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ऑनलाइन गेमिंग (प्रमोशन एंड रेगुलेशन) अधिनियम, 2025 के नीतिगत मायने बेहद अहम

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ऑनलाइन गेमिंग (प्रमोशन एंड रेगुलेशन) अधिनियम, 2025 के नीतिगत मायने बेहद अहम रियल मनी गेम्स पर प्रतिबंध से सरकार और स्टेकहोल्डर्स दोनों को हुआ भारी नुकसान! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक ऑनलाइन गेमिंग (प्रमोशन एंड रेगुलेशन) अधिनियम, 2025 में रियल मनी गेम्स पर प्रतिबंध लगाने से सरकार और स्टेकहोल्डर्स दोनों को अल्पकालिक व दीर्घकालिक नुकसान हुआ है। हालांकि, सरकार इसे सामाजिक सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम मानती है, जबकि उद्योग जगत दीर्घकालिक हानि का दावा करता है। आंकड़े बताते हैं कि आम बजट 2026 और उससे ठीक पहले आए आर्थिक सर्वे भी केंद्र सरकार के बढ़ते वित्तीय घाटे की ओर इशारा कर चुके हैं, इसलिए बेहतर तो यह होता कि मोदी सरकार ऐसे द्विपक्षीय हानिप्रद फैसले लेने से पहले इससे जुड़े उद्योग जगत व अन्य स्टेक होल्डर्स से उन्मुक्त हृदय से बातचीत के बाद ही किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचती। जहां तक सरकार को नुकसान की बात है तो सरकार को सालाना ₹15,000-20,000 करोड़ जीएसटी (GST) राजस्व का सीधा नुकसान हुआ, क्योंकि रियल मनी सेक्टर 86% राजस्व का स्रोत था। वहीं, इस क्षेत्र में सक्रिय 400+...

ट्रंफ-मोदी के आपसी रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने के द्विपक्षीय व वैश्विक मायने

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ट्रंफ-मोदी के आपसी रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने के द्विपक्षीय व वैश्विक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया के दो बड़े लोकतंत्र और पहली-चौथी अर्थव्यवस्था वाले देश अमेरिका व भारत में पुनः प्रेम के पींगे परवान चढ़ने शुरू हो गए। तमाम अंतर्राष्ट्रीय व द्विपक्षीय विरोधाभासों के बीच पारस्परिक सहयोग के विभिन्न जटिल पहलुओं पर जो रजामंदी दिखाई गई और फिर यह तय हुआ कि 'धीरे धीरे प्यार को बढ़ाना है, हद से गुजर जाना है!' जिसके अपने वैश्विक निहितार्थ हैं। शायद इसी हद पर 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'सर्वे भवंतु सुखिनः' की गारंटी निर्भर है।  ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि अमेरिका-भारत-यूरोपीय संघ यानी जी-7 प्रभुत्व वाले प्रेम त्रिकोण और भारत-रूस-चीन यानी ब्रिक्स देश वाले प्रेम त्रिकोण के बीच भारत कब, कैसे और कितना गुटनिरपेक्ष संतुलन बना पाएगा, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रख पाएगा? क्योंकि  सब कुछ इन्हीं द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातों-मुलाकातों पर निर्भर करेगा।  इसलिए कूटनीतिक हल्के में इस बात की आशंका अभी से ही जताई जा रही है कि आखिर अमेरिका कब तक अप...

आखिर घाटे वाले विदेश व्यापार को मुनाफे वाले कारोबार में कब और कैसे बदलेगा भारत?

