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यक्ष प्रश्न: आखिर अमेरिकी वर्चस्व की कीमत कबतक चुकाएगी शेष दुनिया?

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यक्ष प्रश्न: आखिर अमेरिकी वर्चस्व की कीमत कबतक चुकाएगी शेष दुनिया? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक महाकवि तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' में लिखा है कि "समरथ को नहीं दोष गोसाईं।" यानी कि ताकतवर लोगों को कोई भी दैव दोष तक नहीं लगता है! यदि समकालीन लोकतांत्रिक कसौटियों और प्रवृत्तियों में इसे देखें तो देश-दुनिया के सभी वैधानिक नियमन शक्तिशाली देशों और लोगों के ही पक्ष में कार्य करते प्रतीत होते हैं। वाकई उनके किसी भी लोकविरोधी या जनविरोधी कार्य में प्रायः कोई न्यायिक बाधाएं तक नजर नहीं आतीं और न ही उनमें कोई दोष या खामियां तलाशी जाती हैं।  आलम यह है कि किसी भी संसद, सर्वोत्तम न्यायालय या फिर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तक में ऐसे मामले पर ज्यादा सवाल जवाब नहीं किये जाते और अंततः मामले रफादफा कर, करवा दिए जाते हैं। कबीलाई भाषा में कहें तो जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत न केवल ग्रामीण जगत की मानसिकता बल्कि आधुनिक नृशंस विश्व के मानस पटल तक पर हावी महसूस होता है। बहरहाल इससे बचने का कोई रास्ता भी नजर नहीं आता। सच कहूं तो "वीर भोग्या वसुंधरा...

अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध से उपजने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए फिक्रमंद हुए दुनियावी देश

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अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध से उपजने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए फिक्रमंद हुए दुनियावी देश @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जंग छिड़ी हुई है। इसी वर्ष फरवरी माह से तेज हुई सीमाई झड़पें अब खुले युद्ध में बदल चुकी हैं, जिसमें पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के काबुल, कंधार और पक्तिया जैसे इलाकों पर हवाई हमले किए हैं। उधर, अफगानिस्तान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए इस्लामाबाद पर ड्रोन बम बरसा दिए। यही वजह है कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध से उपजने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए दुनिया के देश फिक्रमंद दिखाई पड़ रहे हैं। इसलिए रसूखदार देशों ने दोनों इस्लामिक राष्ट्रों से युद्ध बंद करने की अपील की है, लेकिन उनकी बातें नक्कारखाने में तूती की आवाज की मानिंद गुम हो चुकी हैं।  हद तो यह कि अमेरिकी शह प्राप्त पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे "ऑपरेशन गजब लिल हक" बताते हुए तालिबान पर आतंकी समर्थन का आरोप लगाया है। आलम यह है कि दोनों पक्षों में सैकड़ों लोग व सुरक्षा बल के जवान हताहत हुए हैं, लेकिन सरकारो...

मध्य-पूर्व एशिया में शुरू हुए इजरायल-ईरान युद्ध के वैश्विक मायने

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मध्य-पूर्व एशिया में शुरू हुए इजरायल-ईरान युद्ध के वैश्विक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक मध्य-पूर्व एशिया में इजरायल और ईरान के बीच एक बार फिर से युद्ध भड़क गया। इससे पूर्व 2025 के मध्य में भी यह युद्ध शुरू हुआ था, लेकिन खाड़ी-अरब देशों के बीच बचाव के बाद थम गया था। समझा जाता है कि अब इजरायल को मिले अमेरिकी और खाड़ी-अरब देशों के अप्रत्याशित समर्थन से यह युद्ध और भी ज्यादा तेज हो या। जिस तरह से इस्लामिक दुनिया शिया व सुन्नी खेमे में विभक्त है, उससे सुन्नी बहुल सऊदी के इशारे पर शिया बहुल देश ईरान के मानमर्दन में यहूदी बहुल देश इजरायल और ईसाई बहुल देश अमेरिका को काफी मदद मिली है। वैश्विक कूटनीतिज्ञों के मुताबिक, अमेरिका द्वारा इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर दोबारा हमले किये जाने और ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामेनेई समेत उनके कई प्रमुख सहयोगियों को मार गिराए जाने से मध्य पूर्व के देशों में पारस्परिक तनाव एक बार पुनः चरम पर पहुंचा गया, जिससे वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेंगे। इस संघर्ष से जहां तेल आपूर्ति बाधित होगी, वहीं कई ...