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सत्तापक्ष-विपक्ष के 'सियासी पापों' से जनहित की रक्षा के लिए गठित करनी होगी स्वतंत्र एजेंसी?

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.....तो क्या सत्तापक्ष-विपक्ष के 'सियासी पापों' से जनहित की रक्षा के लिए गठित करनी होगी स्वतंत्र एजेंसी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक भारत की संसदीय राजनीति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। यहां राजनीतिक दलों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को प्राप्त बेहिसाब अधिकार के दुरूपयोग की जिस तरह की दुनियावी खबरें मिल रही हैं, उससे पक्ष-विपक्ष दोनों की सियासी भूमिका संदेह के घेरे में है। सुलगता सवाल है कि जब राजनीतिक दलों और उनके द्वारा ही राष्ट्रीयता विरोधी कार्रवाई की जाएगी, राष्ट्रवाद की अवधारणा को मुंह चिढ़ाते हुए जनविरोधी फैसले लिए जाएंगे और कानून बनाए जाएंगे तो फिर इसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा?  चूंकि भारत में जिन दलित, आदिवासी और पिछड़े मतदाताओं का बहुमत है, उनकी कानूनी शिक्षा व राजनीतिक साक्षरता उस स्तर की नहीं है, जो किसी भी लोकतंत्र की सफलता के लिए जरूरी है। इसलिए उन्हें आरक्षण, जातिवाद और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर सियासी समूहों द्वारा बरगलाया जाता है और जनविरोधी-राष्ट्रविरोधी कुकृत्य संपादित किये जाते हैं, इसलिए प्रबुद्ध सिविल सोसाइटी का जगन...

‘महाशिवरात्रि’ का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य जनकल्याणक है!

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‘महाशिवरात्रि’ के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्यों को ऐसे समझिए, जनकल्याणक है! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार शिव पूजा का तातपर्य हमेशा लोककल्याणकारी-जनकल्याणकारी कार्यों से है। इसलिए 'महाशिवरात्रि’ के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्यों को अवश्य समझना चाहिए। यथासम्भव दूसरों को बतलाना चाहिए। शिवकथा का उद्देश्य यही है जो जन कल्याणक और लोकमंगलकारी है। शिवरात्रि अर्थात् भगवान शिवजी की रात्रि। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी तिथि की रात्रि को भगवान शिवजी का विवाह पार्वती जी से हुआ था।  लिहाजा, यह भगवान शिवजी की आराधना की रात्रि है जो फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (चौदस) को मनायी जाती है। क्या आपको पता है कि जब अन्य देवताओं का पूजन-यजन दिन में होता है तो फिर शिवजी का पूजन रात्रि में ही क्यों, अक्सर यह विचार आपके मन में उत्पन्न हो सकता है। इसलिए आपको बता दें कि भगवान शिव तमोगुण प्रधान संहार के देवता हैं। अत: तमोमयी रात्रि से उनका ज्यादा स्नेह है।  चूंकि रात्रि संहारकाल का प्रतिनिधित्व करती है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में रात्रिकालीन प्रकाश का स्रोत चन्द्रमा भी पूर्ण ...

तो क्या वंशवादी लोकतंत्र की अगली कड़ी बनेंगे निशांत कुमार?

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यक्ष प्रश्न: निशांत कुमार की सियासी लॉन्चिंग से वंशवादी लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक वंशवादी लोकतंत्र का क्रांतिकारी भूमि बिहार में अपनी गहरी जड़ें जमाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है! यह लोकतंत्र की जननी वैशाली की मूल भावनाओं को मुंह चिढ़ाने जैसा है। ऐसा इसलिए कि सूबाई राजनीति को विगत 4 दशकों तक प्रभावित करते रहने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री बिहार, जदयू के मुखिया नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री बिहार और लोजपा आलाकमान रहे स्व. रामविलास पासवान, पूर्व केंद्रीय मंत्री भारत सरकार ने अपने-अपने लाडले क्रमशः तेजस्वी यादव, पूर्व उपमुख्यमंत्री बिहार, चिराग पासवान, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, भारत सरकार और निशांत कुमार, सीएम इन वेटिंग, बिहार को अपनी राजनीतिक विरासत (सियासी जमींदारी) सौंप चुके हैं!  इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही देरी से फैसला किया हो, लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद की भांति  वो निशांत कुमार के लिए अपने समर्थकों से मजबूत फील्डिंग भी करवा रहे हैं। इससे प्रदेश की राजनीति में कई सवाल पैदा हो रहे हैं, ...