The Revolution of the Pen
कलम की क्रांति (client=ca-pub-6262725213669814) @ कमलेश पांडेय/त्रिकालदर्शी कवि न तलवारों का शोर उठे, न नफ़रत का कोई नारा हो, भारत का हर जन सुरक्षित, न्याय ही हमारा सहारा हो। जो समाज को बाँटते फिरते, विष के बीज उगाते हैं, झूठ, छल और स्वार्थ के दम पर, अपनों को लड़वाते हैं। उनसे कहना, सत्य की लौ अब हर अंधियारा हर लेगी, जन-जन की जागी चेतना ही उनकी सत्ता छीन लेगी। हर क्रांति कलम से जन्मी है, इतिहास यही दोहराता है, विचारों की निर्मल गंगा ही परिवर्तन लेकर आती है। हम शब्दों से दीप जलाएँगे, विश्वास नया जगाएँगे, संविधान की मर्यादा में रहकर नवयुग का पथ बनाएँगे। न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, सबका सम्मान हमारा हो, हर जाति, हर वर्ग, हर मानव का समान अधिकार प्यारा हो। सत्ता सेवा का माध्यम हो, पद केवल उत्तरदायित्व बने, जनता का विश्वास ही सबसे बड़ा राजमुकुट बने। न अपराध का हो संरक्षण, न भ्रष्टाचार का सम्मान, कानून सभी पर एक समान, यही हो भारत की पहचान। निर्दोष सदा निर्भय जीएँ, दोषी विधि से दंडित हों, लोकतंत्र की पावन धरती पर न्याय के दीप प्रज्वलित हों। हमें नहीं चाहिए छल का राज, न कागज़ी व्यवस्थाओ...