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भारत व कनाडा के बीच हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के द्विपक्षीय निहितार्थ

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भारत व कनाडा के बीच हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के द्विपक्षीय निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक आधुनिक विश्व के देश एक दूसरे के ऊपर पर बहुत हद तक आश्रित रहते हैं। इसलिए परस्पर मधुर सम्बन्ध कायम रखना चाहते हैं। यदि कभी कभार कोई मतभेद उतपन्न हो भी जाए तो उसे जल्द निपटाना ही उनकी प्राथमिकताओं में शुमार होता है। भारत और कनाडा ने भी यही किया। समय व परिस्थितियों वश उपजी हुई नेतृत्व गत वैचारिक खाई को शीघ्र ही पाट लिया और भरोसेमंद रिश्ते कायम करते हुए  गत 2 मार्च, दिन सोमवार को व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) किए। इसके संदर्भ शर्तों (TOR) पर जो हस्ताक्षर हुए, वो एक ऐतिहासिक कदम है, जो द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 50 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखता है। इससे दोनों देशों को भरपूर फायदा मिलेगा। जिस तरह से भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में पीएम नरेंद्र मोदी और मार्क कार्नी की अहम मौजूदगी में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल व मनिंदर सिद्धू ने दस्तावेज आदान-प्रदान किए, उनका अपना महत्व है और यह कदम साल 2023 के चरम तनाव के बाद आपसी संबंधों की पुनःबहाली ...

यक्ष प्रश्न: आखिर अमेरिकी वर्चस्व की कीमत कबतक चुकाएगी शेष दुनिया?

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यक्ष प्रश्न: आखिर अमेरिकी वर्चस्व की कीमत कबतक चुकाएगी शेष दुनिया? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक महाकवि तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' में लिखा है कि "समरथ को नहीं दोष गोसाईं।" यानी कि ताकतवर लोगों को कोई भी दैव दोष तक नहीं लगता है! यदि समकालीन लोकतांत्रिक कसौटियों और प्रवृत्तियों में इसे देखें तो देश-दुनिया के सभी वैधानिक नियमन शक्तिशाली देशों और लोगों के ही पक्ष में कार्य करते प्रतीत होते हैं। वाकई उनके किसी भी लोकविरोधी या जनविरोधी कार्य में प्रायः कोई न्यायिक बाधाएं तक नजर नहीं आतीं और न ही उनमें कोई दोष या खामियां तलाशी जाती हैं।  आलम यह है कि किसी भी संसद, सर्वोत्तम न्यायालय या फिर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तक में ऐसे मामले पर ज्यादा सवाल जवाब नहीं किये जाते और अंततः मामले रफादफा कर, करवा दिए जाते हैं। कबीलाई भाषा में कहें तो जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत न केवल ग्रामीण जगत की मानसिकता बल्कि आधुनिक नृशंस विश्व के मानस पटल तक पर हावी महसूस होता है। बहरहाल इससे बचने का कोई रास्ता भी नजर नहीं आता। सच कहूं तो "वीर भोग्या वसुंधरा...

अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध से उपजने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए फिक्रमंद हुए दुनियावी देश

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अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध से उपजने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए फिक्रमंद हुए दुनियावी देश @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जंग छिड़ी हुई है। इसी वर्ष फरवरी माह से तेज हुई सीमाई झड़पें अब खुले युद्ध में बदल चुकी हैं, जिसमें पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के काबुल, कंधार और पक्तिया जैसे इलाकों पर हवाई हमले किए हैं। उधर, अफगानिस्तान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए इस्लामाबाद पर ड्रोन बम बरसा दिए। यही वजह है कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध से उपजने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए दुनिया के देश फिक्रमंद दिखाई पड़ रहे हैं। इसलिए रसूखदार देशों ने दोनों इस्लामिक राष्ट्रों से युद्ध बंद करने की अपील की है, लेकिन उनकी बातें नक्कारखाने में तूती की आवाज की मानिंद गुम हो चुकी हैं।  हद तो यह कि अमेरिकी शह प्राप्त पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे "ऑपरेशन गजब लिल हक" बताते हुए तालिबान पर आतंकी समर्थन का आरोप लगाया है। आलम यह है कि दोनों पक्षों में सैकड़ों लोग व सुरक्षा बल के जवान हताहत हुए हैं, लेकिन सरकारो...

