कर्म निर्णय: गहन है कर्म, अकर्म और विकर्म की गति
@ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस
श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।। आशय यह कि कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।
'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्' यानी कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना ही कर्म के तत्त्व को जानना है, जिसका वर्णन आगे अठारहवें श्लोकमें 'कर्मण्यकर्म यः पश्येत्' पदों से किया गया है।
कर्म स्वरूप से एक दीखने पर भी अन्तःकरण के भाव के अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं- कर्म, अकर्म और विकर्म। सकाम भाव से की गयी शास्त्र विहित क्रिया 'कर्म' बन जाती है। वहीं, फलेच्छा, ममता और आसक्ति से रहित होकर केवल दूसरों के हित के लिये किया गया कर्म 'अकर्म' बन जाता है। वहीं, विहित कर्म भी यदि दूसरे का हित करने अथवा उसे दुःख पहुँचाने के भाव से किया गया हो तो वह भी 'विकर्म' बन जाता है। निषिद्ध कर्म तो 'विकर्म' है ही।
'अकर्मणश्च बोद्धव्यम्'- निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना ही अकर्म के तत्त्व को जानना है, जिसका वर्णन आगे अठारहवें श्लोक में 'अकर्मणि च कर्म यः' पदों से किया गया है। 'बोद्धव्यम् च विकर्मणः'- कामना से कर्म होते हैं। जब कामना अधिक बढ़ जाती है, तब विकर्म पापकर्म होते हैं।दूसरे अध्याय के अड़तीसवें श्लोक में भगवान ने बताया है कि अगर युद्ध-जैसा हिंसायुक्त घोर कर्म भी शास्त्र की आज्ञा से और समतापूर्वक जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःख को समान समझकर किया जाय, तो उससे पाप नहीं लगता। तात्पर्य यह है कि समतापूर्वक कर्म करने से दीखने में विकर्म होता हुआ भी वह 'अकर्म' हो जाता है।
शास्त्र निषिद्ध कर्म का नाम 'विकर्म' है। विकर्म के होने में कामना ही हेतु है। अतः विकर्म का तत्त्व है- कामना; और विकर्म के तत्त्व को जानना है- विकर्म का स्वरूप से त्याग करना तथा उसके कारण कामना का त्याग करना।
'गहना कर्मणो गतिः'- कौन-सा कर्म मुक्त करनेवाला और कौन-सा कर्म बाँधनेवाला है, इसका निर्णय करना बड़ा कठिन है। कर्म क्या है, अकर्म क्या है और विकर्म क्या है-इसका यथार्थ तत्त्व जानने में बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ विद्वान् भी अपने आपको असमर्थ पाते हैं। अर्जुन भी इस तत्व को न जानने के कारण ही अपने युद्ध रूप कर्तव्य-कर्म को घोर कर्म मान रहे हैं। अतः कर्म की गति यानी ज्ञान या तत्त्व बहुत गहन है।
कर्म जनित शंका के बारे में सत्रहवें श्लोक में भगवान ने 'बोद्धव्यं च विकर्मणः' पदों से यह कहा कि विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये। परन्तु उन्नीसवें से तेईसवें श्लोक तक के प्रकरण में भगवान ने 'विकर्म' के विषय में कुछ कहा ही नहीं! फिर केवल इस श्लोक में ही विकर्म की बात क्यों कही? वहीं, शंका के समाधान स्वरूप उन्नीसवें श्लोक से लेकर तेईसवें श्लोक- तक के प्रकरण में भगवान ने मुख्यरूप से 'कर्म में अकर्म' की बात कही है, जिससे सब कर्म अकर्म हो जायँ अर्थात् कर्म करते हुए भी बन्धन न हो। विकर्म कर्म के बहुत पास पड़ता है; क्योंकि कर्मों में कामना ही विकर्म का मुख्य हेतु है। अतः कामना का त्याग करने के लिये तथा विकर्म को निकृष्ट बताने के लिये भगवान ने विकर्म का नाम लिया है।
जिस कामना से 'कर्म' होते हैं, उसी कामना के अधिक बढ़ने पर 'विकर्म' होने लगते हैं। परन्तु कामना नष्ट होने पर सब कर्म 'अकर्म' हो जाते हैं। इस प्रकरण का खास तात्पर्य 'अकर्म' को जानने में ही है, और 'अकर्म' होता है कामना का नाश होने पर। कामना का नाश होने पर विकर्म होता ही नहीं; अतः विकर्म के विवेचन की जरूरत ही नहीं। इसलिये इस प्रकरण में विकर्म की बात नहीं आयी है। दूसरी बात पापजनक और नरकों की प्राप्ति कराने वाला होने के कारण विकर्म सर्वथा त्याज्य है। इसलिये भी इसका विस्तार नहीं किया गया है। हाँ, विकर्म के मूल कारण 'कामना' का त्याग करने का भाव इस प्रकरण में मुख्य रूप से आया है; जैसे-- 'कामसंकल्पवर्जिताः', 'त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्', 'निराशीः', 'समः सिद्धावसिद्धौ च', 'गतसङ्गस्य यज्ञायाचरतः'। इस प्रकार विकर्म के मूल 'कामना' के त्याग का वर्णन करने के लिये ही इस श्लोक में विकर्म को जानने की बात कही गयी है।
कर्म के सम्बन्ध में कहा गया है कि अब भगवान् कर्मों के तत्त्व को जानने वाले मनुष्य की ही प्रशंसा करते हैं। तुझे यह नहीं समझना चाहिये कि केवल देहादि की चेष्टा का नाम कर्म है और उसे न करके चुपचाप बैठ रहने का नाम अकर्म है। उसमें जानने की बात ही क्या है यह तो लोक में प्रसिद्ध ही है। क्यों ऐसा नहीं समझना चाहिये, इस पर कहते हैं कि कर्म का शास्त्र विहित क्रिया का भी रहस्य जानना चाहिये। विकर्म का शास्त्र वर्जित कर्म का भी रहस्य जानना चाहिये और अकर्म का अर्थात् चुपचाप बैठ रहने का भी रहस्य समझना चाहिये। क्योंकि कर्मों की अर्थात् कर्म, अकर्म और विकर्म की गति, उनका यथार्थ स्वरूप तत्त्व बड़ा गहन है। यह समझने में बड़ा ही कठिन है।
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