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क्या 'समाजवादी परिवार' की रिक्तता को भर पाएंगे समाजवादी पृष्ठभूमि के राजनीतिक दल?

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क्या 'समाजवादी परिवार' की रिक्तता को भर पाएंगे समाजवादी पृष्ठभूमि के राजनीतिक दल? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पहले कांग्रेस ने और अब भाजपा ने, जिस तरह से समाजवादी दलों को उनके साथ मिलकर बारी-बारी पूर्वक  निपटा दिया है, यह भारत की कूटनीतिक राजनीतिक परंपरा है। खासकर यह राजनेताओं व उनके कार्यकर्ताओं के लिए सियासी शोध-अनुसंधान का विषय है। ऐसा इसलिए कि पहले देश-दुनिया में समाजवादी और वामपंथी विचारधाराओं से प्रेरित दलों के बीच खुली टकराहट हुआ करती थी। जिसके दृष्टिगत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मध्यममार्गी राजनीति का रास्ता अख्तियार किया और देश को आजादी दिलाते हुए केंद्र-राज्य में सत्तारूढ़ होकर अपने राजनीतिक उद्देश्य में कामयाब हुई। हालांकि, कांग्रेस की दूरदर्शिता पूर्ण अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीतियों व अन्य कारणों से कांग्रेस सेवा दल में फूट पड़ी और 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' (आरएसएस) का जन्म हुआ। जो हिंदुत्व व राष्ट्रीय विरासत पर गर्व करने वाला राष्ट्रवादी समाजसेवी संगठन है। इसी के राजनीतिक मुखौटे के रूप में पहले जनसंघ लोकप्रिय हुआ और अब भारत...

आखिर इस्लामिक देशों के संगठन ने क्यों नहीं दिया ईरान का साथ?

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आखिर इस्लामिक देशों के संगठन ने क्यों नहीं दिया ईरान का साथ? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक लगभग साढ़े चार दर्जन इस्लामिक देशों के संगठन (OIC) के रहते हुए भी इजरायल व अमेरिका ने देश-दुनिया में शरिया प्रेरित इस्लामिक हुकूमत लाने को प्रतिबद्ध शिया मुल्क ईरान को जो खस्ताहाल बना दिए, वह दुनियावी देशों के लिए एक नसीहत के साथ-साथ कूटनीतिक चिंतन का भी विषय है। वहीं, ईरान ने भी इजरायल/अमेरिका और उनके कथित समर्थक विघ्नसन्तोषी ओआईसी के सदस्य देशों में स्थित अमेरिकी/यूरोपीय सैन्य अड्डों के ऊपर ताबड़तोड़ आक्रामक हमले करके यह जतला दिया कि अब्राहम परिवार और मुस्लिम समुदाय के भुलावे में वह नहीं पड़ने वाला!  उधर, चीन, उत्तर कोरिया और रूस का प्रत्यक्ष शह भी ईरान को "बर्बाद" होने से यदि नहीं रोक पाए तो इसके मौलिक कारणों और कूटनीतिक वजहों को गहराई से पड़ताल करके एक एक कर समझने की जरूरत है, ताकि भविष्य की रणनीतिक गलतियों से चेता जा सके। इसलिए पहले यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस्लामिक देशों के संगठन ने क्यों नहीं दिया ईरान का साथ? इसकी वजहें निम्नलिखित हैं- पहला य...

आखिर इजराइल कैसे अपने साथ-साथ शेष दुनिया की भी आतंकी प्रवृति से रक्षा करता है? समझिए

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आखिर इजराइल कैसे अपने साथ-साथ शेष दुनिया की भी आतंकी प्रवृति से रक्षा करता है? समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक आतंकवादी शासन, लोकतंत्र से इतर धार्मिक उन्माद से प्रेरित तानाशाही शासन का पर्याय बनकर उभरा है। ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों में यह रूप बदल बदल कर हावी है। इसका दिखावटी जनतंत्र वाला चेहरा पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही के रूप में कभी कभार दिख जाता है। इजरायल और भारत के अलावा बहुतेरे देश हैं जो इस्लामिक आतंकवाद से ग्रस्त हैं। हद तो यह कि कतिपय मुस्लिम देश भी शिया-सुन्नी जैसे भेदभाव मूलक आतंकवाद से त्रस्त हैं। वहीं ईसाई मुल्क भी इनके हिंसक दांवपेंच से त्रस्त हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ठीक ही कहा है कि, "अगर ईरान जैसा आतंकवादी शासन... परमाणु हथियार और उनके इस्तेमाल के साधन, बैलिस्टिक और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें हासिल कर लेता है, तो यह पूरी दुनिया को धमकाएगा। इसलिए हमने अपनी रक्षा करने का संकल्प लिया है। लेकिन ऐसा करते हुए, हम दूसरों की भी रक्षा कर रहे हैं।” शायद इसलिए प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका और परोक्ष रूप से...

