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“फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स” के अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक निहितार्थ

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“फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स” के अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक "लचीली भूराजनीति” यानी फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स का जन्मदाता भारत की देखा-देखी अब पूरी दुनिया में इसका प्रचलन बढ़ रहा है। इसे मोदी डॉक्ट्रिन कहना ज्यादा उचित होगा, जो गुटनिरपेक्षता का हाइब्रिड पालिसी संस्करण है। आम कहानी वाली भाषा में कहें तो “खुल जा सिमसिम और बंद हो जा सिमसिम” वाली वैश्विक कूटनीति ही अब लचीली भूराजनीतिक बन चुकी है।  दरअसल, फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स यानी लचीली भूराजनीति का अर्थ ऐसी अवसरवादी विदेश नीति से है, जिसमें देश अपने हित के अनुसार कभी दोस्ती का दरवाज़ा खोलते हैं और कभी तुरंत बंद कर लेते हैं। आज की दुनिया में यही “फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स” तेजी से बढ़ रही है। जिसके सफल उपयोगकर्ता टीम पीएम मोदी हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ भारत जैसे उन देशों को होता है जो आर्थिक रूप से शक्तिशाली हों, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर हों, सैन्य रूप से सक्षम हों, और बहुध्रुवीय दुनिया में संतुलन साधना जानते हों। यही वजह है कि भारत इसे अपनाकर दुनिया...

कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बदलकर कर्नाटक का धर्मंसंकट टाला! क्या मुख्यमंत्री बदलकर से हल निकलेगा?

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कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बदलकर कर्नाटक का धर्मंसंकट टला! क्या मुख्यमंत्री बदलकर से हल निकलेगा?  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कर्नाटक में कांग्रेस इस समय एक गहरे राजनीतिक धर्मसंकट में दिखाई दे रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री बदलकर उसने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। जिस तरह से आलाकमान के निर्देश पर सिद्धारमैया की जगह डी के शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है, वह दूरदर्शिता का परिचायक है। लेकिन सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री बदलने से समस्या का स्थायी हल निकल चुका है? या फिर कोई और नई समस्या पनपेगी! कांग्रेस का अतीत इसी बात की चुगली करता है। चूंकि कांग्रेस के लिए जहां एक ओर सत्ता संतुलन मायने रखता है, तो वहीं दूसरी ओर एक स्थिर और टिकाऊ सरकार की चुनौती उसके समक्ष मौजूद है, जो चुनावी मुद्दा भी 2028 के विधानसभा चुनाव में बनेगा। और इसी बीच मुख्यमंत्री बदलने की लगातार चल रही चर्चाओं को सही साबित करके और अपना नया मुख्यमंत्री घोषित करके उसने कर्नाटक के राजनीतिक तापमान बढ़ा चुकी है। सवाल यह है कि क्या नेतृत्व परिवर्तन वास्तव में समाधान बन ...

क्वाड विदेशी मंत्रियों की नई दिल्ली बैठक के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मायने

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क्वाड विदेशी मंत्रियों की नई दिल्ली बैठक के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मायने   @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक सिर्फ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-संतुलन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरी है। इसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने इंडो-पैसिफिक, समुद्री सुरक्षा, सप्लाई चेन, ऊर्जा और चीन की बढ़ती आक्रामकता जैसे मुद्दों पर साझा रणनीति बनाई।  देखा जाए तो नई दिल्ली की यह बहुप्रतीक्षित क्वाड (Quad) बैठक यह बताती है कि आने वाले दशक में वैश्विक राजनीति का केंद्र यूरोप से हटकर इंडो-पैसिफिक बनने जा रहा है, और इस नई भू-राजनीतिक व्यवस्था में भारत केवल सहभागी नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है। इसका सारा श्रेय मोदी प्रशासन और आरएसएस के प्रति समर्पित बुद्धिजीवियों को जाता है, जिन्होंने अपनी सधी हुई रणनीति का वैश्विक कमाल दिखा दिया। आइए सबसे पहले समझते हैं कि क्वाड क्या है? तो यह जान लीजिए कि Quadr...

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दृष्टिगत पोप की चेतावनी के वैश्विक मायने

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दृष्टिगत पोप की चेतावनी के वैश्विक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक ईसाई धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप लियो चौदहवां (ope Leo XIV) द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर दी गई हालिया चेतावनी केवल धार्मिक बयान नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, युद्ध, लोकतंत्र और मानव सभ्यता के भविष्य पर गंभीर हस्तक्षेप मानी जा रही है। पोप ने AI को “नयी डिजिटल बाबेल” जैसी चुनौती बताते हुए कहा कि यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह मानवता को विभाजित, नियंत्रित और अमानवीय बना सकती है।  ऐसे में पोप की चेतावनी के प्रमुख वैश्विक मायने को समझना जरूरी है जो इस प्रकार है:- पहला, एआई (AI) अब केवल तकनीक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है। पोप ने विशेष रूप से AI आधारित स्वायत्त हथियारों (Autonomous Weapons) पर चिंता जताई। उनका संकेत था कि भविष्य के युद्धों में मशीनें इंसानों की जगह निर्णय लेने लगेंगी। इसका अर्थ यह होगा कि अमेरिका, चीन, रूस जैसे देश एआई (AI) हथियारों की दौड़ में हैं। ड्रोन युद्ध, साइबर युद्ध और ए...

