Where will India—as it sheds its boundaries of propriety—ultimately end up? The thought is frightening!
आखिर मर्यादाएं खोता हुआ भारत जाएगा किधर, सोचकर लगता है डर! @ गौरव पांडेय, स्वतंत्र पत्रकार व राष्ट्रवादी चिंतक https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 भारत केवल भौगोलिक सीमाओं में बसा एक देश नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही जीवंत संस्कृति, शालीन परंपरा, मानवीय संस्कार और जीवन मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति है। यहां परिवार को पहली पाठशाला माना गया और माता-पिता, गुरु, बुजुर्ग तथा समाज को व्यक्ति के चरित्र निर्माण का आधार समझा गया। देश-काल-पात्र की कसौटी पर खरे संतों, ऋषियों-मुनियों और समाज सुधारकों ने अपने आचरण और विचारों के माध्यम से भारतीय समाज को मर्यादा, यम-नियम, संयम, सेवा, तप, त्याग और उत्तम आचरण का जो मार्ग दिखाया, वही लोककल्याणकारी समझा गया। वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया: का स्रोत भी यही उदात्त विचार है जो हमारी अमिट दुनियावी छाप बन चुका है। ऐसे में जब सार्वजनिक मंचों पर या सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं के व्यवहार और सोच के ऐसे उदाहरण ...