नीतीश कुमार की नई सधी हुई बिहारी चाल के सियासी निहितार्थ

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नीतीश कुमार की नई सधी हुई बिहारी चाल के सियासी निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड सुप्रीमो नीतीश कुमार राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हैं। सियासत के चाणक्य श्री कुमार ने भाजपा के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी केंद्रीय राजनीतिक संभावनाओं को उभारने के लिए दिल्ली कूच करने का अप्रत्याशित फैसला लिया है। भले ही उन्होंने राज्यसभा जाने का निर्णय बिहार की राजनीति में अपेक्षित एक बड़े बदलाव के हिस्से के रूप में लिया है, लेकिन यह भी उनकी लंबे समय से चली आ रही एक अधूरी इच्छा को प्रकट/पूरा करता है।  राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, भाजपा के ओबीसीकरण के दृष्टिगत राष्ट्रीय स्तर पर सवर्णों की भाजपा नीत एनडीए से बेरुखी से उपजी सियासी परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिए ही उन्होंने यह नया कदम उठाया है, जिसे एक तीर से कई निशाने के तौर पर देखा जाने लगा है। देश की समाजवादी राजनीति में भी अब उनका कोई निकट प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा है। इसलिए गुरुवार, 5 मार्च 2026 को राज्यसभा की सदस्यता हेतु नामांकन दाखिल करने के साथ ही उनका अब नया भविष्य भी ज...

रंगोत्सव होली के सियासी और सांस्कृतिक मायने

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रंगोत्सव होली के सियासी और सांस्कृतिक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक रंगपर्व होली भले ही भारतीय सभ्यता-संस्कृति से अनुप्राणित है, लेकिन गुलामी काल में यह पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के सामाजिक दुष्प्रभाव से भी यह अछूती नहीं बची है। आमतौर पर यह रंगोत्सव देश-दुनिया में हंसी ठिठोली का त्योहार समझा जाता है। इस दौरान आमलोगों में रंग-गुलाल खेलने के साथ-साथ मीठे पकवानों, नमकीन मांसाहारों और नशीले पदार्थों के सेवन जैसे (भांग), द्रव्य (शराब) और गैस (गांजा) का प्रयोग बहुतायत में देखने को मिलता है जिससे लोग झूम उठते हैं। आमतौर पर शुद्र यानी सेवक पर्व होली आपसी प्रेम और सौहार्द का प्रतीक है, जब घोर दुश्मन भी एक दूसरे के गले मिलने से नहीं हिचकते हैं। बदलते जमाने के अनुरूप लोकपर्व होली का रंगोत्सव भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व ब्रांडिंग का भी पर्याय बन चुका है। यह वसंत पर्व अब सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण, सांप्रदायिक तनाव और चुनावी रणनीति का प्रतीक बन गया है। लोकतांत्रिक भारत में यह प्रवृत्ति वर्ष दर वर्ष गहराती जा रही है। खासकर 2026 में ही बिहार, यूपी और अन्य राज्य...

भारत व कनाडा के बीच हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के द्विपक्षीय निहितार्थ

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भारत व कनाडा के बीच हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के द्विपक्षीय निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक आधुनिक विश्व के देश एक दूसरे के ऊपर पर बहुत हद तक आश्रित रहते हैं। इसलिए परस्पर मधुर सम्बन्ध कायम रखना चाहते हैं। यदि कभी कभार कोई मतभेद उतपन्न हो भी जाए तो उसे जल्द निपटाना ही उनकी प्राथमिकताओं में शुमार होता है। भारत और कनाडा ने भी यही किया। समय व परिस्थितियों वश उपजी हुई नेतृत्व गत वैचारिक खाई को शीघ्र ही पाट लिया और भरोसेमंद रिश्ते कायम करते हुए  गत 2 मार्च, दिन सोमवार को व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) किए। इसके संदर्भ शर्तों (TOR) पर जो हस्ताक्षर हुए, वो एक ऐतिहासिक कदम है, जो द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 50 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखता है। इससे दोनों देशों को भरपूर फायदा मिलेगा। जिस तरह से भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में पीएम नरेंद्र मोदी और मार्क कार्नी की अहम मौजूदगी में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल व मनिंदर सिद्धू ने दस्तावेज आदान-प्रदान किए, उनका अपना महत्व है और यह कदम साल 2023 के चरम तनाव के बाद आपसी संबंधों की पुनःबहाली ...

यक्ष प्रश्न: आखिर अमेरिकी वर्चस्व की कीमत कबतक चुकाएगी शेष दुनिया?

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यक्ष प्रश्न: आखिर अमेरिकी वर्चस्व की कीमत कबतक चुकाएगी शेष दुनिया? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक महाकवि तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' में लिखा है कि "समरथ को नहीं दोष गोसाईं।" यानी कि ताकतवर लोगों को कोई भी दैव दोष तक नहीं लगता है! यदि समकालीन लोकतांत्रिक कसौटियों और प्रवृत्तियों में इसे देखें तो देश-दुनिया के सभी वैधानिक नियमन शक्तिशाली देशों और लोगों के ही पक्ष में कार्य करते प्रतीत होते हैं। वाकई उनके किसी भी लोकविरोधी या जनविरोधी कार्य में प्रायः कोई न्यायिक बाधाएं तक नजर नहीं आतीं और न ही उनमें कोई दोष या खामियां तलाशी जाती हैं।  आलम यह है कि किसी भी संसद, सर्वोत्तम न्यायालय या फिर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तक में ऐसे मामले पर ज्यादा सवाल जवाब नहीं किये जाते और अंततः मामले रफादफा कर, करवा दिए जाते हैं। कबीलाई भाषा में कहें तो जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत न केवल ग्रामीण जगत की मानसिकता बल्कि आधुनिक नृशंस विश्व के मानस पटल तक पर हावी महसूस होता है। बहरहाल इससे बचने का कोई रास्ता भी नजर नहीं आता। सच कहूं तो "वीर भोग्या वसुंधरा...