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सवा सौ साल पुराना है भारत में आरक्षण का इतिहास, गुलाम और आजाद भारत में ऐसे जुड़ती गईं आरक्षण की कड़ियां

सवा सौ साल पुराना है भारत में आरक्षण का इतिहास, गुलाम और आजाद भारत में ऐसे जुड़ती गईं आरक्षण की कड़ियां  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार भारत में आरक्षण के इतिहास के बारे में यदि किसी संस्था ने आपको नहीं बताया है तो यह जान लीजिए कि अपने देश में आरक्षण की मानसिकता से समानता स्थापित करने व विकास करने की बात महज सवा सौ वर्ष पुरानी बात है। जिसके मद्देनजर आजाद भारत में सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों, अनुसूचित जातियों व जनजातियों से सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने  कानून के जरिये सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों में, धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर, सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की है।  इसके अलावा, भारतीय संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है। केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण दे रखा है और विभिन्न रा...

आरक्षण का इतिहास: रिजर्वेशन से जुड़े न्यायिक आदेशों से स्पष्ट हुई भ्रांतियां

आरक्षण का इतिहास: रिजर्वेशन से जुड़े न्यायिक आदेशों से स्पष्ट हुई भ्रांतियां  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार समाज के दलित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्गों के समग्र उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों आदि में विकसित की गई आरक्षण की अवधारणा को समय समय पर दिए गए न्यायिक आदेशों से कानूनी बल मिला है। इससे इसके समर्थकों को जहां राहत मिली, वहीं इसके विरोधी न्यायिक फैसला मानकर उन्हें शिरोधार्य करते गए। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 1951 में अदालत ने स्पष्ट किया है कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय के अनुसार जाति आधारित आरक्षण अनुच्छेद 15 (1) का उल्लंघन है। यह स्पष्टता मद्रास राज्य बनाम श्रीमती चंपकम दोराईरंजन एआईआर 1951 एससी 226) पहला संवैधानिक संशोधन (अनुच्छेद 15 (4)) फैसले को अमान्य करने के लिए पेश किया गया। वहीं, 1963 में एम आर बालाजी बनाम मैसूर एआईआर मामले में 1963 एससी 649 में अदालत ने आरक्षण पर 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा लगा दी।  तमिलनाडु ने 9वीं सूची के तहत 69 प्रतिशत और राजस्थान में 2008 की गुज्जर हिंसा के पहले, अगड़ी जातियों के 14 प्रतिशत सहित 68 प्रतिशत...

सिबिल जेनरेट कैसे होता है? लोन में इनकी क्या भूमिका होती है? सविस्तार जानिए

सिबिल जेनरेट कैसे होता है? लोन में इनकी क्या भूमिका होती है? सविस्तार जानिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार जब कोई व्यक्ति बैंकों से कर्ज (लोन) लेने जाता है तो बैंकिंग संस्थाएं उसकी सिबिल चेक करती हैं कि वह लोन लेने और उसे चुकाने लायक है भी या नहीं। यह सिबिल एक संस्था तैयार करती है और उसे अपडेट रखती है। यह संस्था ट्रांस यूनियन सिबिल लिमिटेड है, जिसे पहले सिबिल कहा जाता था। यह भारत की एक प्रमुख क्रेडिट सूचना कंपनी है, जो क्रेडिट संबंधित डेटा के आधार पर व्यक्तियों और कंपनियों की गहन क्रेडिट रिपोर्ट बनाती है।  बताया जाता है कि सिबिल द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रमुख डेटा में व्यक्तियों के लिए क्रेडिट स्कोर और कंपनियों के लिए क्रेडिट रैंक भी शामिल है, जो अक्सर नए क्रेडिट को अप्रुव करने के लिए एक निर्णायक कारक होता है।  यहां पर सवाल है कि सिबिल क्या है? यह किस प्रकार से काम करता है? क्रेडिट स्कोर और क्रेडिट रैंक का अर्थ क्या है? लाभार्थी के लिए उनका क्या महत्व है? सिबिल कैसे काम करता है? सिबिल स्कोर क्या है? सिबिल अकाउंट बनाने के लाभ क्या हैं? सिबिल अकाउंट कैसे बनाएं? सिबिल सद...