मध्य-पूर्व एशिया में शुरू हुए इजरायल-ईरान युद्ध के वैश्विक मायने

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मध्य-पूर्व एशिया में शुरू हुए इजरायल-ईरान युद्ध के वैश्विक मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक मध्य-पूर्व एशिया में इजरायल और ईरान के बीच एक बार फिर से युद्ध भड़क गया। इससे पूर्व 2025 के मध्य में भी यह युद्ध शुरू हुआ था, लेकिन खाड़ी-अरब देशों के बीच बचाव के बाद थम गया था। समझा जाता है कि अब इजरायल को मिले अमेरिकी और खाड़ी-अरब देशों के अप्रत्याशित समर्थन से यह युद्ध और भी ज्यादा तेज हो या। जिस तरह से इस्लामिक दुनिया शिया व सुन्नी खेमे में विभक्त है, उससे सुन्नी बहुल सऊदी के इशारे पर शिया बहुल देश ईरान के मानमर्दन में यहूदी बहुल देश इजरायल और ईसाई बहुल देश अमेरिका को काफी मदद मिली है। वैश्विक कूटनीतिज्ञों के मुताबिक, अमेरिका द्वारा इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर दोबारा हमले किये जाने और ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामेनेई समेत उनके कई प्रमुख सहयोगियों को मार गिराए जाने से मध्य पूर्व के देशों में पारस्परिक तनाव एक बार पुनः चरम पर पहुंचा गया, जिससे वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेंगे। इस संघर्ष से जहां तेल आपूर्ति बाधित होगी, वहीं कई ...

हेक्सागन गठबंधन के अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मायने समझिए

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हेक्सागन गठबंधन के अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मायने समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक इजरायल द्वारा प्रस्तावित "हेक्सागन गठबंधन" के अंतर्राष्ट्रीय मायने बेहद दिलचस्प हैं। यह अतिवादी ताकतों के विरूद्ध शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है।वास्तव में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा प्रस्तावित यह गठबंधन एक ऐसा कूटनीतिक समूह है, जिसमें भारत, अरब देश, अफ्रीकी राष्ट्र, ग्रीस, साइप्रस और अन्य एशियाई देश शामिल होंगे।  समझा जाता है कि भले ही इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य कट्टरपंथी शिया और सुन्नी ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना है, लेकिन इसके उन वैश्विक कूटनीतिक निहितार्थों से भी इंकार नहीं किया जा सकता, जो अमेरिका, चीन और रूस जैसे तीनों अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के कान खड़े करने वाले साबित हो सकते हैं।  ऐसा इसलिए कि इस गठबंधन में विश्व की चौथी बड़ी शक्ति भारत बेहद मजबूत और नेतृत्वकारी स्थिति में रहेगा। लिहाजा इसका स्वरूप तय हो जाने के बाद अरब और खाड़ी के इस्लामिक देशों पर वर्चस्व की जो होड़ वैश...

ग्लोबल नॉर्थ को ग्लोबल साउथ से मिल रही नीतिगत टक्कर के मायने समझिए

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ग्लोबल नॉर्थ को ग्लोबल साउथ से मिल रही नीतिगत टक्कर के मायने समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक वैश्विक मंचों पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ग्लोबल साउथ की बात दृढ़ता से रखते आए हैं, खासकर जी-20 जैसे मंचों पर प्रमुखता से। इसलिए भारत को ग्लोबल साउथ का प्रवक्ता समझा जाने लगा है। दरअसल, इसके पीछे उनकी सोच रहती है कि ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ के बीच की नीतिगत और रणनीतिक असमानता को सामूहिक रूप से दूर किया जाए और इसके दृष्टिगत विकसित देश, विकासशील देशों को कुछ छूट और कुछ सहूलियत दोनों प्रदान करें। उनकी इस बदलती सोच से ग्लोबल नार्थ को ग्लोबल साउथ से नीतिगत टक्कर मिल रही है, जिसके दूरगामी मायने बेहद अहम हैं।  आईए सबसे पहले समझते हैं कि आखिर ग्लोबल नॉर्थ और साउथ क्या है और किसमें कौन से देश शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि ग्लोबल नॉर्थ विकसित, धनी देशों को दर्शाता है जैसे अमेरिका, यूरोप, जापान- जहाँ उच्च आय, उन्नत तकनीक और औद्योगिक शक्ति है। जबकि ग्लोबल साउथ विकासशील देशों का समूह है, जिसमें भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका...

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ के 'स्टेट ऑफ द यूनियन' भाषण के वैश्विक निहितार्थ

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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ के 'स्टेट ऑफ द यूनियन' भाषण के वैश्विक निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया के थानेदार अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का 2026 स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण मुख्य रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था और घरेलू उपलब्धियों पर केंद्रित रहा। उन्होंने अमेरिकियों को आश्वस्त किया कि 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' की उनकी नीति सफल रही और इसके तहत दुनियावी देशों पर लगाए गए टैरिफ से अमेरिका के पुराने स्वर्णिम दिन लौट आए हैं। वहीं उनके भाषण में वैश्विक मामलों पर भी उल्लेख हुआ जो भारत, पाकिस्तान और ईरान जैसे परस्पर जुड़े देशों के लिए प्रासंगिक और अहम है। इसलिए इसके अंतरराष्ट्रीय निहितार्थों को समझना होगा। कतिपय प्रमुख वैश्विक संदर्भ की चर्चा करते हुए ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध रोक दिया, जिसमें पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ के हवाले से कहा कि 3.5 करोड़ लोग मरने वाले थे। इसके अलावा, उन्होंने ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम पर 2025 के 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' का भी जिक्र किया और तेहरान को स्पष्ट चेतावनी द...