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अमेरिका और चीन में बढ़ती घनिष्ठता के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स!

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अमेरिका और चीनी की बढ़ती संवाद-प्रक्रिया के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स को यूँ समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल में ही बढ़ती संवाद-प्रक्रिया और संभावित रणनीतिक समझौते को दुनिया बेहद गंभीरता से देख रही है, क्योंकि बदलती वैश्विक दुनियादारी और नवमहत्वाकांक्षी देशों-गुटों की मतलबी कूटनीति-अर्थनीति से अमेरिका-चीन दोनों की अंतरराष्ट्रीय बादशाहत खतरे में है। आखिर जब एक तरफ रूस और भारत अपनी दशकों पुरानी मित्रता पर अडिग हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप भी अपने पुराने सम्बन्धों को तरोताजा कर रहे हैं, जो कि अमेरिकी डीप स्टेट की बिल्कुल नई विसात है। देखा जा रहा है कि भारत की चतुराई और रूस की दृढ़ता से अमेरिका अपने ही बुने हुए जाल में फंसकर तड़फड़ा रहा है। वहीं, रूस-चीन की समझदारी से पश्चिमी एशिया में जो अमेरिका की फजीहत हुई है, उसके बाद अब चीन के समक्ष हथियार डालने के अलावा उसके पास कोई चारा भी नहीं  बचा है। चूंकि ट्रंफ मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के फार्मूले पर काम कर रहा हैं और रूस, भारत, फ्रांस, ...

ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों के 'दिल्ली-विमर्श' के निहितार्थ

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ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों के 'दिल्ली-विमर्श' के निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक ब्रिक्स (BRICS) के विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय दिल्ली बैठक ने दुनिया को कई महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक संदेश दिए हैं, जिनके कूटनीतिक निहितार्थ को समझने की जरूरत है। अन्यथा शेष दुनिया को अमेरिकी-यूरोपीय दादागिरी (नाटो सैन्य गठबंधन) के दुनियावी दांवपेंचों से निजात मिलनी मुश्किल है।  लिहाजा, इस बैठक में मुख्य रूप से वैश्विक शक्ति-संतुलन, अमेरिकी प्रतिबंध नीति, पश्चिम एशिया संकट, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और “ग्लोबल साउथ” की भूमिका पर जोर दिखाई दिया।  देखा जाए तो नई दिल्ली में ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों का जमावड़ा लगा हुआ है। दो दिनों का यह 18वां शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया कई मोर्चे पर अस्थिरता से गुजर रही है। ब्रिक्स के सदस्य देश - ईरान और यूएई सीधे तौर पर इस हलचल में शामिल है। ऐसे में यह जुटान पूरी दुनिया के लिए अहम हो जाती है। इस अहम बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर, रूस के विदेश मंत्री सर्जेइ लावरोव और ईरान के विदेश मंत्री अब्...

डॉनल्ड ट्रंफ और शी जिनफिंग की मुलाकात के कूटनीतिक मायने

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डॉनल्ड ट्रंफ और शी जिनफिंग की मुलाकात के कूटनीतिक मायने शेष दुनिया के लिए अहम @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सफल कारोबारी से राजनेता बने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने हर रिश्ते को फायदे और नुकसान के नजरिये से देखते है, लेकिन कूटनीतिक इंजीनियर समझे जाने वाले चीन के अपने दौरे को लेकर उन्होंने केवल इतना भर कहा कि यह सिर्फ व्यापार नहीं, वैश्विक रणनीतिक संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण है।  चूंकि अमेरिका और चीन एक दूसरे के सहयोगी और प्रतिस्पर्धी दोनों समझे जाते हैं, इसलिए लगभग एक दशक के अन्तराल पर हुई उनकी यह यात्रा के कूटनीतिक मायने अहम समझे जाते हैं, क्योंकि उनकी इस मुलाकात की सफलता और विफलता का असर पूरी दुनिया पर निःसंदेह पड़ेगा। गौरतलब है कि पिछले साल यानी अक्टूबर 2025 में जब आखिरी बार ट्रंप की चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात हुई थी, तब उनके बीच मुख्य मुद्दा टैरिफ था, लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात में जाहिर तौर पर ईरान भी होगा। क्योंकि पश्चिम एशिया संकट ने दोनों देशों के लिए मुश्किलें बढ़ाई है। इसलिए स्वाभाविक बात है कि आ...

आखिर मुस्लिम देशों से भारत के संबंध कैसे अच्छे होंगे?

