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After all, why are peace agreements between America and Iran being broken again and again? Who is responsible?

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आखिर अमेरिका और ईरान के शांति समझौते बार बार क्यों टूट जा रहे हैं? जिम्मेदार कौन? https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक ईसाई मुल्कों का अगुवा अमेरिका और इस्लामिक देशों का कथित अगुवा ईरान के बीच होने वाले शांति समझौते बार-बार यानी ब्रेक के बाद टूट जा रहे हैं। यह स्थिति वैश्विक शांति और प्रगति के लिए अच्छी नहीं समझी जा सकती है।सवाल है कि आखिर इन शांति समझौतों के टूटने की क्या वजह है? क्या कतर, पाकिस्तान और कुवैत जैसे मुल्क इनके बीच मध्यस्थता करवाने में विफल हो चुके हैं? या फिर अमेरिका-ईरान के अंतरराष्ट्रीय दांवपेंच इनकी समझ से बाहर हैं!  राजनीतिक व कूटनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसका  कारण केवल एक घटना नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही गहरी अविश्वास की राजनीति है। इसके पीछे जी-7 और ब्रिक्स के अलावा ओआईसी देशों की खल नीति का  भी बड़ा हाथ है। भोजपुरी में एक कहावत है- "जबरा मारे, रोवन न दे।" यानी कि मजबूत व्यक्ति किसी की लक्षित पिटाई करता है तो रोने भी नहीं देता ह...

Yaksha Question: Will the goal of Developed India 2047 be achieved in 2075?

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यक्ष प्रश्न: क्या विकसित भारत 2047 का लक्ष्य 2075 में हासिल होगा? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 यदि आप विकसित भारत 2047 का स्वप्न देख रहे हैं तो थोड़ा संभल जाइए, क्योंकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने यह तर्क दिया है कि यदि भारत की मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर, उत्पादकता और रोजगार सृजन की गति में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ, तो भारत को "विकसित देश" बनने में 2047 के बजाय 2075 तक का समय लग सकता है। बता दें कि यह कोई आधिकारिक सरकारी अनुमान नहीं है, बल्कि कतिपय अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए एक आर्थिक विश्लेषण पर आधारित दृष्टिकोण मात्र है, जो सत्य के निकट है या परे, यह भविष्य के गर्भ में है। हाँ, इतना जरूर है कि इससे विपक्ष को सत्तापक्ष की खिल्ली उड़ाने का एक मौका जरूर मिल गया है। दरअसल, इस संदर्भ में चर्चित अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने भी कहा कि यदि वर्तमान गति ऐसी ही बनी रही, तो विकसित भारत का लक्ष्य 2047 तक हासिल करना कठिन हो सकता है। मसलन, Surjit Bhalla का आशय यह है कि केवल उच्च ...

The international implications of the bomb blast that occurred during French President Emmanuel Macron's visit to Syria are profound.

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फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सीरिया यात्रा के दौरान हुई बम विस्फोट की घटना के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ बहुत गहरे @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 जिस तरह से फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सीरिया यात्रा के दौरान बम विस्फोट की घटना हुई, वह वीवीआइपी लोगों की सुरक्षा सम्बन्धी वैश्विक लापरवाही का तकाजा नहीं तो क्या है? यह विस्फोट केवल एक सुरक्षा घटना नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि सीरिया में राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद स्थिरता की राह अभी लंबी है और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को अस्थिर करने की कोशिशें जारी रह सकती हैं। बता दें कि Emmanuel Macron की हालिया Syria यात्रा के दौरान Damascus में हुए दो विस्फोट केवल एक सुरक्षा घटना नहीं थे, बल्कि इनके कई व्यापक अंतरराष्ट्रीय और सामरिक संकेत हैं जिन्हें समझने की जरूरत है।  प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, विस्फोट उस होटल के निकट हुए जहाँ फ्रांसीसी प्रतिनिधिमंडल ठहरा हुआ था। घटना में कई लोग घायल हुए, हालांकि म...

Why does the opposition differentiate between offering theft and Waqf theft?

