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💐राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम का संक्षिप्त परिचय, पत्रकारिता के क्षेत्र की गौरवशाली पहल🎂

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                              🌹 राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम का संक्षिप्त परिचय, पत्रकारिता के क्षेत्र की गौरवशाली पहल राजनैतिकदुनिया डॉट कॉम के संचालन में तकनीकी सलाहकारों से धोखा मिलने के बाद देश-दुनिया के वैचारिक हालात बदलने और उन्हें सुसंस्कृत बनाने के खातिर हमने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती बैदेरी कुमारी उर्फ बैदेही पांडेय की सलाह पर और सुश्री तेजस्विनी और आयुष्मान यशस्वी की सहमति के बाद अपने प्यारे इकलौते भांजे प्रणय राज के दिली प्रोत्साहन पर  Rajnaitikduniya.blogspot.com/"राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" की शुरुआत की, जो एक क्रांतिकारी पहल साबित हुई।  फिर इसे मैंने अन्य क्षेत्रों में भी विस्तार दिया, क्योंकि पत्रकार मित्र हमेशा कहते कि नौकरी के साथ साथ कुछ अपना करो। इसलिए राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम की अन्य धाराओं की मित्रों के बीच शुरू किया, जिनकी व्यक्तिगत/संस्थागत मीडिया सहयोग के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान है। इससे उत्साहित होकर ही हमलोग पंचायत स्तरीय, विध...

सुशासन और विकास की पत्रकारिता के निमित्त किन-किन मुद्दों को आप कैसे उठाएंगे? ऐसे समझिए

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सुशासन और विकास की पत्रकारिता के निमित्त किन-किन मुद्दों को आप कैसे उठाएंगे? ऐसे समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक किसी भी देश-प्रदेश के समग्र उत्थान के लिए सुशासन और विकास  पहली शर्त है, जिसका मुख्य स्रोत राजनीति और प्रशासन है। जबकि सुशासन और विकास की पत्रकारिता समाज को मजबूत बनाने और पारदर्शिता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है। जानकार बताते हैं कि ऐसी पत्रकारिता न केवल समस्याओं को उजागर करती है, बल्कि समाधान-केंद्रित रिपोर्टिंग के जरिए नीति-निर्माताओं और जनता के बीच पुल का काम करती है। सत्ताधारी नेता और विपक्ष दोनों इस नजरिए से लाभ उठा सकते हैं, बशर्ते कि उनकी नीयत साफ हो।इसके कतिपय तरीके निम्नलिखित हैं-  पहला, जांच-पड़ताल आधारित रिपोर्टिंग करें : केंद्र स्तरीय, राज्य स्तरीय और त्रिस्तरीय पंचायती राज से जुड़ीं विकास परियोजनाओं में भ्रष्टाचार, देरी या गुणवत्ता की जांच करें; और इसके वास्ते स्थानीय स्रोतों, आरटीआई और आधिकारिक दस्तावेजों से सबूत इकट्ठा करें। फिर उन्हें प्रकाशित करें या उन्हें फिल्मांकित करें, ताकि लोगों को हक़ीकत समझ आ जाए। दूसरा, समुद...

भारत व दक्षिण कोरिया के बीच हुई नई डील के सियासी निहितार्थ

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भारत व दक्षिण कोरिया के बीच हुई नई डील के सियासी निहितार्थ  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक दुनियाभर में भारत की कूटनीति अपने अनोखे अंदाज के लिए चर्चित रहती आई है, क्योंकि हम तमाम हानि-लाभ की परवाह किए बगैर वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः के सभ्यता-संस्कृतिगत सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाते आए हैं। हालांकि कोई इसे गुटनिरपेक्षता समझता है तो कोई निज स्वार्थपरकता, जो गलत भी नहीं है। आखिर बिना स्वार्थ साधे परमार्थ भी किया जाए तो कैसे? इसलिए व्यवहारम फलदायकम हमारा मूलमंत्र है। भारत और द#क्षिण कोरिया के बीच हुई नई डील (व्यापार, तकनीक, रक्षा और ऊर्जा सहयोग) को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है, क्योंकि इससे ही द्विपक्षीय रिश्तों के साथ‑साथ हिंद‑प्रशांत के रणनीतिक संतुलन में भी गहरे सियासी निहितार्थ निकलते हैं। आइए क्रमबद्ध तरीके से इसे समझते हैं- पहला, भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति मजबूत होना  सबसे ज्यादा मायने रखता है। जहां भारत‑दक्षिण कोरिया की “विशेष रणनीतिक साझेदारी” को आगे बढ़ाने के घोषणाओं से भारत को उत्तर‑पूर्व एशिया और इंडो‑पैसिफिक में एक अलग ...

प्रधानमंत्री ने महिला कोटा संशोधन बिल सम्बन्धी अपनी सरकार की नाकामियों को विपक्ष के मत्थे मढ दिया

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प्रधानमंत्री ने महिला कोटा संशोधन बिल सम्बन्धी अपनी सरकार की नाकामियों को विपक्ष के मत्थे मढ दिया @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया "राष्ट्र के नाम" संदेश मुख्य रूप से लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक से जुड़े कतिपय संशोधन के असफल होने के बाद आया, जिसमें उन्होंने विपक्ष पर सीधा प्रहार किया। यह संदेश राजनीतिक रूप से विपक्ष को निशाना बनाने और अपनी सरकार की छवि को मजबूत करने का प्रयास था। लेकिन उन्हें ठंडे दिमाग से देश को जवाब देना चाहिए कि जब ओबीसी और ईडब्ल्यूएस को आरक्षण प्राप्त है तो फिर संसद और विधान मंडलों में इसे अविलंब लागू करने के लिए सरकार परिसीमन का लॉलीपॉप क्यों थमा रही है?  या फिर सरकार तदर्थ व्यवस्था क्यों नहीं कर रही है कि राजनीतिक दल घोषित आरक्षण के मुताबिक ही टिकट वितरण करेंगे, अन्यथा उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी और चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा? यही नहीं तमाम राजनीतिक दलों के सांगठनिक पदों में भी यह आरक्षण लागू होगा। जरा सोचिए, गलत तो नहीं कहा! बात छोटी थी, गलती बीजेपी एनडीए सरकार की थी, लेकिन ...

