भारत रत्न के बनते 'खुदरा बाजार' से उठते सियासी सवाल?
भारत रत्न के बनते 'खुदरा बाजार' से उठते सियासी सवाल? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अपने चहेते नेताओं को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिलवाने की जो होड़ नेताओं और समाजसेवियों में मची है, उससे इसकी प्रतिष्ठा पर आंच स्वाभाविक है। इसलिए सवाल उठता है कि आखिरकार देश के प्रधानमंत्री भारत रत्न जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार को 'खुदरा बाजार' क्यों बनने दे रहे हैं, क्योंकि किसी को इसे देना या न देना उनका विवेकाधिकार/विशेषाधिकार समझा जाता है। इसलिए उनकी भूमिका पर सियासी सवाल उठना लाजिमी है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो इसका राजनीतिक जवाब तो कतई नहीं दें! कहना न होगा कि 'भारत रत्न' भारत वर्ष का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जिसे कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। इसकी स्थापना 2 जनवरी 1954 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। इसलिए सियासी लाभ या तुष्टिकरण के लिए इसे प्रदान करने से इसकी राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय गरिमा उसी प्रकार से घटेगी, जैसे नोबल का शांति पुरस...