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भारत रत्न के बनते 'खुदरा बाजार' से उठते सियासी सवाल?

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भारत रत्न के बनते 'खुदरा बाजार' से उठते सियासी सवाल? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अपने चहेते नेताओं को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिलवाने की जो होड़ नेताओं और समाजसेवियों में मची है, उससे इसकी प्रतिष्ठा पर आंच स्वाभाविक है। इसलिए सवाल उठता है कि आखिरकार देश के प्रधानमंत्री भारत रत्न जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार को 'खुदरा बाजार' क्यों बनने दे रहे हैं, क्योंकि किसी को इसे देना या न देना उनका विवेकाधिकार/विशेषाधिकार समझा जाता है। इसलिए उनकी भूमिका पर सियासी सवाल उठना लाजिमी है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो इसका राजनीतिक जवाब तो कतई नहीं दें! कहना न होगा कि 'भारत रत्न' भारत वर्ष का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जिसे कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। इसकी स्थापना 2 जनवरी 1954 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। इसलिए सियासी लाभ या तुष्टिकरण के लिए इसे प्रदान करने से इसकी राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय गरिमा उसी प्रकार से घटेगी, जैसे नोबल का शांति पुरस...

पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी दबदबा बढ़ने के वैश्विक मायने

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पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी दबदबा बढ़ने के वैश्विक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एशिया, यूरोप और अफ्रीका महादेश में अमेरिकी साम्राज्यवाद को मिलती मजबूत चुनौती के बाद अब पुनः उसने पश्चिमी गोलार्द्ध यानी उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के देशों में खुद को मजबूत बनाने का पुनः निश्चय किया है। यह अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ की दूरदर्शिता और इतिहास से सबक, दोनों माना जा रहा है। शायद इसलिए उन्होंने बेनेज़ुएला, क्यूबा, मेक्सिको, कनाडा, ब्राजील आदि की नकेल कसनी शुरू की और ग्रीनलैंड को पुनः पाने की वैश्विक महत्वाकांक्षा प्रदर्शित की। चूंकि ट्रंफ एक कुशल व्यवसायी भी हैं, इसलिए उनकी रणनीति अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों के लिए अब भी एक पहेली बनी हुई है। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने जिस तरह से रूस, चीन और भारत समर्थकों को निशाने पर लेना शुरू किया है, वह उनकी साहसिक पहल समझी जा सकती है। इसलिए अब यहां तक कहा जाने लगा है कि ट्रंफ ने डीप स्टेट के सामने घुटने टेक दिए हैं, ताकि मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का उनका स्वप्न साकार हो सके। बताते चलें...

क्या पैक्स सिलिका में भारत को शामिल करने से अमेरिका को लाभ मिलेगा?

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पैक्स सिलिका क्या है? इसमें भारत को शामिल करने से अमेरिका को क्या लाभ मिलेगा? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पैक्स सिलिका (Pax Silica) अमेरिका की अगुवाई वाली एक रणनीतिक तकनीकी पहल है, जो सिलिकॉन-आधारित सप्लाई चेन को मजबूत करने पर केंद्रित है। यह एआई (AI), सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में वैश्विक निर्भरता कम करने का प्रयास करती है। यह नवीनतम अंतर्राष्ट्रीय पहल क्रिटिकल मिनरल्स, ऊर्जा संसाधनों, चिप निर्माण, एआई (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स की सुरक्षित सप्लाई चेन बनाती है। इसलिए अमेरिकी विदेश विभाग इसे "पॉजिटिव-सम" साझेदारी मानता है, जो चीन जैसी निर्भरताओं से बचाव करती है। इससे विश्वसनीय देशों में नवाचार और निवेश बढ़ता है। इस प्रकार पैक्स सिलिका का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को कम करना और विश्वसनीय देशों के बीच सुरक्षित तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है। चूंकि भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व है, इसलिए भारत को हाल ही में इसमें पूर्ण सदस्यता का न्योता मिला है, जो ग्लोबल चिप हब बनने का अवसर देगा। इसस...