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आखिर कैसी हो बिहार के मुख्यमंत्री की दृष्टि ताकि विकसित राज्य बने बिहार?

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आखिर कैसी हो बिहार के मुख्यमंत्री की दृष्टि ताकि विकसित राज्य बने बिहार? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक मैं बिहारी हूँ। एनसीआर वाला भी हूँ। जीवन के अमूल्य 36 वर्ष बिहार में गुजरे हैं। अब भी आना-जाना लगा रहता है, लेकिन जो टीस सालती है, वह यह कि आखिर बिहार का पुराना वैभव कैसे लौटेगा? मगध और पाटलिपुत्र की पुरानी प्रतिष्ठा कैसे पुनर्स्थापित होगी? ऐसा इसलिए कि भारत शुरू से ही बिहार के हाथ में महफूज रहा है, एकीकृत होकर आगे बढ़ा है। युद्ध के स्थान पर बुद्ध बिहार की अविस्मरणीय शान समझे जाते हैं। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला की ज्ञान गौरव गाथा कौन नहीं जानता! स्वाभाविक है बिहार को वह आदमकद नेतृत्व चाहिए, जो अभी तक के चाणक्य नीतीश कुमार और अमित शाह पैदा नहीं कर सके, लेकिन उम्मीदों पर दुनिया कायम है। लेट्स इंस्पायर बिहार एक अच्छी मुहिम है क्योंकि नेतृत्व दूरदर्शी है। इसलिए मेरी सोच है कि बिहार को सचमुच विकसित राज्य बनाने के लिए उसका मुख्यमंत्री कुछ खास तौर‑तरीके का होना चाहिए– न सिर्फ़ राजनीतिक रूप से “सशक्त”, बल्कि नीतिगत दृढ़ता, नैतिक क्लीन‑इमेज और प्रशासनिक दक्ष...

क्या नोएडा मजदूर हिंसक आंदोलन के लिए औद्योगिक, प्रशासनिक व राजनीतिक सांठगांठ जिम्मेदार है?

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क्या नोएडा मजदूर हिंसक आंदोलन के लिए औद्योगिक, प्रशासनिक व राजनीतिक सांठगांठ जिम्मेदार है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हमारे देश के राजनेता भले ही चुनावों के दौरान दलित-महादलित-आदिवासी, ओबीसी-ईबीसी, अल्पसंख्यक-पसमांदा और गरीब सवर्ण आदि से जुड़े सामाजिक न्याय सम्बन्धी तरह-तरह की बातें करते हैं, ममनगढ़ंत आंकड़े गिनाते/बताते हैं, लेकिन उनकी नाक के नीचे श्रमजीवियों का अंतहीन शोषण होता रहता है, जिससे उनका मुंह फेरे रहना या फिर किसी बड़े आंदोलन के बाद सक्रिय होना उनके नेतृत्वकारी भूमिका पर सवाल उठाता है। आमतौर पर प्रशासनिक अधिकारियों और उद्योगपतियों की मिलीभगत से किस कदर श्रमजीवी मजदूरों का शोषण अनवरत रूप से जारी रहता है और फिर एक दिन नोएडा मजदूर आंदोलन के शक्ल  में फूट पड़ता है, इसका यह ताजा उदाहरण है। इसी प्रवृति से नई आर्थिक नीति विफलता के कगार पर खड़ी है। नीति निर्माण में नेताओं/नौकरशाहों ने जो पक्षपात दिखाया है, वह सभी समस्याओं की जड़ है। यक्ष प्रश्न यह कि जिस देश में महंगी शिक्षा, महंगा स्वास्थ्य और खर्चीला शहरी जीवन का बोलबाला हो, वहां पर निजी क्षेत्र के...