जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है?
जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है? "दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभिन्न दल अपनी अपनी नीतियों और नैरेटिव के जरिए इस वर्ग को साधने का प्रयास करते हैं।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत में दलित राजनीति किसी एक नेता या एक पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग राज्यों में अलग सामाजिक समूह, दलित उप-समुदाय और राजनीतिक गठबंधन अलग नेताओं को प्रभाव देते हैं। भले ही अपने अपने जमाने में बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर, जगजीवन राम और मान्यवर कांशीराम ने दलित राजनीति की जो राष्ट्रीय साख स्थापित की, उस पर दावेदारी को लेकर दलित नेता, अन्य दलित नेताओं की राह में सियासी कांटे बिछाने से बाज नहीं आ रहे हैं, जिससे राज्यवार अलग अलग नेता मजबूत हो रहे हैं और उन्हें उनके ही राज्य में दूसरे दलित नेता भी कड़ी चुनौती दे रहे हैं। इस प्रकार दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभिन्न दल अपनी अपनी नीतियो...