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जून 18, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

निर्णय क्या है? इसके बारे में विद्वानों की क्या राय है? इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझिए।

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निर्णय क्या है? इसके बारे में विद्वानों की क्या राय है? इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझिए। @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस निर्णय सफलता की जननी है। सही वक्त पर लिया गया समुचित निर्णय उन्नति के मार्ग प्रशस्त करता है। अनुभव बताता है कि किसी अधिकारी/प्रबन्धक का महत्वपूर्ण कार्य निर्णय लेना है। पीटर ड्रकर के मुताबिक, प्रबन्धक जो कुछ भी करता है, निर्णयों के द्वारा ही करता है। हम जानते हैं कि प्रशासकों को दिन-प्रतिदिन अनेक कार्य करने पड़ते हैं और इन कार्यों को करने के लिए उनके पास अनेक विकल्प होते हैं। पर इन विकल्पों में से सर्वोंत्तम विकल्प कौन सा है, इसका निर्धारण करना ही 'निर्णय' लेना है। इसलिए जीवन जगत की इस महत्वपूर्ण विधा में हर किसी को निष्णात होना चाहिए।  टेरी ने इसके बारे में कहा है कि 'प्रशासकों का जीवन ही निर्णय लेना है। यदि प्रशासक की कोई सार्वभौमिक पहचान है, तो वह है उसका निर्णय लेना। प्रशासक को अपने निर्णय प्रबन्ध के कार्यों-नियोजित संगठन, निर्देशन, नियन्त्रण आदि के अन्तर्गत ही लेने पड़ते हैं। इस प्रकार, हम यह कह सकते हैं कि निर्णयन यानी निर्णय प्रबन्ध प्रक...

कर्म क्या है? मनीषियों ने इसके बारे में क्या-क्या निर्णय दिए हैं?

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कर्म क्या है? मनीषियों ने इसके बारे में क्या-क्या निर्णय दिए हैं? @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस किसी भी व्यक्ति के मन में कार्य करने की प्रेरणा अपने आप पैदा होती है। इससे जुड़ा हर निर्णय वह खुद लेता है जो देश-काल-पात्र की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसके बारे में सबकी अवधारणा अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन लक्ष्य एक होता है- समाज सेवा, राष्ट्र सेवा और निज धर्म सेवा, अन्य किसी को आहत किये बिना। दो टूक शब्दों में कहूँ तो कर्म हिंदू धर्म की वह अवधारणा है, जो एक प्रणाली के माध्यम से कार्य-कारण के सिद्धांत की व्याख्या करती है, जहां पिछले हितकर कार्यों का हितकर प्रभाव और हानिकर कार्यों का हानिकर प्रभाव प्राप्त होता है। जो पुनर्जन्म का एक चक्र बनाते हुए आत्मा के जीवन में पुनः अवतरण या पुनर्जन्म की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं की एक प्रणाली की रचना करती है।  कहा जाता है कि कार्य-कारण सिद्धांत न केवल भौतिक दुनिया में लागू होता है, बल्कि हमारे विचारों, शब्दों, कार्यों और उन कार्यों पर भी लागू होता है जो हमारे निर्देशों पर दूसरे किया करते हैं। जब पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है, तब...

कर्म निर्णय: गहन है कर्म, अकर्म और विकर्म की गति

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                          कर्म निर्णय: गहन है कर्म, अकर्म और विकर्म की गति @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।। आशय यह कि कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है। 'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्' यानी कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना ही कर्म के तत्त्व को जानना है, जिसका वर्णन आगे अठारहवें श्लोकमें 'कर्मण्यकर्म यः पश्येत्' पदों से किया गया है। कर्म स्वरूप से एक दीखने पर भी अन्तःकरण के भाव के अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं- कर्म, अकर्म और विकर्म। सकाम भाव से की गयी शास्त्र विहित क्रिया 'कर्म' बन जाती है। वहीं, फलेच्छा, ममता और आसक्ति से रहित होकर केवल दूसरों के हित के लिये किया गया कर्म 'अकर्म' बन जाता है। वहीं, विहित कर्म भी यदि दूसरे का हित करने अथवा उसे दुःख पहुँचाने के भाव से किया गया हो तो वह भी 'विकर्म' बन जाता है। नि...