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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्पों और उपलब्धियों के राजनीतिक मायने समझिए

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्पों और उपलब्धियों के राजनीतिक मायने समझिए  "आने वाले समय में राजनीतिक बहस के तीन प्रमुख प्रश्न हो सकते हैं: एक, 25 वर्षों में क्या बदला और किसे कितना लाभ मिला? दो, विकास और कल्याण के दावों को जमीन पर कैसे मापा जाए? तीन, 2047 के लक्ष्य को पूरा करने के लिए अगले चरण की प्राथमिकताएँ क्या होंगी?" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  जोड़-तोड़ वाली भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के प्रमुख के रूप में 25 वर्ष तक अनवरत रूप से कार्य करना कोई साधारण बात नहीं है। पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर भारत कब प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने इस बेमिसाल उपलब्धि को साकार करके दिखा दिया है और उनकी यह यात्रा जारी है। इस मौके पर उन्होंने अपने संकल्पों और उपलब्धियों का जो जिक्र किया है, वो वाकई कबीलेगौर हैं।  मसलन, 7 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार के प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अपने राजनीतिक सफर को मुख्यतः सेवा, जनविश्वास, मिशन और विकसित भारत के फ्रेम में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा ...

जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है?

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जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है? "दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभिन्न दल अपनी अपनी नीतियों और नैरेटिव के जरिए इस वर्ग को साधने का प्रयास करते हैं।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  भारत में दलित राजनीति किसी एक नेता या एक पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग राज्यों में अलग सामाजिक समूह, दलित उप-समुदाय और राजनीतिक गठबंधन अलग नेताओं को प्रभाव देते हैं। भले ही अपने अपने जमाने में बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर, जगजीवन राम और मान्यवर कांशीराम ने दलित राजनीति की जो राष्ट्रीय साख स्थापित की, उस पर दावेदारी को लेकर दलित नेता, अन्य दलित नेताओं की राह में सियासी कांटे बिछाने से बाज नहीं आ रहे हैं, जिससे राज्यवार अलग अलग नेता मजबूत हो रहे हैं और उन्हें उनके ही राज्य में दूसरे दलित नेता भी कड़ी चुनौती दे रहे हैं।  इस प्रकार  दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभ...

यदि प्राकृतिक जैव विविधता बची रहेगी, तभी मनुष्य और अन्य प्राणी पृथ्वी पर सुरक्षित व सुखी रहेंगे

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यदि प्राकृतिक जैव विविधता बची रहेगी, तभी मनुष्य और अन्य प्राणी पृथ्वी पर सुरक्षित व सुखी रहेंगे  "विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस की असली सफलता उस दिन नहीं मापी जानी चाहिए जिस दिन कार्यक्रम हुआ, बल्कि इस बात से तय होगी कि उसके बाद हमारे व्यवहार में प्रकृति के प्रति कितनी स्थायी जिम्मेदारी आई।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार  संपूर्ण जगत में 3 अक्टूबर को विश्व प्रकृति दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य प्रकृति के महत्व, पर्यावरणीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।  विश्व प्रकृति दिवस की शुरुआत 3 अक्टूबर 2010 से हुई है, जिसे विश्व प्रकृति संगठन (WNO) ने प्रारंभ किया है। इसका उद्देश्य लोगों, संस्थाओं और संगठनों को प्रकृति तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक और सक्रिय करना था। इस दिन विशेष रूप से वन और जैव-विविधता का संरक्षण, जल एवं प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा, जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता, वन्यजीव और उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण,  प्रदूषण और...

विभिन्न युद्धों में उलझे देशों को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस से प्रेरणा लेनी चाहिए

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विभिन्न युद्धों में उलझे देशों को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस से प्रेरणा लेनी चाहिए         (अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2अक्टूबर पर विशेष) "भारत के लिए यह दिवस अपनी ऐतिहासिक विरासत के कारण विशेष महत्व रखता है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को केवल व्यक्तिगत नैतिकता नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के साधन के रूप में प्रयोग किया। उनके आंदोलनों ने दिखाया कि बड़े पैमाने पर नागरिक भागीदारी हिंसा के बिना भी राजनीतिक परिवर्तन के लिए दबाव बना सकती है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्मतिथि 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में  मनाने का निर्णय लिया। इसका मूल संदेश है कि संघर्षों का समाधान हिंसा के बजाय संवाद, समझ, न्याय और शांतिपूर्ण साधनों से खोजा जाए।  जब दुनिया के कई हिस्से सशस्त्र संघर्षों, हिंसा और मानवीय संकटों से जूझ रहे हैं,  तो ऐसे समय में यह दिवस और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। भारत के लिए यह दिवस अपनी ऐतिहासिक विरासत के का...

