संदेश

मार्च 9, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विदेशी आक्रांताओं के शुभचिंतकों को 'सनातन भूमि' में रहने का हक नहीं, समझे सरकार!

चित्र
विदेशी आक्रांताओं के शुभचिंतकों को 'सनातन भूमि' में रहने का हक नहीं, समझे सरकार! करे कार्रवाई! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक सनातन भूमि भारतवर्ष, जिसे जम्बूद्वीप, आर्यावर्त, आसेतु हिमालय आदि विभिन्न नामों से पुकारा गया है, में मुस्लिम आक्रमणकारियों और ब्रिटिश आतताई अधिकारियों के महिमामंडन का जो सियासी होड़ जब-तब मची रहती है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सवाल है कि इनसे जुड़े विभिन्न प्रतीक चिन्हों-स्मारकों आदि, इनके नाम पर बसाए गए गांवों-शहरों, नामांकित सड़कों या विभिन्न संस्थानों को मिटा क्यों नहीं दिया जाता, क्योंकि ये सनातन भूमि पर रिसते घाव की मानिन्द हैं।  यक्ष प्रश्न यह भी है कि आज इनकी जरूरत क्या है, किनको है और क्यों है? और यदि है तो फिर ऐसे देशद्रोहियों की यहां जरूरत है? यदि बाबर, अकबर, औरंगजेब जैसे क्रूर मुस्लिम शासकों या जनरल डायर जैसे क्रूर ब्रिटिश अधिकारियों या फिर ओसामा बिन लादेन, कसाब जैसे क्रूर आतंकवादियों का, पाकिस्तान-बंगलादेश जैसे फिरकापरस्त ताकतों के शुभचिंतक यहां हैं तो भारतीय प्रशासन का यह पहला कर्तव्य है कि राष्ट्रहित में इनकी शिनाख्...

आखिर कब तक जारी रहेंगे रियल एस्टेट के गोरखधंधे?

चित्र
आखिर कब तक जारी रहेंगे रियल एस्टेट के गोरखधंधे? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चाहे भूमि हो या सोना, इनकी कीमत अमूमन इसलिए बढ़ती रहती है, क्योंकि इसमें देश-दुनिया के 'धनपशुओं' का निवेश होता है। यहां पर 'धनपशुओं' का अभिप्राय उन नेताओं, उद्यमियों, अधिकारियों, सफेदपोश अपराधियों और उन मध्यमवर्गीय पेशेवरों के समझदारी भरे गठजोड़ से है, जो अवैधानिक रूप से खूब सम्पत्ति जोड़ते हैं और अपने नेटवर्क को लाभान्वित करते हैं। ऐसे लोग दुनियावी लोकतंत्र और संवैधानिक कानूनों को अपने आर्थिक हितों के मुताबिक समय समय पर मोड़वाते रहते हैं।  मसलन, इस खेल में देशी-विदेशी पूंजीपतियों और इन जैसों की एक मजबूत लॉबी होती है, जिनकी लक्षित लॉबिंग से अक्सर आम आदमी के दूरगामी हितों को कुचला जाता है। देश-दुनिया में जारी नई आर्थिक नीतियों ने इन्हें बेलगाम कर दिया है। क्रिप्टो करेंसी जैसी समानांतर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का बढ़ता प्रचलन और अधिकतर कैश लेन-देन में चलने वाले इनके बड़े-बड़े धंधे बहुत कुछ बयां कर जाते हैं। कहीं टैरिफ वार और कभी तस्करी से इन्हीं जैसों को तो फायदा पहुंचता है।...

बिहार में हिंदुत्व की समां बंधने से गैर भाजपा सियासी दलों की बढ़ी बेचैनी

चित्र
बिहार में हिंदुत्व की समां बंधने से सियासी दलों की बेचैनी बढ़ी @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बिहार में विधानसभा चुनाव इसी वर्ष अक्टूबर-नवम्बर महीने में होंगे। हालांकि, उससे महीनों पहले राज्य में धार्मिक और राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। कहीं एनडीए और यूपीए एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते प्रतीत हो रहे हैं तो कहीं उनके गठबंधन के अपने ही साथी एक-दूसरे को रणनीतिक मात देते हुए अपनी सीटें बढ़ाने को लेकर बेताब नजर आ रहे हैं। इस नजरिए से भाजपा-जदयू की धींगामुश्ती और राजद-कांग्रेस की अंदरूनी  कुश्ती के बीच चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी सबके बने बनाए खेल बिगाड़ रही है।  एक तरफ जहां धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है, वहीं हिंदुत्व का नया जनज्वार यहां भी पैदा होती दिखाई दे रही है। इससे जदयू के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कम, लेकिन पूर्व उपमुख्यमंत्री तजस्वी यादव और उनके समर्थक ज्यादा परेशान हैं। इस बीच बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री जब अपने हिंदू राष्ट्र के एजेंडे के साथ बिहार पहुंचे, तो रही सही कसर पूरी ...