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आखिर मुस्लिम देशों से भारत के संबंध कैसे अच्छे होंगे?   @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हिन्दू बहुल राष्ट्र भारत और मुस्लिम बहुल देश पाकिस्तान के बीच अक्सर चलने वाले दाव-प्रतिदाव अब तलक किसी से छिपे हुए नहीं हैं। लेकिन भारत के विरोध में अक्सर गोलबंदी दिखाने वाले तुर्किये जैसे कतिपय इस्लामिक देश और उन जैसों के इशारे पर काम करने वाला अंतरराष्ट्रीय संगठन 'ओआईसी' का 'धार्मिक पक्षपाती व्यवहार' सदैव इंडियन डिप्लोमेसी के समक्ष एक दुविधा खड़ा करता आया है।  फिर भी, रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक तटस्थता का हिमायती देश भारत सदैव बीच का रास्ता निकालकर इस्लामिक देशों से भरोसेमंद सम्बन्ध कायम रखता आया है। बावजूद इसके, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच शुरू हुए युद्ध के बाद भारतीय कूटनीति की जिस तरह से फजीहत हुई और देश में तेल-गैस सहित उन तमाम वस्तुओं की किल्लत हो गई, जिनका निर्बाध आवागमन अब तक होमुर्ज़ जलडमरूमध्य, ईरान/ओमान के माध्यम से होता रहता था। इससे महंगाई बढ़ी और वैश्विक मुद्रा भंडार पर जोर पड़ा। इसलिए भारत का बौद्धिक वर्ग यह जानना चाहता है कि आखिर चीन क...

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा!

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हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा! @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस, विशेष सचिव, पीडब्ल्यूडी, उत्तरप्रदेश सरकार "सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।" राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की उपर्युक्त पंक्तियां सदैव मेरा मार्गदर्शन करती रहती हैं। जिलाधिकारी जौनपुर के पद से स्थानांतरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है परंतु इसमें एक अमूर्त यानी छिपा रहस्य है जो केवल मेरे इष्ट श्रीमान् हनुमान जी को ही पता है। 30 जून 2026 सेवानिवृत्त होने का दिवस है,  जो सेवा में आते ही समय नियत हो गया था‌।  बहरहाल यशस्वी माननीय मुख्यमंत्री श्रीमान् योगी आदित्यनाथ जी के आशीर्वाद एवं माता-पिता, गुरुजन की कृपा से प्रदेश के महत्त्वपूर्ण जनपदों में सेवा का अवसर मिला।  महात्मा विदुर की धरती बिजनौर में मेरा अवतरण (जन्म) हुआ, उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय,प्रयागराज में हुई तथा सेवा का आरंभ माॅं गंगा के पवित्र चरणों में हरिद्वार से हुआ। इस दौ...

भाजपा के चाणक्य अमित शाह की सियासी सफलता के अहम सूत्र और संभावित चुनौतियों को समझिए

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भाजपा के चाणक्य अमित शाह की सियासी सफलता के अहम सूत्र और संभावित चुनौतियों को समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार अमित शाह की सियासी सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र क्या हैं, इसे समझने में अब हर किसी की दिलचस्पी बढ़ी है, क्योंकि राजनीतिक महकमें में उनको अक्सर “भाजपा का चाणक्य” कहा जाता है।  खासकर उनकी अभूतपूर्व चुनावी रणनीति और कुशल संगठनात्मक क्षमता की तोड़ आज किसी भी विपक्षी दल के पास नहीं है। पहले दिल्ली, फिर बंगाल को उन्होंने जिस चुनौती पूर्ण तरीके से जीता है और बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली भाजपाई सरकार बनवाई है, उससे अब भाजपा में उनके धुर विरोधी राजनेता भी पस्त नजर आ रहे हैं। वहीं मोदी-शाह का सियासी जलवा बुलंदियों के शीर्ष पर पहुंचने को कटिबद्ध है।  स्वाभाविक सवाल है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चक्रब्यूह में लगातार घिरते जा रहे भारत ने और उसका विकल्प बनती जा रही भाजपा ने आंतरिक सियासत में जो मजबूत पकड़ बनाई है, उससे विदेशी-स्वदेशी षड्यंत्रकारी बेचैन दिखाई पड़ रहे हैं। राष्...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “विदेशी मुद्रा बचाने” के आह्वान के राजनीतिक-आर्थिक निहितार्थ

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “विदेशी मुद्रा बचाने” के आह्वान के राजनीतिक-आर्थिक निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी प्रकार की आपदा को अवसर में बदलना जानते हैं। पहले कृत्रिम वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19), फिर रूस-यूक्रेन युद्ध और अब अमेरिका/इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया है। फिलवक्त मौजूदा वैश्विक संकट से भारत को निजात दिलाने और इससे प्रभावित हो रहे आम भारतीयों के हितों की रक्षा करने के लिए ही उन्होंने विदेशी मुद्रा बचाने, आयातित वस्तुओं का उपभोग मितव्ययिता पूर्वक करने और इनके मौजूद देशी विकल्प को आजमाते हुए स्थायी हल निकालने और उनपर निर्भर होने की दिशा में जनसहयोग का आह्वान करके सबको चौंका दिया है। समझा जाता है कि अमेरिका, चीन, यूरोप और अरब के कुछ देशों के द्वारा लगातार भारत विरोधी षड्यंत्र किए जा रहे हैं। कोई अपना इस्लामिक एजेंडा भारत पर थोपना चाहता है तो कोई भारत-रूस के भरोसेमंद सम्बन्धों में पलीता लगाना चाहता है और कोई भारत को पाकिस्तान, बंग्लादेश और चीन के त्रिपक्षीय कुचक्र में उलझ...