संदेश

बदलते बिहार की सकारात्मक छवि गढ़कर निवेश प्रवाह को आकर्षित करेगा "ब्रांड बिहार"

चित्र
बदलते बिहार की पहचान, रमणीक छवि और निवेश परिस्थिति को गढ़कर मजबूत करेगा "ब्रांड बिहार"  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक “ब्रांड बिहार नीति” का अर्थ केवल किसी सरकारी विज्ञापन अभियान से नहीं है, बल्कि बिहार की एक ऐसी व्यापक रणनीति से है जिसके जरिए राज्य की सकारात्मक पहचान बनाई जाए, ताकि बिहार को निवेश, पर्यटन, शिक्षा, संस्कृति, उद्योग, कृषि और मानव संसाधन के एक बड़े केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।  माननीय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कुशल नेतृत्व में आगे बढ़ रहे "ब्रांड बिहार" की इस आकर्षक पहल को रणनीतिक दिशा प्रदान करने के लिए बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत के नेतृत्व में प्रशासनिक टीम कार्य करेगा। जबकि इस पहल को श्रद्धा शर्मा द्वारा सहयोग प्रदान किया जाएगा। बता दें कि हाल के वर्षों में बिहार सरकार ने विशेष रूप से “पर्यटन ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग नीति 2024” जैसी पहलें शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य बिहार की छवि को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर मजबूत करना है।  बिहार सरकार ने "ब्रांड बिहार" की शुरुआत की घोषणा की, ज...

बिहार की राजनीति के वर्तमान व भविष्य की 'सियासी धुरी' बन चुके हैं सीएम सम्राट चौधरी

चित्र
बिहार की राजनीति के वर्तमान व भविष्य की 'सियासी धुरी' बन चुके हैं सीएम सम्राट चौधरी  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार की राजनीति में जुझारू युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को केवल सुलझते हुए वर्तमान का एक नेता ही नहीं, बल्कि “भविष्य की राजनीतिक धुरी” के रूप में देखने वालों की संख्या पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़ती ही जा रही है और यह सिलसिला निरंतर आगे भी चलता रहेगा। ऐसा इसलिए कि उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण सक्रिय हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से अजेय बनाते हैं। आइए इन्हें समझते हैं विस्तार से-  पहला, बिहार में भाजपा के भीष्म पितामह कैलाशपति मिश्रा के संजोए हुए सपनों को पूरा करते हुए पार्टी के  पहले मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक महत्व है। निःसन्देह साल 2026 में सम्राट चौधरी का बिहार का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना गया, क्योंकि पहली बार बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया। इससे प्रदेशवासियों में  यह संदेश गया कि भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना चाहती बल्कि पार्टी ने बि...

क्या अमेरिका-चीन के 'वैश्विक चक्रब्यूह' में घिर चुके भारत को रूस व अन्य मित्र देशों की मदद मिलेगी?

चित्र
क्या अमेरिका-चीन के 'वैश्विक चक्रब्यूह' में घिर चुके भारत को रूस व अन्य मित्र देशों की मदद मिलेगी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक गुटनिरपेक्ष देश भारत आज एक जटिल वैश्विक शक्ति-संघर्ष में फँसा दिखाई देता है, जहाँ एक तरफ अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत चीन के विरुद्ध अपने प्रमुख साझेदार के रूप में देखना चाहता है, तो वहीं दूसरी तरफ चीन एशिया में अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए भारत पर सामरिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए हुए है। जबकि, भारत इन सबसे बेपरवाह रहते हुए अपने पुराने सदाबहार मित्र रूस के साथ अपने संतुलित रिश्ते प्रगाढ़ बनाए हुए है। साथ ही, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान और इजरायल आदि से द्विपक्षीय रिश्ते मजबूत कर चुका है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है कि क्या रूस और फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान और इजरायल आदि जैसे मजबूत अन्य मित्र देश भारत को इस “अमेरिका-चीन के वैश्विक चक्रब्यूह” से बचाने हेतु  निर्णायक भूमिका निभा पाएंगे? दो टूक उत्तर होगा कि वैश्विक परिस्थितियां ही सबकुछ तय कर...

राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम के लिंक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर करें साझा और दें आर्थिक सहयोग

चित्र
बृहत्तर भारत, शांतिप्रिय विश्व की अवधारणा को मजबूत करने की मुहिम को समर्पित "राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" वैचारिक क्रांति का अग्रदूत है। विश्व व्यापी जनजागृति के निमित्त इसका लिंक फेसबुक, एक्स (ट्वीटर), लिंक्डइन, थ्रेड्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि पर भी साझा किया जाता है, जो हर वक्त उपलब्ध है। जबतक अखंड भारत नया आकार नहीं लेगा और पूर्वी एशिया एवं पश्चिमी एशिया में भारत का वसुधैव कुटुंब कम वाला भाव मजबूत नहीं होगा, तबतक विश्वव्यापी संकट हमें प्रभावित/प्रताड़ित करते रहेंगे। लिहाजा, मजबूत और विस्तृत भारत का निर्माण हमारा भी लक्ष्य होना चाहिए। बिल्कुल पड़ोसी  चीन की तरह। तिब्बत के बिना भी भारत असुरक्षित ही रहेगा। इसलिए वर्तमान और भावी पीढ़ी में जनजागृति पैदा करना मीडिया का परम कर्तव्य है। जनमत निर्माण की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसलिए अपने हिस्से का वैचारिक योगदान अपने आसपास अवश्य दीजिए। यहां प्रसारित आलेख देश प्रदेश के विभिन्न अखबारों में भी प्रकाशित होते रहते हैं।जिसकी कटिंग्स सम्बन्धित आलेख के साथ साझा किया हुआ रहता हूँ। यदि आप राजनेता, समाजसेवी, शिक्षक, अधिवक्...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की विदेश यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ

चित्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की विदेश यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ भारत के लिए महत्वपूर्ण @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच देशों के हालिया विदेश दौरे के कई बड़े कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक मायने हैं। क्योंकि मई 2026 में उनका यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया ऊर्जा संकट, ईरान युद्ध, सप्लाई चेन अस्थिरता और नए वैश्विक ध्रुवीकरण से गुजर रही है। लिहाजा, पीएम मोदी का यह विदेश दौरा केवल औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक शक्ति संतुलन, निवेश आकर्षण, तकनीकी साझेदारी, और भारत की उभरती महाशक्ति छवि को मजबूत करने की बहुस्तरीय रणनीतिक कवायद माना जा रहा है।  पहला, ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा लक्ष्य है, क्योंकि भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक देश है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल कीमतें बढ़ रही हैं। ऐसे समय में यूएई दौरा भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है। लिहाजा भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण, एलपीजी (LPG) सप्...

आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज है या नाजायज? चिंतन कीजिए

चित्र
आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज है या नाजायज? चिंतन कीजिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 53वें  मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के क्रम में याचिकाकर्ता की अपरिपक्व भाषा और समकालीन “सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति” पर एक तल्ख टिप्पणी की और परजीवी तक कह डाला। लिहाजा इसको भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह टिप्पणी केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद, चुनाव आयोग, मीडिया, नौकरशाही और संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार बढ़ते अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया आधारित आक्रामक विमर्श की ओर संकेत करती है।  इसलिए इसके अहम सियासी और प्रशासनिक मायने हैं और संविधान का संरक्षक होने के नाते सर्वोच्च न्यायालय भी अपने नैतिक दायित्व से सिर्फ छिछली टिप्पणी करके बच नहीं सकता, क्योंकि उसे हासिल स्वतः संज्ञान का अधिकार भी गरीबों की भलाई में एक हदतक निरर्थक प्रतीत होता आया है। बावजूद इसके सीजेआई की टिप्पणी कई मायनों में जायज मानी जा सकती ...

अमेरिका और चीन में बढ़ती घनिष्ठता के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स!

चित्र
अमेरिका और चीनी की बढ़ती संवाद-प्रक्रिया के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स को यूँ समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल में ही बढ़ती संवाद-प्रक्रिया और संभावित रणनीतिक समझौते को दुनिया बेहद गंभीरता से देख रही है, क्योंकि बदलती वैश्विक दुनियादारी और नवमहत्वाकांक्षी देशों-गुटों की मतलबी कूटनीति-अर्थनीति से अमेरिका-चीन दोनों की अंतरराष्ट्रीय बादशाहत खतरे में है। आखिर जब एक तरफ रूस और भारत अपनी दशकों पुरानी मित्रता पर अडिग हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप भी अपने पुराने सम्बन्धों को तरोताजा कर रहे हैं, जो कि अमेरिकी डीप स्टेट की बिल्कुल नई विसात है। देखा जा रहा है कि भारत की चतुराई और रूस की दृढ़ता से अमेरिका अपने ही बुने हुए जाल में फंसकर तड़फड़ा रहा है। वहीं, रूस-चीन की समझदारी से पश्चिमी एशिया में जो अमेरिका की फजीहत हुई है, उसके बाद अब चीन के समक्ष हथियार डालने के अलावा उसके पास कोई चारा भी नहीं  बचा है। चूंकि ट्रंफ मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के फार्मूले पर काम कर रहा हैं और रूस, भा...