'वीआरएस लेना उचित नहीं! कर्मभूमि में डटे रहिए'
'वीआरएस लेना उचित नहीं! कर्मभूमि में डटे रहिए'
@ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस, जिलाधिकारी, जौनपुर, उत्तरप्रदेश
उत्तरप्रदेश में सरकारी कार्यसंस्कृति में आमूलचूल बदलाव आया है, जिससे वर्तमान में सरकारी कर्मियों पर, खासकर प्रशासनिक अधिकारियों के ऊपर कार्य दबाव निःसन्देह है, यह मैं भी मानता हूँ, लेकिन कार्य निष्पादन, निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी पूरी मिली हुई है ताकि बेहतर कार्य हो सके। निश्चय ही ऐसा हो भी रहा है।
परंतु, कार्य के दबाव में उत्कृष्ट प्रशासनिक सेवाओं से स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण यानी वीआरएस (VRS) लेने की पनपती प्रवृत्ति उचित नहीं है। वास्तव में, वीआरएस लेकर आप आमलोगों की सेवा करते रहने के नानाविध अवसर से वंचित हो जाते हैं। इसलिए मेरी राय में ऐसी प्रवृत्ति किसी सफल जीवन जीने का अंदाज नहीं है, और न ही इसे समझा जाना चाहिए।
निर्विवाद रूप में कहा गया है कि,
"मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।"
वाकई प्रशासनिक सेवाओं में लोकहितार्थ उपर्युक्त संकल्प से ही कार्य किया जाता है। साधन है स्वल्प, फिर भी पूर्ण करूँगा संकल्प।
जैसा कि अठारह पुराणों में महर्षि वेदव्यास जी ने दो मुख्य वचन (वचनद्वयम्) दिए हैं:-
"अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥"
अर्थात दूसरों का भला करना या उपकार करना ही सबसे बड़ा पुण्य है, जबकि दूसरों को दुःख या पीड़ा पहुँचाना सबसे बड़ा पाप है।
देखा जाए तो यह श्लोक अठारह पुराणों के सार (निचोड़) को दर्शाता है, जो मानव जीवन में नैतिक आचरण का महत्व बताते हैं। कोई भी सक्षम ऑफिसर वीआरएस न ले, यह मेरा विचार है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपने निर्णय के लिए स्वतंत्र है। सच कहूं तो कार्यों के दबाव में वीआरएस लेना जीवन की चुनौतियों से बचना है। जबकि चुनौतियों से हटना, बचना एवं डरना कायरता की श्रेणी में आता है।
यदि किसी को वीआरएस लेना है तो उन्मुक्त गगन में अपने दिवास्वप्नों को पूर्ण करने के लिए लें, सदैव स्वागत है। यह समझा जाता है कि मतदाता सूची शुद्धिकरण से जुड़ी 'एसआईआर' की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण है। परंतु इससे कोई दबाव महसूस करे, यह उपयुक्त एवं औचित्यपूर्ण नहीं है। खासकर पीसीएस (PCS) एवं आईएएस (IAS) सेवा में आने वाले अभ्यर्थियों का चयन ही उनके उत्कृष्ट कर्म के आधार पर दृश्यमान ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर होता है। ऐसे में अधिकारियों से देश व समाज को बहुत ही सकारात्मक अपेक्षाएं रहती हैं।
मेरा स्पष्ट मानना है कि "सेवा में आने के पश्चात कार्यों के दबाव में अपने मनोबल एवं स्वाभिमान से समझौता मत करो, परन्तु कार्य करने एवं संघर्ष करने की प्रतियोगी परीक्षा की आदत को स्मरण करके उत्कृष्ट कार्य करो।" ऐसा इसलिए कि आप बहुत महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट हैं। सभी लोग आपका ही अनुशरण करते हैं।
आपके मनोबल को बढ़ाने वालीं काव्यात्मक पंक्तियां हैं-
"अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो।
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।।"
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"सच है विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है।
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते।"
इसलिए, वीआरएस लेना है तो खुशी से लो, कर्म तो जीवन में करना ही पड़ेगा। आप उत्कृष्ट हैं, यह मान रखो।
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