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जरा सोचिए, धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती के लिए समान नियम बनाने में विलम्ब क्यों, किसके लिए?

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जरा सोचिए, धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती के लिए समान नियम बनाने में विलम्ब क्यों, किसके लिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन यहां पर विभिन्न धर्मावलंबियों के लिए बनाए गए नियम-कानूनों में भेदभाव स्पष्ट नजर आ रहा है। सवाल है कि क्या इसके पीछे भी हमारे संविधान निर्माताओं और कानून बनाने वालों की कोई सोची समझी रणनीति रही होगी, जिसे समझने में हमलोग अब तक विफल रहते आये हैं।  या फिर, मौजूदा राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक स्थिति के बारे में सपने में भी उन्होंने परिकल्पना नहीं की होगी, जहां धार्मिक प्रबंधन और सांस्कृतिक संकीर्णताओं से सियासत प्रभावित है और इस मनःस्थिति से सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था भी अछूती नहीं बची है।  सवाल यह भी है कि इस अप्रत्याशित स्थिति-परिस्थिति के लिए किसे दोषी समझा जाए। और यदि किसी को दोषी नहीं समझा जाए तो फिर क्यों नहीं सभी धर्मों के बीच में कानूनी समानता स्थापित करने का पुनः प्रबंध किया जाए। अगर ऐसा होता है तो धार्मिक विविधताओं से भरे इस देश का काफी भला हो जाएगा...