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क्या अयोध्या में शुरू हो रहा है ‘नए संस्थागत युग’ का अध्याय?

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क्या अयोध्या में शुरू हो रहा है ‘नए संस्थागत युग’ का अध्याय? (Is the chapter of a 'new institutional era' beginning in Ayodhya?) "अब तक राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का संचालन मुख्यतः ट्रस्ट के पदाधिकारियों और धार्मिक-सामाजिक नेतृत्व के माध्यम से होता रहा। अब पहली बार पूर्णकालिक CEO का पद बनाया गया है। इसका अर्थ है कि मंदिर प्रशासन को केवल धार्मिक न्यास के पारंपरिक ढांचे में नहीं, बल्कि एक बड़े, जटिल और बहुस्तरीय संस्थान के रूप में देखने की जरूरत महसूस हुई है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के सबसे शक्तिशाली धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों में बदल चुका है। इसलिए जब भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र कुमार मिश्र को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पहला पूर्णकालिक CEO बनाया जाता है, तो इसे महज एक प्रशासनिक नियुक्ति मानकर छोड़ देना शायद इस घटनाक्रम के वास्तविक राजनीतिक और संस्थागत अर्थ को छोटा करके देखना होगा। इस बड़ा अभिप्राय यह है कि क्या अयोध...

आखिर स्वदेशी की मृगमरीचिका में कबतक भटकती रहेंगी राजनीतिक-प्रशासनिक आस्थाएं?

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आखिर स्वदेशी की मृगमरीचिका में कबतक भटकती रहेंगी राजनीतिक-प्रशासनिक आस्थाएं? (After all, how long will political and administrative beliefs continue to wander in the mirage of Swadeshi?) "सच कहूँ तो “स्वदेशी से आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भरता से प्रतिस्पर्धी भारत और प्रतिस्पर्धी भारत से विश्व बाजार में भारतीय नेतृत्व की पैठ बढ़ती है।” इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इंस्टा पोस्ट में देश को आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता भी बतलाई है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "आर्थिक विकास दर" में उल्लेखनीय वृद्धि पर देशवासियों को बधाई देते हुए एक बार फिर से स्वदेशी का राग अलापा है और विदेशों से गैर जरूरी सोने की खरीद न करने, विदेश यात्रा से परहेज करने और विदेश में शादी करने से बचने की अपील की है। चूंकि ऐसा वो पहले भी कई बार कर चुके हैं, इसलिए सवाल उठता है कि आखिर स्वदेशी की मृगमरीचिका में राजनीतिक आस्थाएं कबतक भटकेंगी? जब स्वदेशी ही सफलता का मूल मंत्र है तो बार-बार आह्वान करने से बेहतर है, वैधानिक प्रतिबंध लगा देना, या मात्रा...

शारदा हॉस्पिटल समूह: आगरा चिकित्सा शिक्षा कार्यशाला में किडनी ट्रांसप्लांट की बारीकियां समझाई

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शारदा हॉस्पिटल समूह: आगरा चिकित्सा शिक्षा कार्यशाला में किडनी ट्रांसप्लांट की बारीकियां समझाई # शारदा केयर हेल्थ सिटी एवं शारदा हॉस्पिटल द्वारा आगरा में आयोजित चिकित्सा शिक्षा कार्यशाला में किडनी ट्रांसप्लांट की बारीकियां समझाई @ कमलेश पांडेय/राजनैतिकदुनिया आगरा: शारदा केयर हेल्थ सिटी एवं शारदा हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा ने 'दिल्ली डायलिसिस टेक्नोलॉजिस्ट एसोसिएशन' के साथ मिलकर 5 सितंबर 2026 को आगरा में एक दिवसीय चिकित्सा शिक्षा कार्यशाला (Medical Education Workshop) का भव्य आयोजन किया। इस कार्यशाला में नई दिल्ली, गाजियाबाद, मथुरा, अलीगढ़ और आगरा सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए वरिष्ठ डायलिसिस तकनीशियन (Senior Dialysis Technicians) शामिल हुए और  किडनी ट्रांसप्लांट से जुड़ीं बारीकियां समझाई। किडनी ट्रांसप्लांट और आधुनिक तकनीकों पर चर्चा कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में शारदा हॉस्पिटल के वरिष्ठ किडनी रोग एवं किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. कुणाल गांधी तथा वरिष्ठ यूरोलॉजिस्ट एवं ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. अहमद कमाल मौजूद रहे। इस मौके पर मुख्य वक्ता डॉ...

जानिए ISRO की सफलता का वैज्ञानिक मॉडल और कीजिए NASA, SpaceX और चीन से तुलना

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जानिए ISRO की सफलता का वैज्ञानिक मॉडल और कीजिए NASA, SpaceX और चीन से तुलना "समझिए, आखिर कैसे संभव हुई इसरो की सफलता-दर-सफलता वाली उपलब्धि? क्या इसके पीछे टीम नरेंद्र मोदी यानी पीएमओ से जुड़े लोगों के राष्ट्रीय समर्पण का भी बड़ा योगदान है? जी हां, सच्चाई यही इशारे करती है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जन्माष्टमी की शुभ घड़ी यानी 4 सितंबर 2026 की रात जब श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 ने उड़ान भरी और EOS-05 को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया, तब यह केवल एक और रॉकेट लॉन्च नहीं था, बल्कि यह भारत की चार दशक से अधिक पुरानी अंतरिक्ष-यात्रा में तकनीकी परिपक्वता, संस्थागत अनुशासन और असफलताओं से सीखने की वैज्ञानिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) के आधिकारिक रिकॉर्ड में GSLV-F17/EOS-05 को 4 सितंबर 2026 के सफल मिशन के रूप में दर्ज किया गया है। हालांकि, इस सफलता का मूल्यांकन केवल राष्ट्रवादी उत्साह से करना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा होगा। असली सवाल यह है— आखिर ISRO बार-बार कठिन अंतरिक्ष अभियानों...

शिक्षा के लिए एक समान राष्ट्रनीति क्यों नहीं? राज्यों से विमर्श कर बनाइए!

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शिक्षा के लिए एक समान राष्ट्रनीति क्यों नहीं? राज्यों से विमर्श कर बनाइए! (Why not have a uniform national policy for education? Formulate one in consultation with the states!) "भारत “एक समान शिक्षा राष्ट्रनीति” पर गंभीरता से विचार करे। लेकिन यहां ‘एक समान’ का अर्थ समझना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि दिल्ली में बैठकर पूरे देश के लिए एक ही पाठ्यपुस्तक, एक ही भाषा, एक ही परीक्षा और एक ही शिक्षा मॉडल तय कर दिया जाए। भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। इसलिए शिक्षा की राष्ट्रीय नीति थोपने की नहीं, सहमति बनाने की परियोजना होनी चाहिए।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। संविधान ने देश को संघीय ढाँचा दिया है, लेकिन नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देने का संकल्प भी उतनी ही मजबूती से रखा है। फिर सवाल उठता है—जब भारत के हर बच्चे का भविष्य समान रूप से महत्वपूर्ण है, तो उसकी शिक्षा की गुणवत्ता, अवसर और दिशा राज्यों के बीच इतनी अलग-अलग क्यों हो? कहीं सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, कहीं आधारभूत सुविधाओं का अभाव है, ...

मुख्यमंत्री शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन संस्थाएँ उससे कमजोर नहीं होनी चाहिए!

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मुख्यमंत्री शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन संस्थाएँ उससे कमजोर नहीं होनी चाहिए: पंडित गोविंद बल्लभ पंत            (10 सितंबर को जन्मदिन पर विशेष) "समकालीन राजनीति में यूपी के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत की राजनीतिक उपयोगिता है: विनोद पंत, भाजपा नेता व समाजसेवी, वसुंधरा, गाजियाबाद" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक समकालीन राजनीति में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. गोविंद बल्लभ पंत की राजनीतिक उपयोगिता है, क्योंकि  यह केवल इतिहास को याद करने का विषय नहीं है बल्कि वर्तमान को और सुधारने का संकल्प भी हो सकता है। यह कहना है उनके पौत्र विनोद पंत का, जो खुद भाजपा नेता व समाजसेवी, वसुंधरा, गाजियाबाद  हैं। समकालीन राजनीति में यूपी के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत की राजनीतिक उपयोगिता के बारे में विनोद पंत बताते हैं कि  स्वतंत्रता सेनानी से मुख्यमंत्री तक का सफर करने वाले पंत आज की राजनीति के लिए सुशासन, संघवाद, भूमि-सुधार, प्रशासनिक अनुशासन और राजनीतिक सहमति का एक उपयोगी राजनीतिक मॉडल प्रस्तुत करत...

भारत की राष्ट्रनीति बनाम राज्यों की मनमानी: क्या भारत को नए संघीय अनुबंध की जरूरत है?

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भारत की राष्ट्रनीति बनाम राज्यों की मनमानी: क्या भारत को नए संघीय अनुबंध की जरूरत है? (India's National Policy vs. Arbitrary Actions by States: Does India Need a New Federal Compact?) "21वीं सदी की भारतीय राष्ट्रनीति निम्नलिखित पंक्तियां हो सकती है- नया संघीय अनुबंध सत्ता के केंद्रीकरण का दस्तावेज नहीं, सत्ता की जवाबदेही का समझौता होना चाहिए। भारत को न कमजोर केंद्र चाहिए, न बेलगाम राज्य। भारत को चाहिए- “संविधान से ऊपर कोई सरकार नहीं, राजनीति से ऊपर राष्ट्रहित, और सत्ता से ऊपर नागरिक।” यही वह सूत्र है जो भारत को ‘केंद्र बनाम राज्य’ की अंतहीन लड़ाई से निकालकर ‘Team India’ की वास्तविक शासन-पद्धति तक ले जा सकता है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत की राष्ट्रनीति को केवल केंद्र सरकार की नीति मानना सही नहीं होगा। भारतीय संविधान की दृष्टि से राष्ट्रनीति का मूल आधार है—संविधान की सर्वोच्चता, राष्ट्रीय एकता, विधि का शासन, नागरिकों की समानता और संघ–राज्य के बीच संवैधानिक संतुलन। सर्वोच्च न्यायालय भी संविधान को विधायी, कार्यकारी और न्यायिक सत्ता का...