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आखिर एआई, जियो पॉलिटिक्स को कैसे बदल रहा है?

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आखिर एआई, जियो पॉलिटिक्स को कैसे बदल रहा है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक समकालीन दुनिया इंटरनेट और सोशल मीडिया आदि के माध्यम से परस्पर जुड़ी हुई है, लिहाजा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जियोपॉलिटिक्स को तेजी से बदल रहा है। इस लिहाज से सैन्य शक्ति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी संप्रभुता प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। वर्तमान में देखा जाए तो यह चिप्स, डेटा और कंप्यूटिंग पावर पर वैश्विक दौड़ को तेज कर रहा है, जबकि भविष्य में यह नई गठबंधन और संघर्षों को भी जन्म दे सकता है। जहां तक एआई के वर्तमान प्रभाव की बात है तो एआई ने जियोपॉलिटिक्स में नई शक्ति संतुलन पैदा किया है, जहां अमेरिका और चीन जैसे देश चिप निर्माण और डेटा नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। सप्लाई चेन का विखंडन हो रहा है, जिससे देश अपनी AI संप्रभुता पर जोर दे रहे हैं, जैसे भारत डोमेस्टिक मॉडल्स विकसित कर रहा है। भारत AI Impact Summit 2026 में जियो के AI मॉडल्स ने स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति में समावेशी उपयोग दिखाया, जो वैश्विक दक्षिण के लिए मॉडल बन सकता है। इसी प्रकार से सैन्य और सुरक्षा आया...

आखिर भारत की एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां अमेरिका-चीन की तुलना में ज्यादा समावेशी हैं?

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आखिर भारत की एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां अमेरिका-चीन की तुलना में ज्यादा समावेशी हैं?  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत की एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां दुनिया के अन्य देशों यानी अमेरिका-चीन-यूरोप की तुलना में ज्यादा समावेशी, ओपन-सोर्स और ग्लोबल साउथ-केंद्रित हैं।भारत का दृष्टिकोण सर्वथा भिन्न और लोककल्याणकारी है। जहां अमेरिका और चीन AI को प्रमुख कंपनियों के एकाधिकार के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं, वहीं भारत सार्वजनिक संसाधनों (जैसे ऐरावत पर LLaMA मॉडल्स) को API के जरिए सस्ता उपलब्ध कराता है।  यही वजह है कि भारत बनाम अन्य देश की विशेषताओं के दृष्टिगत पारस्परिक होड़ जारी है, खासकर भारत, अमेरिका, चीन व यूरोप के बीच। क्योंकि भारत का फोकस किसान, छात्र, स्टार्टअप्स के लिए भाषिणी, किसान ई-मित्र जैसे क्षेत्रीय अनुप्रयोग हैं, जबकि अमेरिका, चीन व यूरोप में बड़े टेक दिग्गजों (Google, OpenAI) का वर्चस्व है जो सख्त जोखिम नियमन (EU AI Act) से परेशान दिखाई देते हैं। यही वजह है कि नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में प्रस्तावित एआई लोकतंत्रीकरण के लिए नीतिगत ...

आखिर 'भावनाओं' को भड़काने वाली लोकतांत्रिक प्रवृत्ति पर कैसे पाएंगे काबू?

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आखिर जातीय, धार्मिक व क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाली लोकतांत्रिक प्रवृत्ति पर कैसे पाएंगे काबू? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया को 'वसुधैव कुटुम्बकम' का संदेश देने वाला जनतांत्रिक भारत आज जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाली 'ब्रितानी' व 'मुगलिया' सियासत के चक्रब्यूह में फंसा पड़ा है। इससे 'सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया' जैसी उसकी उदात्त सोच भी  कठघरे में खड़ी प्रतीत हो रही है। यहां की प्रतिभाशाली और प्रभुत्ववाली सामान्य जातियों (सवर्णों) के खिलाफ देश में जो लक्षित पूर्वाग्रही राजनीति कथित दलित-ओबीसी नेताओं के द्वारा की जा रही है, उससे देश व समाज के सामने विभिन्न नैतिक व वैधानिक सवाल उठ खड़े हुए हैं!  हैरत की बात है कि सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की जगह बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के नारे लगाए जाते हैं। कहीं जाति, कहीं धर्म और कहीं भाषा-क्षेत्र के नाम पर लोगों के उत्पीड़न हो रहे हैं। वहीं कहीं सामाजिक न्याय आधारित आरक्षण और साम्प्रदायिक सोच आधारित अल्पसंख्यकवाद के अव्यवहारिक पहलुओं को हवा देकर आमलोगो...

