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जानिए, महाराणा प्रताप वीरता की कैसे अखिल भारतीय पहचान बने, जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी

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प्रतापी सम्राट महाराणा प्रताप भारतीय वीरता की राष्ट्रवादी पहचान बने, उनके अवदानों को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में परखिए @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस, विशेष सचिव, पीडब्ल्यूडी, उत्तर प्रदेश सरकार प्रतापी सम्राट महाराणा प्रताप भारत के इतिहास के सबसे वीर, स्वाभिमानी और संघर्षशील राजाओं में गिने जाते हैं। वे मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के शासक थे और मुगल सम्राट अकबर के सामने कभी झुके नहीं। उनका जीवन स्वतंत्रता, राष्ट्रगौरव और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है। आज 9 मई भारत के इतिहास का एक गौरवशाली दिवस है। यह दिन वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जन्म जयंती के रूप में पूरे देश में श्रद्धा, सम्मान और गर्व के साथ मनाया जाता है।  भारत वीरो की भूमि है। भारत भूमि ने सनातन धर्मसंस्कृति से लेकर अब तक वीर सूरमाओं को जन्म देकर भारत भूमि की रक्षा के लिए ऐसे इतिहास पुरुषों को पैदा किया है, जिनको स्मरण किया जाना प्रासंगिक ही नहीं, अपितु राष्ट्र गौरव की रक्षा के लिए प्रासंगिक भी है। भारत महावीरों की धरती है और इस पवित्र धरती ने समय-समय पर ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने...

सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक निहितार्थ को समझिए

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सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक निहितार्थ को समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार के कई गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह केवल सत्ता संचालन का मामला नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय स्तर का शक्ति प्रदर्शन बना दिया।  पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा को मिली अभूतपूर्व विजय से बिहार का महत्व और भी बढ़ चुका है, क्योंकि पश्चिम, उत्तर, मध्य भारत के बाद पूर्वी भारत में भाजपा ने गजब का विस्तार किया है। इसे बरकरार रखने में बिहार की अहम भूमिका होगी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सम्राट मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि बिहार में भाजपा अब “सहयोगी दल” नहीं बल्कि “मुख्य धुरी” बनना चाहती है। यही वजह है कि वह एनडीए के सामाजिक समीकरणों को फिर से पुनर्गठित कर रहा है। खासकर 'नीतीश युग' से 'सम्राट युग' क...

बिहार में सम्राट सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक मायने

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बिहार में सम्राट सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार के कई गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह केवल सत्ता संचालन का मामला नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय स्तर का शक्ति प्रदर्शन बना दिया।  राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सम्राट मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि बिहार में भाजपा अब “सहयोगी दल” नहीं बल्कि “मुख्य धुरी” बनना चाहती है। एनडीए सामाजिक समीकरणों को फिर से पुनर्गठित कर रहा है। नीतीश युग से सम्राट युग की ओर नियंत्रित संक्रमण शुरू हो चुका है। 2029 की राजनीति की नींव अभी से रखी जा रही है। वहीं, ग्रेटर बंगलादेश के सपनों को नेस्तनाबूद करने की अंदरूनी तैयारी जारी है। पहला, भाजपा का “नया बिहार नेतृत्व” स्थापित करने की कोशिश सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने बिहार में “प...

इंजीनियर कुमार शैलेंद्र की राजनीतिक सफलता को ऐसे समझिए

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इंजीनियर कुमार शैलेंद्र की राजनीतिक सफलता को ऐसे समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक इंजीनियर कुमार शैलेंद्र की राजनीतिक सफलता को बिहार की बदलती सामाजिक और संगठनात्मक राजनीति के संदर्भ में समझना होगा। इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आने वाले कुमार शैलेंद्र ने तकनीकी शिक्षा, संगठनात्मक अनुशासन और क्षेत्रीय जनाधार को मिलाकर अपनी अलग पहचान बनाई। अब बिहार सरकार में मंत्री पद तक पहुंचना उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। उनकी सफलता के पीछे कई प्रमुख कारण दिखाई देते हैं— # तकनीकी और शिक्षित छवि इंजीनियर होने के कारण उनकी पहचान एक पढ़े-लिखे, प्रशासनिक समझ रखने वाले नेता के रूप में बनी। भाजपा और एनडीए अब ऐसे नेताओं को आगे बढ़ा रहे हैं जिनकी छवि केवल जातीय राजनीति तक सीमित न होकर “विकासवादी” भी हो। # संगठन में लगातार सक्रियता कुमार शैलेंद्र ने लंबे समय तक जमीनी स्तर पर संगठनात्मक राजनीति की। बूथ स्तर से लेकर क्षेत्रीय समीकरणों तक उनकी सक्रियता ने उन्हें पार्टी नेतृत्व का भरोसेमंद चेहरा बनाया। # ओबीसी-सामाजिक समीकरण बिहार की राजनीति...

धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहा 'इंडिया गठबंधन' तोड़ रहा है सियासी दम? जानिए कैसे

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धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहा 'इंडिया गठबंधन' तोड़ रहा है सियासी दम? जानिए कैसे @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा मूलतः “सर्वधर्म समभाव” और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता पर आधारित रही है। लेकिन पिछले कई दशकों में भारतीय राजनीति के एक हिस्से ने इसे सामाजिक संतुलन के बजाय “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” के राजनीतिक औजार के रूप में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि आज अनेक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल वैचारिक संकट से गुजरते दिखाई दे रहे हैं। सच कहूं तो वे सभी धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहे हैं, 'इंडिया गठबंधन' के सहयोगी दल कांग्रेस की बेरुखी से अपना अपना सियासी दम तोड़ते जा रहे हैं! जानिए कैसे जहां कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक खुद को धर्मनिरपेक्ष राजनीति की केंद्रीय धुरी के रूप में स्थापित रखा। परंतु समय के साथ उस पर यह आरोप मजबूत होता गया कि उसने बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और वोट बैंक आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने ...

हिंदुत्व पर फिदा हुए वोटर, तुष्टीकरण की निकल गई कचूमर!

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हिंदुत्व पर फिदा हुए वोटर, तुष्टीकरण की निकल गई कचूमर! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने हिंदुत्व की राजनीति को केवल चुनावी नहीं, बल्कि वैचारिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी बड़ा बल दिया है। विशेषकर उन राज्यों में, जहाँ पहले भाजपा या हिंदुत्व आधारित राजनीति को सीमित माना जाता था, वहाँ मिली सफलता ने यह संदेश दिया है कि हिंदुत्व अब केवल उत्तर भारत की राजनीतिक धारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का स्थायी केंद्र बन चुका है। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि हिंदुत्व केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान” का राजनीतिक मॉडल है। यही वजह है कि हिंदुत्व पर वोटर फिदा हुए, जिससे सियासी तुष्टीकरण की कचूमर निकल गई।  पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति का नया संदेश दे दिया है, वह यह कि अब वोटर केवल जातीय समीकरण या तुष्टीकरण की राजनीति से प्रभावित नहीं हो रहा, बल्कि वह सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रवाद, सुरक्षा और मजबूत नेतृत्व को प्राथमिकता दे रहा है। हिंदुत्व अब सिर्फ वैचारिक ...

पश्चिम बंगाल में भाजपा की चली सुनामी के सियासी मायने दूरगामी महत्व वाले!

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पश्चिम बंगाल में भाजपा की चली सुनामी के सियासी मायने दूरगामी महत्व वाले! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक केंद्र में विगत बारह वर्षों से सत्तारूढ़ 'भारतीय जनता पार्टी' ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में निर्णायक जीत दर्ज करके जनसंघ के संस्थापक और बंगाल मूल के दूरदर्शी हिंदूवादी राजनेता पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अद्भुत श्रद्धांजलि दी है। सच कहूं तो आरएसएस के इस सुप्रसिद्ध सिपाही का कश्मीर में दिया हुआ सियासी बलिदान व्यर्थ नहीं गया। खासकर यह उपलब्धि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर भाजपा द्वारा उसे दिया हुआ बहुमूल्य वैचारिक तोहफा है।  पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत केवल सरकार बदलने की घटना नहीं होगी, बल्कि यह भारतीय राजनीति में “पूर्वी भारत के वैचारिक परिवर्तन” का प्रतीक मानी जाएगी। इससे विपक्ष का शक्ति-संतुलन बदलेगा, भाजपा का राष्ट्रीय आत्मविश्वास बढ़ेगा और बंगाल की दशकों पुरानी राजनीतिक संस्कृति में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। कम शब्दों में कहा जाए तो भय हारा और भरोसा जीता है। भद्रलोक के हृ...