आखिर डॉनल्ड ट्रंफ के प्रेममय-नफरती बयानों पर पूर्ण भरोसा कैसे करे भारत?

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आखिर डॉनल्ड ट्रंफ के प्रेममय-नफरती बयानों पर पूर्ण भरोसा कैसे करे भारत? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के तीन दिवसीय दौरे पर रहे, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना ‘‘महान’’ मित्र बताते हुए गत रविवार की रात कहा कि भारत उन पर ‘‘100 प्रतिशत भरोसा’’ कर सकता है। इसलिए सवाल उठता है कि आखिर डॉनल्ड ट्रंफ के प्रेममय-नफरती बयानों के दृष्टिगत भारत, अमेरिका पर पूर्ण भरोसा कैसे करे? उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में भारत मंडपम में आयोजित एक कार्यक्रम के क्रम में उपर्युक्त टिप्पणियां कीं। इस कार्यक्रम में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर, अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो और अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर मौजूद थे। इसी क्रम में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने गोर के साथ फोन पर बातचीत में कहा, ‘‘मैं सभी को नमस्कार कहना चाहता हूं। मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत पसंद हैं, मोदी महान हैं, वह मेरे मित्र हैं और मैं सभी को एक अच्छी शाम ...

आखिर भारत-अमेरिका के सम्बन्धों में भरोसे का अभाव क्यों है? समझिए

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आखिर भारत-अमेरिका के सम्बन्धों में भरोसे का अभाव क्यों है? समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत और अमेरिका आज रणनीतिक साझेदार जरूर हैं, लेकिन दोनों के रिश्तों में पूरी तरह “विश्वास” अभी भी नहीं बन पाया है, भले ही वो लाख डिप्लोमैटिक नौटंकी कर लें। इसका कारण केवल वर्तमान राष्ट्रपति ट्रंफ की अटपटी कूटनीति जनित राजनीति ही नहीं, बल्कि अमेरिका से जुड़ा दशकों का ऐतिहासिक अनुभव, भू-राजनीतिक हितों का टकराव और अलग-अलग रणनीतिक सोच है। लिहाजा, द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूती देने में फूंक-फूंक कर कदम रखना भारतीय रणनीतिकारों के लिए जरूरी है। 21वीं सदी केकूटनीतिक उतार-चढ़ाव भी इसी बातकी चुगली करते हैं। आइए एक नजर डालते हैं अमेरिका-भारत के पारस्परिक रिश्तों से जुड़े कूटनीतिक चूहे-बिल्ली के खेल पर:- पहला, शीत युद्ध की तल्ख विरासत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने “गुटनिरपेक्ष नीति” अपनाई, जबकि अमेरिका चाहता था कि भारत खुलकर पश्चिमी खेमे में आए। लिहाजा, अमेरिका ने उस दौर में पाकिस्तान को अपना सैन्य सहयोगी बनाया। फलस्वरूप पाकिस्तान को हथियार, आर्थिक सहायता और ...

आखिर विश्व, भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनना क्यों चाहता है? समझिए

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आखिर विश्व, भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनना क्यों चाहता है? समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक विश्व आज भारत की विकास यात्रा का हिस्सा इसलिए बनना चाहता है, क्योंकि भारत केवल “बड़ा बाजार” नहीं रहा, बल्कि वह अब यह देश वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक, सुरक्षा और मानव संसाधन का एक निर्णायक केंद्र बनता जा रहा है। खास बात यह है कि अब वह कई मामलों में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस-जर्मनी-यूके जैसे यूरोपीय देशों से होड़ भी लेने लगा है। पहला, दुनिया को भारत में सबसे बड़ा बाजार दिख रहा है: भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। यहां तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग, डिजिटल उपभोक्ता और विशाल युवा शक्ति वैश्विक कंपनियों को आकर्षित कर रही है। इसी कारण तकनीक, ई-कॉमर्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा, सेमीकंडक्टर और ऊर्जा क्षेत्रों में भारी विदेशी निवेश आ रहा है।  दूसरा, चीन के विकल्प के रूप में भारत: अमेरिका-चीन तनाव और सप्लाई चेन संकट के बाद दुनिया “चाइना प्लस वन” रणनीति अपना रही है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब उत्पादन और निवेश का बड़ा हिस्सा भारत में स्थानांतरित...