जरा सोचिए, धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती के लिए समान नियम बनाने में विलम्ब क्यों, किसके लिए?
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जरा सोचिए, धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती के लिए समान नियम बनाने में विलम्ब क्यों, किसके लिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
या फिर, मौजूदा राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक स्थिति के बारे में सपने में भी उन्होंने परिकल्पना नहीं की होगी, जहां धार्मिक प्रबंधन और सांस्कृतिक संकीर्णताओं से सियासत प्रभावित है और इस मनःस्थिति से सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था भी अछूती नहीं बची है।
सवाल यह भी है कि इस अप्रत्याशित स्थिति-परिस्थिति के लिए किसे दोषी समझा जाए। और यदि किसी को दोषी नहीं समझा जाए तो फिर क्यों नहीं सभी धर्मों के बीच में कानूनी समानता स्थापित करने का पुनः प्रबंध किया जाए। अगर ऐसा होता है तो धार्मिक विविधताओं से भरे इस देश का काफी भला हो जाएगा। चाहे संसद हो या सर्वोच्च न्यायालय, हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों के दूरगामी हित में एक समान धार्मिक कानून बनाने की या बनवाने की सकारात्मक पहल जल्द ही की जानी चाहिए।
वैसे तो सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती के लिए समान नियम बनाने की मांग की गई है। ऐसा इसलिए कि देश के हिंदू मंदिरों पर तो प्राधिकरण (अथॉरिटी) का नियंत्रण है, जबकि अन्य समूहों को अपने संस्थानों का प्रबंधन करने की अनुमति है। यही वजह है कि हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों को भी मुस्लिम, पारसी और ईसाइयों की तरह धार्मिक स्थलों की स्थापना, प्रबंधन और रखरखाव के समान अधिकार देने की मांग की जा रही है।
बताया जाता है कि स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर इस याचिका में यह घोषित करने की भी मांग की गई है कि हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों को मुस्लिम, ईसाई और पारसियों जैसे अपने धार्मिक स्थानों की चल-अचल संपत्ति के स्वामित्व, अधिग्रहण और प्रशासन के समान अधिकार दिए जाएं। क्योंकि राज्य केवल कुछ धार्मिक संप्रदायों जैसे हिंदुओं और सिखों के धार्मिक स्थानों को नियंत्रित करके धार्मिक मामलों के प्रबंधन के मामले में भेदभाव कर रहे हैं।
यहां पर यह स्पष्ट कर दें कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 26 व 27 धार्मिक मामलों के प्रबंधन के मामले में विभिन्न धर्मों के बीच किसी तरह के भेदभाव की गुंजाइश नहीं छोड़ता। लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी यदि ऐसी विषमता व्याप्त है तो यह हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म के नीति-नियंताओं की लापरवाही को ही उजागर करता है, जो समय रहते ही सचेत नहीं हुए।
कहने को तो इस अवधि में कांग्रेस लंबे समय तक शासन में रही और समाजवादी व राष्ट्रवादी दल या उनका गठबंधन भी समय-समय पर सत्ता में आते रहे और अभी राष्ट्रवादी दल भाजपा ही पिछले सात वर्षों से सत्ता पर काबिज है। इनके मातहत प्रशासन ने भी इस विषमता को दूर करने की पहल क्यों नहीं की, सोचनीय बात है। सवाल है कि क्या उनके ऊपर किसी वोट बैंक के बिछुड़ जाने का परोक्ष दबाव था, या फिर कोई और बात रही होगी।
यहां पर यह भी बता दें कि इससे पहले भी इसी तरह की एक याचिका वकील व भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई थी, जिसमें धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती के लिए समान संहिता बनाने की मांग की गई थी और देश भर के हिंदू मंदिरों पर अथॉरिटी के नियंत्रण का हवाला दिया गया था। फिर भी इतने महत्वपूर्ण सवाल पर दो टूक निर्णय देने की राह में अड़ंगा क्या है, किससे है, कबतक रहेगा, यह जानने की जिज्ञासा हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों के एक बड़े वर्ग में है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि मुस्लिमों, पारसियों और ईसाइयों की तरह ही हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों व सिखों आदि को भी धार्मिक स्थलों के रखरखाव का हक है, जो उन्हें मिलनी ही चाहिए। इनमें से जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म को अल्पसंख्यक धर्म की श्रेणी में सुमार किया जाने लगा है। इसलिए इन्हें तो अविलम्ब प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
बेशक सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह धार्मिक व धर्मार्थ बंदोबस्ती के लिए समान नियम बनाने की मांग को लेकर दायर याचिकाओं को तवज्जो दे और दैनिक सुनवाई करके जल्द से जल्द अपना फैसला दे, ताकि उसके लाभ से वंचित धर्मावलंबियों को राहत मिले और उनके समग्र धार्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सके।
(लेखक दैनिक भास्कर गाजियाबाद एनसीआर के ब्यूरोचीफ हैं।)
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