अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ!
अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ! @ डॉ दिनेश चन्द्र सिंह, आईएएस "अपने में सब कुछ भर कैसे व्यक्ति विकास करेगा, यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।..…औरों को हंसते देखो मनु, हंसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो सबको सुखी बनाओ!" महाकवि जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति 'कामायनी' की उपर्युक्त कुछ पक्तियों का स्मरण मुझे बरबस हो आता है, क्योंकि प्रशासनिक जीवन के सार सत्य को ये उद्घाटित करती प्रतीत होती हैं। इसलिए हमें अपने सुख को विस्तृत करके, सबको सुखी बनाने हेतु अथक प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा इसलिए कि "यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा"- जैसी पंक्तियां सदैव यह एहसास दिलाती हैं कि व्यक्ति के स्वार्थ केंद्रित व्यवस्था से कभी भी सम्पूर्ण समाज का विकास नहीं हो सकता है। इसलिए हमें व्यष्टि से समष्टि की ओर, वसुधैव कुटुम्बकम के भाव से बढ़ना चाहिए। हमारे राष्ट्र निर्माता स्वतंत्रता सेनानियों ने भी यही तो किया था और अब हम भी ऐसा करते हुए अपनी भावी पीढ़ी को भी वैसा ही करते रहने के लिए अभिप्रेरित कर सकते हैं। कहना न होगा कि दुनिया के...