्धांतों के विरुद्ध प्रतीत होता है, क्योंकि यह व्यक्तिगत योग्यता को नजरअंदाज कर सामूहिक दोषारोपण करता है। इसलिए यक्ष प्रश्न है कि अतीत में हुए भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य को कानूनी शिकंजे में कसना दलित-ओबीसी नेतृत्व की न्यायसंगतता का तकाजा नहीं है! लिहाजा, उन्मुक्त हृदय से उनके मौजूदा प्रगतिशील नेताओं को गहराई पूर्वक विचार करना चाहिए और अपने पूर्वजों के प्रतिगामी नजरिए को बदलकर स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के राष्ट्रव्यापी लोकतांत्रिक भाव को मजबूत करना चाहिए। अन्यथा सामाजिक विघटन को परमाण्विक प्रक्रिया तेज होगी और इससे पैदा हुए जनविद्वेष की आग में देर-सबेर हरेक शांतिप्रिय लोगों के भी झुलसने का आसन्न खतरा बना रहेगा। ऐसा इसलिए कि यह नीतिगत, वैधानिक और रणनीतिक सवाल है जिसे कूटनीतिक स्व...

विकसित भारत के दृष्टिगत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मायने

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विकसित भारत के दृष्टिगत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मायने @ कमलेश पांडेय/ वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति को दर्शाता है, जिसमें वैश्विक चुनौतियों के बावजूद उच्च वृद्धि दर का अनुमान है। देखा जाए तो यह बजट 2026-27 से पहले नीतिगत दिशा तय करता है और विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों पर जोर देता है। यही वजह है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में वैसे नीतिगत सुधारों पर बल दिया गया है जो आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन और दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा दें। कहना न होगा कि ये सभी सुझाव वैश्विक चुनौतियों के बीच लचीलेपन और संरचनात्मक परिवर्तन पर केंद्रित हैं। जहां तक इस आर्थिक सर्वेक्षण की मुख्य विशेषताओं की बात है तो इस सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2026 के लिए जीडीपी वृद्धि 7.4% और जीवीए 7.3% का प्रथम अनुमान दिया गया है, जबकि एफ वाई (FY) 2027 के लिए 6.8-7.2% का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है। वहीं, निजी उपभोग (जीडीपी का 61.5%) और निवेश (30%) प्रमुख चालक हैं, साथ ही मुद्रास्फीति अप्रैल-दिसंबर 2025 में औसतन 1.7% रही। जबकि राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष (FY)...