आखिर भारतीय संविधान से अपेक्षित मौलिक संशोधन कबतक? समझिए कितने हैं जरूरी?
आखिर भारतीय संविधान से अपेक्षित मौलिक संशोधन कबतक? समझिए कितने हैं जरूरी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भले ही भारतीय संविधान ने देश-काल-पात्र के परिप्रेक्ष्य में हम भारतीयों को बहुत कुछ दिया है, फिर भी इससे और अधिक लेने की अपेक्षा रखना लाजिमी है। इस दिशा में सुलगता हुआ सवाल यही है कि आखिर सिस्टम पर विगत लगभग आठ दशकों से कुंडली मार कर बैठने वाले लोगों या उनके उत्तराधिकारियों-परिजनों ने, जिसमें संविधान की आरक्षण व्यवस्था द्वारा पैदा किये हुए राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक और मीडियागत के 'अभिजात्य वर्गों' के विधिक शोषण से उनके ही वर्ग या समाज के संघर्षरत अन्य लोगों को आखिर मुक्ति कब तक मिलेगी! इतना ही नहीं, नियम कानून द्वारा इस देश में असली समाजवाद, समानतावाद और समरसतावाद कब तक लाया जाएगा? वहीं, पूरी व्यवस्था पर हावी होते परिवारवाद और सम्पर्कवाद को कब और कैसे हतोत्साहित किया जाएगा? चाहे अल्पसंख्यक वाद हो या पंथनिरपेक्षता/धर्मनिरपेक्षता का सवाल, इसे व्यवहारिक अमलीजामा कब तक पहनाया जाएगा? वहीं, पाकिस्तान-बंगलादेश के मुकाबिल इसे तुलनात्मक रूप से कबतक ला...