वृद्ध व्यक्ति परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवित पूंजी हैं!

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वृद्ध व्यक्ति परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवित पूंजी हैं! (अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस 1 अक्टूबर पर विशेष) @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार  वृद्ध व्यक्ति परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवित पूंजी हैं। लिहाजा उनके लिए एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें उम्र बढ़ने का अर्थ निर्भरता और अकेलापन नहीं, बल्कि गरिमा, सुरक्षा, सक्रियता और अनुभव के सम्मान के साथ लंबा जीवन हो। यही बढ़ती हुई वैश्विक वृद्ध आबादी के लिए स्वस्थ और समावेशी समाज की दिशा है।  अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस (1 अक्टूबर) केवल बुजुर्गों के सम्मान का दिन नहीं, बल्कि यह सोचने का अवसर है कि बढ़ती उम्र में हर व्यक्ति को सम्मान, स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक भागीदारी कैसे मिले? इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने 1 अक्टूबर को यह दिवस घोषित किया था।  # जानिए आज दुनिया और भारत में वृद्धों की स्थिति क्या है? दुनिया तेजी से वृद्ध हो रही है। 2025 में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लगभग 1.2 अरब लोग थे; 2050 तक यह संख्या लगभग 2.1 अरब होने का अनुमान...

डिजिटल रुपया क्या है? यह यूपीआई से कैसे अलग है? इसे बिना इंटरनेट के कैसे चलाया जाएगा?

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डिजिटल रुपया क्या है? यह यूपीआई से कैसे अलग है? इसे बिना इंटरनेट के चलाने के लिए आरबीआई क्या तैयारी कर रही है? "UPI पैसे भेजने का डिजिटल रास्ता है, जबकि e₹ स्वयं डिजिटल रुपया है। RBI की ऑफलाइन रणनीति का लक्ष्य e₹ को इस तरह विकसित करना है कि इंटरनेट न होने पर भी डिजिटल भुगतान के कुछ रूप संभव हों।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  डिजिटल रुपया (e₹) और यूपीआई (UPI) दोनों डिजिटल भुगतान से जुड़े हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है। आइए सबसे पहले जानते हैं कि डिजिटल रुपया क्या है? दरअसल डिजिटल रुपया या e₹ भारत की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जारी करता है, इसलिए यह स्वयं रुपये का डिजिटल रूप है—जैसे ₹100 का नोट भौतिक रूप में है, वैसे ही e₹ डिजिटल रूप में। इसे डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है।  भारतीय रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि डिजिटल रुपया अब खुदरा व थोक दोनों क्षेत्रों में पायलट चरण में है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 'ई' ₹ को बैंकों और गैर-बैंक संस्थाओं के डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है। इससे व्यक्ति-से...

रणनीतिक सामग्रियों के उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ रहा है भारत

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रणनीतिक सामग्रियों के उत्पादन में  तेजी से आगे बढ़ रहा है भारत "भारत के पास रणनीतिक सामग्री बनने की पर्याप्त आधारभूत क्षमता है; चुनौती संसाधन की कमी से ज्यादा उन्हें बड़े पैमाने पर उच्च-मूल्य, उच्च-शुद्धता वाले तैयार पदार्थों में बदलने की है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  रणनीतिक सामग्री वे खनिज, धातु और उन्नत पदार्थ हैं जिनकी उपलब्धता किसी देश की रक्षा, ऊर्जा-सुरक्षा, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, परमाणु तकनीक, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन और उच्च-तकनीकी उद्योगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इनकी आपूर्ति कुछ देशों में केंद्रित होने के कारण इनका आर्थिक और सामरिक महत्व बढ़ जाता है। https://www.pravakta.com/elderly-individuals-are-not-a-burden-on-the-family-rather-they-are-a-living-asset-to-both-the-family-and-society/ भारत ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत विगत 12 वर्षों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। इससे इस बात की उम्मीद बंधती है कि आने वाले वर्षों में अपनी सटीक रणनीति के तहत भारत इस क्षेत्र में भी बुलंदियों पर ...