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मार्च 12, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पड़ोसियों को एफडीआई के नियमों में मिली ढील के आर्थिक व कूटनीतिक मायने

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पड़ोसियों को एफडीआई के नियमों में मिली ढील के आर्थिक व कूटनीतिक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत-चीन के कभी नरम, कभी गरम सम्बन्धों से अक्सर प्रभावित होने वाले भारतीय उपमहाद्वीप के देशों के लिए एक अच्छी खबर है, जो उद्यमियों को सुकून देने वाली है। वह यह कि भारत सरकार ने 'भूल' सुधार करते हुए मार्च 2026 में पड़ोसी देशों यथा चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान के लिए एफडीआई (FDI) नियमों में ढील दी है। इस प्रकार पड़ोसियों को एफडीआई के नियमों में मिली ढील के आर्थिक व कूटनीतिक मायने स्पष्ट हैं। उम्मीद है कि भरोसेमंद आर्थिक रिश्ते पुनः गुलजार होंगे। उल्लेखनीय है कि यह बदलाव 2020 के प्रेस नोट 3 के कड़े प्रावधानों में संशोधन के रूप में आया, जिसमें पहले इन देशों से सभी निवेशों के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी थी। ऐसे में दो टूक सवाल है कि आखिर एफडीआई में मुख्य रूप से क्या-क्या बदलाव हुए हैं? तो यह जान लिजिए कि अब 10% तक के गैर-नियंत्रणकारी शेयरहोल्डिंग वाले निवेश ऑटोमैटिक रूट से हो सकेंगे, बशर्ते सेक्टरल कैप्स ...

क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे?

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क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अविवाहित इंजीनियर पुत्र निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी लॉन्चिंग से बिहार की राजनीति में दूरगामी असर पड़ना लाजिमी है। चूंकि वह अपने प्रगतिशील और यशस्वी पिता की प्रगतिशील समाजवादी सियासत को संभालेंगे, इसलिए कुछ बातें स्पष्ट हैं। वह यह कि अब तीन बड़े स्तरों पर इस पूरे घटनाक्रम का असर पड़ेगा– सत्ता संतुलन, जेडीयू की आंतरिक राजनीति और राज्य की व्यापक सियासी प्रतिस्पर्धा। इसके अलावा कुछ मौलिक सवाल भी उभरेंगे, जिनकी चर्चा पहले लाजिमी है। स्वाभाविक सवाल है कि क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे? हालांकि इसका जवाब गुजशते वक्त की कोख में पल रहा है, जो समय के साथ स्पष्ट होता जाएगा। पहला यह कि उनके पिता नीतीश कुमार अब शारीरिक रूप से अस्वस्थ होकर 'विलासितापूर्ण' सदन राज्यसभा की ओर रुखसत हो चुके हैं, जबकि बिहार के पुनर्निर्माण के उनके सपने अभी भली भांति पूर्वक  जवान ...

आखिर ईरानी धार्मिक शासन से क्या सीख सकता है हिंदुत्व पुरोधा भारत?

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आखिर ईरानी धार्मिक शासन से क्या सीख सकता है हिंदुत्व पुरोधा भारत? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हिंदुत्व का प्रहरी भारत, इस्लामिक ईरानी धार्मिक शासन से कुछ रणनीतिक सबक ग्रहण कर सकता है, लेकिन भारत की 'धर्मनिरपेक्ष' संरचना को ध्यान में रखते हुए ऐसी किसी भी सोच को अमलीजामा पहनाने में पहला अड़ंगा माननीय सर्वोच्च न्यायालय ही लगाएगा! सच कहूँ तो भारत में जाति आधारित सामाजिक न्याय और धर्म आधारित अल्पसंख्यकवाद का वैधानिक बीजारोपण करके गोरे अंग्रेज तो चले गए, लेकिन भाषा आधारित क्षेत्रवाद तो काले अंग्रेजों की देन है। चूंकि इन तीनों से सम्बन्धित 'मूर्खतापूर्ण कानूनी विचार' व उससे स्थापित व्यवस्थाएं हिंदुओं के हिस्से वाले भारत में हिंदुत्व को निरंतर दीमक की तरह चाट रही हैं, जिसके सियासी दुष्प्रभाव वश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके आनुषंगिक संगठन भी अब हार्डकोर हिंदुत्व की राह से भटकते महसूस हो रहे हैं और सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और क्षेत्रीयता की छांव तलाशते फिर रहे हैं।  लिहाजा, हिंदुत्व के इस नैराश्यपूर्ण मोड़ पर अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों...