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यशोदा हॉस्पिटल की सर्जरी टीम ने गम्भीर रूप से घायल युवक की जान बचाई: डॉ प्रसन्ना

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यशोदा हॉस्पिटल, नेहरू नगर, गाजियाबाद की सर्जरी टीम ने घायल युवक की जान बचाई: डॉ प्रसन्ना #  मेडिकल डायरेक्टर डॉ. (मेजर) सचिन दुबे ने कहा, “यह मामला दर्शाता है कि किसी भी गंभीर ट्रॉमा मरीज के लिए एक मजबूत और समग्र ट्रॉमा सिस्टम कितना महत्वपूर्ण होता है, जहां इमरजेंसी मेडिसिन, क्रिटिकल केयर, सर्जरी और अन्य विशेषज्ञ विभाग मिलकर समय पर जीवनरक्षक उपचार प्रदान करते हैं।” कमलेश पांडेय/राजनैतिकदुनिया  नई दिल्ली। एनसीआर के गाजियाबाद में अपनी तरह के पहले मामले में, यशोदा हॉस्पिटल, नेहरू नगर की जनरल सर्जरी टीम ने अन्य विशेषज्ञ विभागों के सहयोग से मेरठ एक्सप्रेसवे पर हुई एक गंभीर सड़क दुर्घटना में घायल 31 वर्षीय युवक की सफलतापूर्वक जान बचाई। उल्लेखनीय है कि यह दुर्घटना मेरठ एक्सप्रेसवे पर हुई थी, जिसमें युवक को बेहद गंभीर चोटें आई थीं। उसके सीने में बड़ा खुला घाव हो गया था, जिससे बायां फेफड़ा और हृदय तक दिखाई दे रहे थे। इसके अलावा कई पसलियां टूट गई थीं और उसकी सांसें भी बहुत धीमी हो गई थीं। यदि समय पर उचित उपचार नहीं मिलता तो स्थिति जानलेवा साबित हो सकती थी। ...

आखिर 12 वर्षों में राष्ट्रवादी सपनों के शहंशाह कैसे बने पीएम नरेंद्र मोदी? जानिए

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आखिर 12 वर्षों में राष्ट्रवादी सपनों के शहंशाह कैसे बने पीएम नरेंद्र मोदी? समझते हैं विस्तार से @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 12 वर्षीय शासनकाल (2014-2026) कई मायने में महत्वपूर्ण है। यह स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली और बहसयोग्य राजनीतिक दौरों में से एक माना जाता है, जिसका बहुआयामी प्रभाव आने वाले दशकों तक भारतीय राजनीति, शासन और चुनावी संस्कृति पर दिखाई दे सकता है।  पीएम मोदी के इस शासनकाल का भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इसलिए जहां समर्थक इसे निर्णायक नेतृत्व, विकास और वैश्विक प्रतिष्ठा का काल बताते हैं। वहीं, आलोचक लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक ध्रुवीकरण और आर्थिक चुनौतियों पर प्रश्न उठाते हैं।  राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मोदी काल ने भारतीय राजनीति को गठबंधन-प्रधान युग से व्यक्तित्व-केंद्रित और राष्ट्रव्यापी चुनावी राजनीति की ओर मोड़ा। लिहाजा, आने वाले वर्षों में यह आकलन होगा कि यह परिवर्तन स्थायी राजनीतिक पुनर्गठन सिद्ध होता है या फिर भारतीय राजनीति फिर किसी नए संतु...

इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने समझिए

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इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक विगत दो-तीन वर्षों में कांग्रेस की सियासी विसात पर अपना अपना-सबकुछ लुटा-पिटा देने के बाद इंडिया (INDIA) गठबंधन के सहयोगियों की जो "नई दिल्ली बैठक" हुई, उसके राजनीतिक मायने कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुए। क्योंकि इस बैठक में पहली बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की आवाज ध्यान से सुनी गई और उनके नेतृत्व को तथा उनकी पार्टी को गाहे-बगाहे चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दलों के सुरमा भोपाली नेता दबी जुबान में अपनी भावना प्रकट करने को अभिशप्त हुए। खासकर नेशनल कांफ्रेंस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को छोड़कर। इसलिए यह बैठक केवल एक नियमित विपक्षी बैठक तक सीमित नहीं रही, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब कई सहयोगी दलों और कांग्रेस के बीच मतभेदों की बढ़ती-घटती खबरें सामने आई थीं, इसलिए इसके संदेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मिली जानकारी के अनुसार, 8 जून को इंडिया (INDIA) गठबंधन की बैठक में लगभग 23 दलों के राजनेता शामिल हुए। बैठक में वि...

कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन से उपजते महत्वपूर्ण सवाल!

