संदेश

जुलाई 2, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

The Revolution of the Pen

चित्र
कलम की क्रांति (client=ca-pub-6262725213669814) @ कमलेश पांडेय/त्रिकालदर्शी कवि न तलवारों का शोर उठे, न नफ़रत का कोई नारा हो, भारत का हर जन सुरक्षित, न्याय ही हमारा सहारा हो। जो समाज को बाँटते फिरते, विष के बीज उगाते हैं, झूठ, छल और स्वार्थ के दम पर, अपनों को लड़वाते हैं। उनसे कहना, सत्य की लौ अब हर अंधियारा हर लेगी, जन-जन की जागी चेतना ही उनकी सत्ता छीन लेगी। हर क्रांति कलम से जन्मी है, इतिहास यही दोहराता है, विचारों की निर्मल गंगा ही परिवर्तन लेकर आती है। हम शब्दों से दीप जलाएँगे, विश्वास नया जगाएँगे, संविधान की मर्यादा में रहकर नवयुग का पथ बनाएँगे। न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, सबका सम्मान हमारा हो, हर जाति, हर वर्ग, हर मानव का समान अधिकार प्यारा हो। सत्ता सेवा का माध्यम हो, पद केवल उत्तरदायित्व बने, जनता का विश्वास ही सबसे बड़ा राजमुकुट बने। न अपराध का हो संरक्षण, न भ्रष्टाचार का सम्मान, कानून सभी पर एक समान, यही हो भारत की पहचान। निर्दोष सदा निर्भय जीएँ, दोषी विधि से दंडित हों, लोकतंत्र की पावन धरती पर न्याय के दीप प्रज्वलित हों। हमें नहीं चाहिए छल का राज, न कागज़ी व्यवस्थाओ...

Editorial Perspective: The biggest challenge on the path to good governance—'paperwork-driven bureaucracy'

चित्र
संपादकीय विचार: सुशासन की राह में सबसे बड़ी चुनौती—'कागजी धंधा'       (client=ca-pub-6262725213669814) @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान और जनता का विश्वास होता है। लेकिन जब आम नागरिक को अपने ही अधिकार प्राप्त करने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकना पड़े, फाइलें महीनों तक धूल फाँकती रहें और प्रक्रियाएँ समाधान के बजाय समस्या बन जाएँ, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर व्यवस्था किसके लिए है—जनता के लिए या स्वयं व्यवस्था के लिए? आज देश में डिजिटल शासन, पारदर्शिता और सुशासन की बातें खूब होती हैं। अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार भी हुए हैं। फिर भी नागरिकों के अनुभव बताते हैं कि कई जगहों पर अनावश्यक प्रक्रियाएँ, लालफीताशाही, विवेकाधिकार का दुरुपयोग और जवाबदेही की कमी अब भी बड़ी चुनौतियाँ हैं। यही वह स्थिति है जिसे लोग प्रतीकात्मक रूप से "कागजी धंधा" कहते हैं। यह समस्या किसी एक विभाग, किसी एक सरकार या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो तब जन्म लेती है जब नियम जनसेवा के बजाय नियंत्रण क...

  "Wake up, guardians of the Constitution."

चित्र
 "जागो, संविधान के प्रहरी"     (client=ca-pub-6262725213669814) @  जनप्रेरक कविता/  कमलेश पांडेय, त्रिकालदर्शी कवि न झुको अन्याय के आगे, न बिकने दो ईमान, जनता ही सबसे बड़ी शक्ति, जनता ही पहचान। काग़ज़-काग़ज़ खेल रचा है, कितने झूठे जाल, सच की कीमत रोज़ चुकाता, मेहनतकश हर लाल। रिश्वत की सीढ़ी चढ़कर कितने ऊँचे सिंहासन, लेकिन जनता भूल न जाना, सबसे बड़ा है संविधान। किसान के पसीने से लेकर, मजदूरों की रोटी तक, हर बूंद पर डाका पड़ता, सत्ता की उस खोटी तक। युवा अगर चुप बैठ गया तो, सपने होंगे नीलाम, नारी यदि आवाज़ उठाए, बदलेगा हर धाम। कलम अगर सच लिखने निकले, बिकने से इंकार करे, न्यायालय निष्पक्ष खड़ा हो, अपराधी पर वार करे। न कुर्सी से बैर हमारा, न किसी व्यक्ति से युद्ध, लड़ना है उस भ्रष्ट व्यवस्था से, जिसने छीना जन का बुद्ध। कर का पैसा जन की पूँजी, जनहित में ही खर्च हो, हर अधिकारी याद रखे—उत्तरदायी हर फ़र्ज़ हो। सुशासन कोई स्वप्न नहीं है, जनशक्ति का है मान, जब जागेगा देश का नागरिक, बदलेगा हिंदुस्तान। आओ मिलकर शपथ उठाएँ— न रिश्वत देंगे, न लेंगे, यही होगा अभियान।...