अक्षय तृतीया के अक्षय सामाजिक विचार, वरिष्ठ पत्रकार कमलेश पांडेय के साथ

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@अक्षय तृतीया के अक्षय सामाजिक विचार, वरिष्ठ पत्रकार कमलेश पांडेय के साथ  "राजनैतिकदुनिया" विचार परियोजना एक ऑनलाइन मुहिम है, जिसकी ग्रामीण उत्थान इकाई का पूर्वी बिहार मुख्यालय रहमतपुर बासा, असरगंज, मुंगेर से डिजिटल रूप से चलता है। इसका डिजिटल पता है: व्हाट्सएप- 8586800513, ईमेल: rajnaitikduniya@gmail.com वहीं, राष्ट्रीय मुख्यालय वैशाली, वसुंधरा, गाजियाबाद, दिल्ली/एनसीआर से संचालित है। इसकी व्यक्तिगत मीटिंग प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, रायसीना रोड, नई दिल्ली में ऑनलाइन रूप से आयोजित होती है। डिजिटल पता है: व्हाट्सएप- 8586800513, ईमेल: rajnaitikduniya@gmail.com  इसके वैचारिक शोध परक रपट को देश-प्रदेश की पत्र-पत्रिकाएं महत्वपूर्ण स्थान देती आई हैं। पुस्तक संपादन/प्रकाशन में भी इसका मुख्य योगदान है। हर गांव/शहर/परिवार का इतिहास संकलन आदि इसकी महत्वपूर्ण परियोजना है। वैसे धार्मिक केंद्रों को बढ़ावा देना, जिससे शिक्षा/स्वास्थ्य/बागवानी को बढ़ावा देकर कुपोषण दूर किया जाए और अंग मगध के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित किया जाए। नालंदा/विक्रमशिला जैसे मशहूर विश्वविद्यालय की उदार चेतनाओं...

महिला कोटे से जुड़े संविधान बिल के लुढ़कने के सियासी निहितार्थ

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महिला कोटे से जुड़े संविधान बिल के लुढ़कने के सियासी निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक इंडिया गठबंधन की विपक्षी एकजुटता ने पुनः सत्ताधारी गठबंधन एनडीए की नींद उड़ा दी है। ऐसा इसलिए कि लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लाने से जुड़ा था, 16 अप्रैल 2026 को वोटिंग में गिर गया। इसके पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े, जबकि न्यूनतम दो-तिहाई बहुमत (लगभग 352 वोट) की आवश्यकता थी, जो सरकार के रणनीतिकारों ने नहीं जुटा पाए। शायद पहली बार सदन में अमित शाह की रणनीति पिट गई। इसका राजनीतिक प्रभाव यह रहा कि मोदी सरकार के लिए 12 साल में पहली बड़ी संवैधानिक हार हुई है, जो विपक्ष की एकजुटता को दर्शाता है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसे "संविधान पर हमला" बताकर कांग्रेस-विपक्ष की रणनीति की जीत घोषित की, जबकि भाजपा इसे विपक्ष विरोधी हथियार बनाने की योजना बना रही है। एक सत्ता विरोधी रणनीति के तहत जहां विपक्ष ने बिल को "छलावा" करार दिया, वहीं दावा किया कि यह परिसीमन और च...

आख़िर राजनीति को समाजनीति में बदलने की जरूरत क्यों है? समझिए

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आख़िर राजनीति को समाजनीति में बदलने की जरूरत क्यों है? समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक राजनीति को “समाजनीति” में बदलने की जरूरत इसलिए है क्योंकि आज राजनीति अक्सर सत्ता, वोटबैंक और व्यक्तिगत स्वार्थ के खेल में तब्दील हो गई है, जबकि असली बदलाव तभी संभव है जब समाज के भीतर ही नैतिकता, सहिष्णुता और सामूहिक जिम्मेदारी की राजनीति (समाजनीति) बन जाए। इसलिए आइए सबसे पहले राजनीति और समाजनीति में मौलिक अंतर को समझते हैं और फिर उसके अनुरूप व्यवस्था को बदलने की मुहिम छेड़ते हैं।  देखा जाए तो "राजनीति" सामान्यतः सत्ता, चुनाव, नीतियाँ और धुरंधर नेतृत्व पर केंद्रित होती है, जबकि "समाजनीति" मानवीय मूल्यों, सामाजिक सुधार और नागरिक‑स्तरीय कार्यवाही से जुड़ती है। समाजनीति का लक्ष्य नेता‑केंद्रित शासन नहीं, बल्कि समाज के भीतर जागरूकता, सहभागिता और सामाजिक न्याय की संस्थापना होती है।  यही वजह है कि राजनीति के विकृत रूप से उबरने की जरूरत आज सभी बुद्धिजीवी समझते हैं। चूंकि आज राजनीति अक्सर जाति, धर्म, भाषा और पहचान के आधार पर विभाजन को बढ़ाती है, जिससे समाज...