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कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन से उपजते महत्वपूर्ण सवाल! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर कथित "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) द्वारा आयोजित जन-प्रदर्शन केवल एक विरोध-प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में उभर रही डिजिटल-युवा राजनीति की अग्नि-परीक्षा भी माना जा सकता है। देखा गया कि “अनिबन्धित कॉकरोच जनता पार्टी” एक व्यंग्यात्मक, प्रतीकात्मक या सीमांत राजनीतिक संगठन के रूप में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रही है, जो व्यवस्था-विरोधी संदेश है।  ऐसे प्रदर्शन का वास्तविक राजनीतिक महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि संगठन के मुद्दे क्या हैं, उसके पीछे कितना जनसमर्थन है, और क्या वह प्रतीकात्मक विरोध से आगे बढ़कर कोई ठोस राजनीतिक प्रभाव पैदा कर पाता है। वहीं, इससे जुड़े नेताओं का भावी राजनीतिक मकसद भी केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार व विभिन्न भाजपा राज्य सरकारों को अपदस्थ करना है। ऐसे में आंदोलनकारियों का लक्ष्य बड़ा है और उनके संसाधन कमतर। ऐसा उनके द्वारा उठाए हुए मुद्दों से प्रत...

क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का आगाज कर-करा सकती है?

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क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का आगाज कर-करा सकती है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक डिजिटल युवा पीढ़ी के बीच चर्चा का विषय बन चुकी प्रस्तावित "कॉकरोच जनता पार्टी" (सीजेपी) के कर्ताधर्ता गण जब से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किए हैं, तब से आमलोगों के बीच भी उनकी सियासी शैली की चर्चा होने लगी है। देश की राजधानी में हाई प्रोफाइल युवा जिस तरह से चिलचिलाती धूप में सड़कों पर उतरे हैं, उससे बेरोजगार युवाओं में भी जोश जागृत हुआ है। छात्रों का तो कहना ही क्या? लेकिन पड़ोसी देश श्रीलंका, बंगलादेश और नेपाल के युवाओं की सत्ताविरोधी हरकतों से वाकिफ लोगों के मनोमिजाज में यह सवाल उभर रहा है कि क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का सूत्रपात कर सकती है?  तो आइए और यह जान लीजिए कि इसका संक्षिप्त उत्तर है- हाँ, संभावना है; लेकिन अभी यह कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी कि CJP भारत में "जेन जी क्रांति" का आगाज/सूत्रपात कर चुकी है। वैसे भी वर्तमान में CJP की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसने बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों, महंगाई और अवसरों की कमी ...

क्या सीजेपी के युवा आंदोलन के पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है? पूछते हैं लोग!

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क्या सीजेपी के युवा आंदोलन के पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है? पूछते हैं लोग! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक देश में जब-जब कोई मजबूत सरकार बनती है, कुछ वर्ष टिकती है तो उसे उखाड़ फेंकने के लिए जनआंदोलन शुरू हो जाते हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ सम्पूर्ण क्रांति (1975), पीएम डॉ मनमोहन सिंह के खिलाफ अन्ना आंदोलन (2010) और अब प्रधानमंत्री सेवक नरेंद्र मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया से उपजी "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) की युवा क्रांति (2026)! जो बेरोजगार युवाओं के बारे में सीजेआई की एक विवादास्पद टिप्पणी से उपजे जनअसंतोष के बाद डिजिटल इंटरनेट माध्यम पर पैदा होकर नई दिल्ली की सरजमीं पर आ धमकी है!  लिहाजा, आमलोगों के मन में यह आशंका सदैव पैदा हुई है कि कहीं इस आंदोलन के पीछे कोई विदेशी सहयोगी तो नहीं हैं, क्योंकि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का विदेशी प्रेम, फिर सम्पूर्ण क्रांति की उपज प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर सीआईए के एजेंट होने के राजनीतिक आरोप और उसके बाद अन्ना आंदोलन जनित एनजीओ क्रांति की उपज मुख्यमंत्री अरविंद ...

यदि विपक्षी दलों का समर्थन सीजेपी के युवा आंदोलन को मिला तो दिवास्वप्न होगा धराशायी

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यदि विपक्षी दलों का समर्थन सीजेपी के युवा आंदोलन को मिला तो दिवास्वप्न होगा धराशायी  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक सीजेपी का जंतर-मंतर आंदोलन परवान चढ़ चुका है। इससे उत्साहित विपक्षी समाजवादी सियासत के थिंक टैंक, सामाजिक आंदोलनधर्मियों के बौद्धिक ईंधन और मशहूर राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने जिस योजनाबद्ध तरीके से कॉकरोच जनता पार्टी ₹सीजेपी) के युवा आंदोलन को समर्थन दिया है, वह काबिलेतारीफ है। साथ ही एक सियासी शतरंजी चाल चलते हुए श्री यादव ने विपक्षी दलों से भी इस यूथ मूवमेंट को समर्थन देने या इससे जुड़ने का आह्वान किया है, जिसके कई संभावित राजनीतिक अर्थ/निहितार्थ निकाले जाने लगे हैं।  लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि एक तो उन्होंने भारतीय विपक्ष की प्रकृति और प्रवृति के विपरीत जाकर जिस राजनीतिक उदारता की अपेक्षा जताई है, वह गूलर का फूल मानिंद है। इसलिए उसके अर्थ परिस्थिति, बयान की भाषा और विपक्ष की वास्तविक प्रतिक्रिया पर निर्भर करेंगे। जबकि जानकार बताते हैं कि सीजेपी का यह स्वतःस्फूर्त डिजिटल आंदोल...