राज्यसभा द्विवार्षिक चुनाव 2026 के वर्षपर्यंत सियासी मायने

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राज्यसभा द्विवार्षिक चुनाव 2026 के वर्षपर्यंत सियासी मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चिरंजीवी सदन 'राज्यसभा' के द्विवार्षिक चुनाव के लिए वर्ष 2026 में विभिन्न चरणों में खाली होने वाली कुल 71-75 सीटें के लिए चुनाव होंगे, जो पूरे वर्ष अप्रैल और नवंबर में भरी जाएंगी। लिहाजा, इन चुनावों के राजनीतिक मायने गहन व अहम हैं, क्योंकि ये चुनाव जहां एनडीए की बहुमत मजबूती बढ़ा सकते हैं, वहीं विपक्ष को भी कमजोर कर सकते हैं। इससे भाजपा व उसके साथियों का चुनावी हौसला बढ़ेगा। जहां तक इनकी प्रमुख तारीखों की बात है तो चुनाव आयोग ने पहले चरण में 10 राज्यों की 37 सीटों पर चुनाव घोषित किए हैं। जिसके लिए अधिसूचना 26 फरवरी को जारी होगी, नामांकन 5 मार्च तक, और मतदान-मतगणना 16 मार्च 2026 को। जबकि बाकी सीटें नवंबर में भरी जाएंगी, जिसमें उत्तर प्रदेश की 10 सीटें सबसे महत्वपूर्ण हैं। इन दस चुनावी राज्यों में से 6 राज्यों में एनडीए की सरकार है, जबकि 4 राज्यों में इंडी गठबंधन के घटक दल सरकार में हैं। जहां तक राज्यवार सीटों की बात है कि पहले चरण में महाराष्ट्र की 7, तमिलनाडु ...

विकसित कर्जदार देशों की होड़ में शामिल भारत बजा रहा विकास का डंका!

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दुनियाभर के विकसित कर्जदार देशों की होड़ में शामिल हुआ भारत बजा रहा विकास का डंका! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक समकालीन पूंजीवादी दुनिया में बहुआयामी व चतुर्दिक विकास के मद्देनजर भारतीय चार्वाक दर्शन का बोलबाला है। केंद्र में तीन पारियों से सत्तारूढ़ भाजपा नीत राजग गठबंधन की मोदी सरकार भी इसी दर्शन को प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है। तभी तो बीते नौ साल में भारत में प्रति व्यक्ति कर्ज तीन गुना बढ़ गया है। साथ ही दुनियाभर के विकसित कर्जदार देशों की होड़ में शामिल हुआ भारत आज बहुमुखी विकास का डंका भी बजा रहा है। भारतीय कर्जखोरी का साइड इफेक्ट्स यह है कि भारत सरकार अपने कुल राजस्व (Income) का लगभग 25-30% हिस्सा केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर देती है। जबकि उन्मुक्त अर्थव्यवस्था के नाम पर 1990 के दशक से ही शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे जनोपयोगी सब्सिडी में अपेक्षाकृत लगातार कमी देखी जा रही है। कहना न होगा किज सूदखोरी हमारी रगों में शामिल है और इसे लेना-देना सनातन संस्कृति में इस्लाम की तरह प्रतिबंधित नहीं है।  दुनियावी धारणा है कि विकसित देश भारी कर्जे में ल...

एसआईआर प्रक्रिया से न्यायिक अधिकारियों को जोड़ने के सुप्रीम मायने

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पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया से न्यायिक अधिकारियों को जोड़ने के सुप्रीम फैसले के राष्ट्रीय मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया जारी है, जिसमें लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी वाली एंट्रीज (जैसे माता-पिता का नाम मेल न खाना या आयु अंतर असंगत होना आदि की गहन जांच होती है। इसी को लेकर राज्य सरकार और केंद्रीय चुनाव आयोग के बीच उभरे विवाद को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 19-20 फरवरी 2026 को कलकत्ता हाईकोर्ट को वर्तमान और पूर्व न्यायिक अधिकारियों (जिला जज रैंक के) को तैनात करने का निर्देश दिया। ऐसा इसलिए  कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग (ECI) के बीच विश्वास की कमी और सहयोग न होने से प्रक्रिया अटक गई थी। लिहाजा इस अप्रत्याशित फैसले के राष्ट्रीय मायने अहम व दूरगामी साबित होंगे, क्योंकि यह फैसला असाधारण परिस्थितियों में न्यायपालिका को निर्वाचन प्रक्रिया में सीधे शामिल करने का बेजोड़ उदाहरण है, जो राज्य-केंद्र संबंधों में तनाव को उजागर करता है। देखा जाए तो यह अन्य राज्यों (जैसे...

'वीआरएस लेना उचित नहीं! कर्मभूमि में डटे रहिए'

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'वीआरएस लेना उचित नहीं! कर्मभूमि में डटे रहिए' @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस, जिलाधिकारी, जौनपुर, उत्तरप्रदेश उत्तरप्रदेश में सरकारी कार्यसंस्कृति में आमूलचूल बदलाव आया है, जिससे वर्तमान में सरकारी कर्मियों पर, खासकर प्रशासनिक अधिकारियों के ऊपर कार्य दबाव निःसन्देह है, यह मैं भी मानता हूँ, लेकिन कार्य निष्पादन, निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी पूरी मिली हुई है ताकि बेहतर कार्य हो सके। निश्चय ही ऐसा हो भी रहा है।  परंतु, कार्य के दबाव में उत्कृष्ट प्रशासनिक सेवाओं से स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण यानी  वीआरएस (VRS) लेने की पनपती प्रवृत्ति उचित नहीं है। वास्तव में, वीआरएस लेकर आप आमलोगों की सेवा करते रहने के नानाविध अवसर से वंचित हो जाते हैं। इसलिए मेरी राय में ऐसी प्रवृत्ति किसी सफल जीवन जीने का अंदाज नहीं है, और न ही इसे समझा जाना चाहिए। निर्विवाद रूप में कहा गया है कि,  "मानव जब जोर लगाता है,  पत्थर पानी बन जाता है।"  वाकई प्रशासनिक सेवाओं में लोकहितार्थ उपर्युक्त संकल्प से ही कार्य किया जाता है। साधन है स्वल्प, फिर भी पूर्ण करूँगा संकल्प।  जैसा कि अठारह पु...