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आख़िर चढ़ावा चोरी और वक्फ चोरी में फर्क क्यों करता है विपक्ष? जानिए https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक किसी भी लोकतंत्र की सफलता राजनीतिक दलों की नेकनीयती और दूरदर्शिता पर निर्भर करती है, लेकिन जब राजनीतिक दल ही दोहरी, दोमुंही, पक्षपाती बातचीत करने लगें तो नीतियां शर्माएंगी और इनके द्वारा बनाए हुए कानून वकीलों के स्वर्ग बन जाएंगे। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत भी इन्हीं विडंबना भरी सियासी परिस्थितियों से दो चार होता आया है।  जहां धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, राष्ट्रभाषा, सुशासन, मौलिक सनातन संस्कृति और विकास आदि पर हमारे दलों की मतभिन्नताओं की कीमत भारतवासी चुकाते आए हैं।वहीं, आजकल भारत के सियासी गलियारों में एक प्रश्न बहुत तेजी से चर्चित/वायरल हो रहा है कि आख़िर 'चढ़ावा चोरी' और 'वक्फ चोरी' में विपक्ष फर्क क्यों करता है?  यूँ तो यह एक राजनीतिक प्रश्न है, और इसका उत्तर किसी एक तथ्य से नहीं दिया जा सकता क्योंकि सभी विपक्षी दलों का रुख एक ज...

Samrat Choudhary's political acumen: Is Bihar's politics truly entering a new era?

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सम्राट चौधरी की सियासी सूझबूझ: क्या बिहार की राजनीति सचमुच नए दौर में प्रवेश कर रही है? https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार की राजनीति में बदलाव का दावा नया नहीं है, लेकिन हर दौर में उसकी कसौटी अलग रही है। कभी सामाजिक न्याय सबसे बड़ा राजनीतिक विमर्श बना, तो कभी सुशासन केंद्र में आया और अब विकास, निवेश तथा प्रशासनिक स्थिरता को लेकर नई बहस दिखाई देती है। ऐसे समय में भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रमुख रणनीतिकार के रूप में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की राजनीतिक भूमिका स्वाभाविक रूप से चर्चा के केंद्र में है। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के गठन के बाद सम्राट चौधरी ने संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की कोशिश की। गठबंधन की राजनीति में संवाद बनाए रखना, विभिन्न नेताओं के बीच तालमेल और कार्यकर्ताओं के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखना उनकी प्रमुख राजनीतिक प्राथमिकताओं में रहा है। इससे सरकार को अपेक्षाकृत स्थिर राजनीतिक वातावरण...

Rann of Bankipur Vis by-election: not a seat, the political direction of Bihar exam

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बांकीपुर विस उपचुनाव का रण: एक सीट नहीं, बिहार की राजनीतिक दिशा की परीक्षा # जनादेश केवल विधायक नहीं चुनेगा, बल्कि सत्ता, विपक्ष और नए राजनीतिक विकल्पों की विश्वसनीयता भी परखेगा https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 @ प्रणय राज, युवा राजनीतिक विश्लेषक बिहार की राजनीति में कुछ चुनाव ऐसे होते हैं, जिनका महत्व उनकी भौगोलिक सीमाओं से कहीं अधिक होता है। पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव भी ऐसा ही चुनाव बनता जा रहा है। यह केवल रिक्त हुई एक विधानसभा सीट को भरने का संवैधानिक उपक्रम नहीं, बल्कि राज्य की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों, सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रति जनता के विश्वास, विपक्ष की प्रभावशीलता और उभरते राजनीतिक विकल्पों की स्वीकार्यता की महत्वपूर्ण परीक्षा है। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव अपनी परंपरागत शहरी राजनीतिक पकड़ और संगठनात्मक क्षमता को बनाए रखने की चुनौती है। वहीं जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए यह पहली प्रत्यक्ष चुनावी परीक्षा है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनकी पहचान पहले से स्...

Prime Minister Narendra Modi's visits to Australia, New Zealand, and Indonesia will give momentum to the Indo-Pacific strategy.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और इंडोनेशिया यात्रा से परवान चढ़ेगी इंडो-पैसिफिक रणनीति     client=ca-pub-6262725213669814 @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और इंडोनेशिया यात्रा को केवल तीन देशों के दौरे के रूप में नहीं, बल्कि भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति, आर्थिक कूटनीति और संतुलित विदेश नीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए इसके कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक मायने निकलते हैं, जिन्हें हम सबको समझना चाहिए। पहला, इंडो-पैसिफिक में भारत की भूमिका मजबूत करना:  ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड, दोनों हिंद-प्रशांत क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक साझेदार हैं। इन देशों के साथ सहयोग बढ़ाकर भारत यह संदेश देता है कि वह क्षेत्र में नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था, स्वतंत्र नौवहन और स्थिरता का समर्थक है। दूसरा, चीन को संतुलित करने की रणनीति: हालांकि भारत खुले तौर पर किसी देश का नाम नहीं लेता, लेकिन यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब चीन का प्रभाव प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व ...