"Wake up, guardians of the Constitution."
"जागो, संविधान के प्रहरी"
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@ जनप्रेरक कविता/ कमलेश पांडेय, त्रिकालदर्शी कवि
न झुको अन्याय के आगे, न बिकने दो ईमान,
जनता ही सबसे बड़ी शक्ति, जनता ही पहचान।
काग़ज़-काग़ज़ खेल रचा है, कितने झूठे जाल,
सच की कीमत रोज़ चुकाता, मेहनतकश हर लाल।
रिश्वत की सीढ़ी चढ़कर कितने ऊँचे सिंहासन,
लेकिन जनता भूल न जाना, सबसे बड़ा है संविधान।
किसान के पसीने से लेकर, मजदूरों की रोटी तक,
हर बूंद पर डाका पड़ता, सत्ता की उस खोटी तक।
युवा अगर चुप बैठ गया तो, सपने होंगे नीलाम,
नारी यदि आवाज़ उठाए, बदलेगा हर धाम।
कलम अगर सच लिखने निकले, बिकने से इंकार करे,
न्यायालय निष्पक्ष खड़ा हो, अपराधी पर वार करे।
न कुर्सी से बैर हमारा, न किसी व्यक्ति से युद्ध,
लड़ना है उस भ्रष्ट व्यवस्था से, जिसने छीना जन का बुद्ध।
कर का पैसा जन की पूँजी, जनहित में ही खर्च हो,
हर अधिकारी याद रखे—उत्तरदायी हर फ़र्ज़ हो।
सुशासन कोई स्वप्न नहीं है, जनशक्ति का है मान,
जब जागेगा देश का नागरिक, बदलेगा हिंदुस्तान।
आओ मिलकर शपथ उठाएँ—
न रिश्वत देंगे, न लेंगे, यही होगा अभियान।
सत्य, सेवा और पारदर्शिता से,
फिर मुस्काएगा अपना हिंदुस्तान।
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