कोरोना के इलाज में खर्च हुई रकम और मौत के बाद मिले मुआवजे पर नहीं लगेगा कोई टैक्स

कोरोना के इलाज में खर्च हुई रकम और मौत के बाद मिले मुआवजे पर नहीं लगेगा कोई टैक्स @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार ने जनहित के नजरिए से निश्चय किया है कि कोरोना के इलाज में खर्च हुई रकम और मौत के बाद मिले मुआवजे पर किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं लगेगा। वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने स्पष्ट कर दिया है कि कोरोना के इलाज में खर्च हुई रकम और मौत के बाद मिले मुआवजे पर किसी भी प्रकार का कोई कर (टैक्स) नहीं लगेगा।  दरअसल, कोरोना के खिलाफ जारी लड़ाई को और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए उन्होंने टैक्स में छूट देने की जो बात कही है, उससे कोरोना पीड़ितों को भारी राहत मिली है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि यह छूट उन लोगों को ही मिलेगा, जिन्होंने कोरोना के इलाज में अपने पैसे खर्च किए हैं। वहीं, उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि मौत के बाद मिले मुआवजे पर भी कोई टैक्स नहीं लगेगा। बता दें कि कोविड के इलाज के लिए कंपनी या किसी दूसरे व्‍यक्ति से ली गई रकम पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। यह छूट कारोबारी साल 2019-20, 2020-21 और 2021-22 के लिए दी गई है। य...

घर चलाने वाली गृहिणियों की बचाई रकम पर अब नहीं लगेगा आयकर

घर चलाने वाली गृहिणियों की बचाई रकम पर अब नहीं लगेगा आयकर @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार क्या घर चलाने में गृहिणियों की बचाई हुई रकम पर इनकम टैक्स नहीं लगेगा, तो जवाब होगा कि नहीं, क्योंकि उत्तरप्रदेश के आगरा स्थित आईटीएटी ने गृहिणियों के हित में फैसला दिया है। आपको बता दें कि इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आईटीएटी) के एक बेंच ने यह मान लिया है कि महिलाएं घर चलाते समय कुछ न कुछ पैसे बचाती हैं। साथ ही, उन्हें पति से भी कुछ पैसे मिल जाते हैं। इसके अलावा, बच्चों को घर पर आए कुछ रिश्तेदारों से भी आशीर्वाद स्वरूप कुछ पैसे मिल जाते हैं जो कि अंतत: गृहिणी के बचत में ही शामिल हो जाता है। यही वजह है कि आयकर विभाग इस रकम को उस महिला की आमदनी नहीं बता सकता है। यहां पर यह स्पष्ट कर दें कि जो महिला शुद्ध रूप से गृहिणी (हाउसवाइफ) होती हैं, उनके उपर घर के सूक्ष्म प्रबंधन (आल टाइप ऑफ मैनेजमेंट) की भी जिम्मेदारी होती है। वास्तव में, घर गृहस्थी के रोज सौ काम होते हैं। हर दिन सुबह से ही उनका काम शुरू हो जाता है जो देर शाम तक अनवरत चलता ही रहता है। इस बीच कभी वह राशन लेती हैं, तो कभी दूध-अंडे-ब्...

शास्त्र नहीं, भक्तों की श्रद्धा से सुप्रसिद्ध होते हैं विट्ठल पांडुरंग जैसे जनप्रिय भगवान

शास्त्र नहीं, भक्तों की श्रद्धा से सुप्रसिद्ध होते हैं विट्ठल पांडुरंग जैसे जनप्रिय भगवान  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार भारतवर्ष श्रद्धा और ज्ञान की भूमि है। यहां के देवता शास्त्र नहीं, बल्कि भक्तों की श्रद्धा से स्थापित होते हैं। विट्ठल पांडुरंग भगवान उन्हीं में से एक हैं। वे महाराष्ट्र के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक और अग्रगण्य हैं। अपने क्षेत्रीय पहचान में भी वे राष्ट्रीय फलक से सम्बद्ध हैं। वे अपने दोनों हाथ कमर पर रख एक ईंट पर खड़े होते हैं। ईंट को क्षेत्रीय मराठी भाषा में वीट कहते हैं, जिससे विट्ठल नाम आता है।  बता दें कि उनकी जनप्रियता अलौकिक है। उनके दर्शन करने के लिए प्रति वर्ष हर लाखों वारकरी या तीर्थयात्री उनसे जुड़े आराध्यस्थल पंढरपुर की यात्रा करते हैं, जिसे वारी कहते हैं। इस यात्रा के दौरान उनके प्रति आस्थावान महिलाएं अपने सिर पर विट्ठल का पवित्र तुलसी का पौधा रखती हैं और वीरोचित पुरुष संतों के गीत गाये जाते हैं। सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, 13 वीं सदी में प्रख्यात संत ज्ञानेश्वर से लेकर आज तक के ज़्यादातर श्रद्धालु भगवान व...