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आखिर घाटे वाले विदेश व्यापार को मुनाफे वाले कारोबार में कब और कैसे बदलेगा भारत? @ कमलेश पाण्डेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत की सियासत 'वैचारिक अकाल' से पीड़ित है, जिसका असर हमारे घरेलू कारोबार के अलावा विदेश व्यापार पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। सच कहूं तो राष्ट्र की 'आर्थिक स्वायत्तता' ही चीन और रूस जैसे देशों के समक्ष गिरवी प्रतीत हो रही है। यह ठीक है कि रूस हमारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मददगार मित्र है, जिसके द्वारा शोषण किया जाना स्वाभाविक है। लेकिन चीन जैसे मजबूत और पड़ोसी शत्रु देश को इतना भारी कारोबारी लाभ देने के बावजूद यदि हम उसे अपना मित्र नहीं बना पाए तो यह बात सिर्फ यही चुगली करती है कि हमारी आंतरिक दलित और पिछड़ी नीतियों की वजह से भारत रणनीतिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पिछड़ता प्रतीत होता हैं। यही वजह है कि आर्थिक विशेषज्ञ यह सवाल दाग रहे हैं कि आखिर घाटे वाले विदेश व्यापार को मुनाफे वाले अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कब और कैसे बदलेगा भारत? देखा जाए तो भारत का विदेश व्यापार वर्तमान में भारी घाटे में है, जो दिसंबर 2025 में 25 अरब डॉलर तक...

सवर्ण विरोधी सियासी चक्रब्यूह में फंसी भाजपा! हिंदुत्व की 'अभिमन्यु गति' तय?

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सवर्ण विरोधी सियासी चक्रब्यूह में फंसी भाजपा! हिंदुत्व की 'अभिमन्यु गति' तय? # अब सामाजिक न्याय व धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करेगी भाजपा @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कभी 'मंडल' के बाद 'कमंडल' की सियासत शुरू करके राष्ट्रीय व सूबाई राजनीति में कांग्रेसियों, समाजवादियों और उनके नेतृत्व वाले गठबंधन को निपटाने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब केंद्र व राज्यों में 'ओबीसी नेतृत्व' के मजबूत होते ही स्वघोषित 'हिंदुत्व' के एजेंडे से भटकते  हुए उसी कथित सामाजिक न्याय व सेक्युलरिज्म का झंडा बुलंद करती दिखाई दे रही है, जिसकी जनविरोधी सियासत करने वाले दल हाशिए पर चले गए!  बताया जाता है कि अपने वर्तमान नेतृत्व को चुनावी मजबूती यानी बहुमत दिलाते रहने के लिहाज से भाजपा ने भी देश की उसी घिसी पिटी सवर्ण विरोधी 'सामाजिक न्याय' और मुस्लिम परस्त 'अल्पसंख्यकवाद' की राजनीतिक पीच पर नए तरीके से शैक्षणिक बॉलिंग-बैटिंग शुरू की है, ताकि वह लोकसभा चुनाव 2024 के अप्रत्याशित परिणाम के सदमे से उबर सके। बिहार विधानसभा चुनाव 2...

पूंजीवाद के राष्ट्रवादी ढकोसले को समझिए और वामपंथी भारत की जमीन तलाशिए

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पूंजीवाद के राष्ट्रवादी ढकोसले को समझिए और वामपंथी भारत की जमीन तलाशिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत आज पश्चिमी लोकतंत्र और पूंजीवादी ताकतों का सहज शिकार बन चुका है, जिससे वास्तविक भारतीयता खतरे में है। दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः की राह दिखाने वाला भारत और भारतीय उपमहाद्वीप आज जातीय-क्षेत्रीय संघर्षों और साम्प्रदायिक-भाषाई उन्मादों की भूमि के रूप में तब्दील किया जा चुका है।  वास्तव में ये यूरोपीय, अमेरिकी, अफ्रीकी समाज की खामियां-कमजोरियां हैं जो भारतीय उपमहाद्वीप में यूरोपीय धर्मयुद्ध के फलस्वरूप उससे सटे पश्चिमी, उत्तरी और मध्य एशियाई आक्रांताओं के प्रभाव वश आईं और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पसर गईं। बाद में यही विभाजनकारी सोच यूरोपीय औपनिवेशिक शासनकाल का हथियार बन गईं और अपने हित के अनुकूल उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप को वर्मा (म्यांमार), तिब्बत (चीन), अफगानिस्तान, नेपाल, पाकिस्तान आदि टुकड़ों में बांट दिया, ताकि इनकी आपसी सहिष्णुता कमजोर हो और यूरोप की तरह यह भूभाग भी हमेशा संघर्षरत रहकर उनके लिए दूधारू बना रहे। दुर्भाग्यपूर्ण ह...