आखिर हर बार अनुत्तरित क्यों रह जाता है सभ्यता का नैतिक प्रश्न?
आखिर हर बार अनुत्तरित क्यों रह जाता है सभ्यता का नैतिक प्रश्न? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार “सभ्यता का नैतिक प्रश्न” वे मूलभूत प्रश्न हैं जो किसी समाज, राष्ट्र या पूरी मानवता के सामने यह चुनौती रखते हैं कि विकास, शक्ति, विज्ञान और समृद्धि का उपयोग किस उद्देश्य और किस नैतिक आधार पर किया जाए। इस हेतु थोड़ी गहराई में जाकर चिंतन-मनन करें तो अंतर्मन कह उठेगा कि अंततोगत्वा मनुष्य के पास बढ़ती हुई शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए होगा—स्वार्थ, प्रभुत्व और उपभोग के लिए, या न्याय, करुणा, स्वतंत्रता और मानव कल्याण के लिए?” यही प्रश्न किसी भी सभ्यता की दिशा और भविष्य को निर्धारित करता है। मानव इतिहास बताता है कि बढ़ती हुई शक्ति—चाहे वह सैन्य शक्ति हो, आर्थिक संपन्नता, राजनीतिक प्रभाव या वैज्ञानिक-तकनीकी क्षमता—अपने आप में न तो नैतिक होती है और न अनैतिक। उसका नैतिक मूल्य इस बात से तय होता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता है। अनुभूत सत्य है कि जब शक्ति का उपयोग प्रभुत्व, शोषण और असीमित उपभोग के लिए होता है, तब साम्राज्यवाद, ...