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आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?

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आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश?  पुलिस के सामने क्या हैं चुनौतियाँ? टीम  "लोकतांत्रिक राज्य की असली परीक्षा यह है कि वह शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, हिंसक अपराधों को रोके और दोनों काम कानून की मर्यादा में रहते हुए करे। केवल दमन से असंतोष समाप्त नहीं होता और केवल संवाद से तत्काल हिंसा नहीं रुकती। प्रभावी व्यवस्था को दोनों की जरूरत है—अपराध पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई और असंतोष के कारणों का गंभीर समाधान। यही दृष्टिकोण पुलिस प्रशासन को प्रभावी तथा लोकतंत्र को अधिक सुरक्षित बना सकता है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  यूरोप में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों, दंगों, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। चूंकि इसके पीछे आर्थिक असंतोष, सामाजिक विभाजन, आव्रजन और एकीकरण की बहस, राजनीतिक ध्रुवीकरण, युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता तथा पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास का संकट जैसे कई कारक हो सकते हैं। लेकिन एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है, वह यह कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक ...

मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को ऐसे समझिए

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मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को ऐसे समझिए  "अमेरिका से संबंध अच्छे हों, फिर भी भारत के पास स्वतंत्र निर्णय लेने के विकल्प बने रहें। किसी भी समझौते में भारत को यह देखना चाहिए कि लाभ और जोखिम क्या हैं, प्रतिबद्धताएँ कितनी स्पष्ट हैं और भविष्य में परिस्थितियाँ बदलने पर उसके पास कितनी गुंजाइश बचती है। यही कसौटी रूबियो की इस यात्रा और भविष्य के भारत-अमेरिका संबंधों के मूल्यांकन में उपयोगी होगी।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा का महत्त्व केवल भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में व्यापार समझौता, रूस से भारत की तेल खरीद, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, अत्याधुनिक तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन जैसे मुद्दे भी अहम हैं। साथ ही, यह यात्रा एक बुनियादी प्रश्न भी उठाती है, वह यह कि क्या भारत अमेरिका के साथ सहयोग करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकता है? क्योंकि अमेरिका की दुश्मनी से ज्...

विपक्षियों के ‘रिजीम चेंज’ वाले एजेंडा से क्या देश की राजनीति का भला हो पाएगा?

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विपक्षियों के ‘रिजीम चेंज’ वाले एजेंडा से क्या देश की राजनीति का भला हो पाएगा? "इस 5देश में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने एक लंबे कालखंड तक शासन किया, लेकिन जिस तरह से अराजक तत्वों को बढ़ावा मिला, नक्सलियों और आतंकियों को संरक्षण मिले, sg अंडरवर्ल्ड को शह मिला, इस्लामिक चरमपंथियों को फ़ मिला, उससे आमलोगों के मनोस्तिष्क में यह बात घर कर गई कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल हिन्दू विरोधी राजनीति कर रहे हैं!" डॉ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  अमेरिकी इशारे पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का ‘रिजीम चेंज’ वाला एजेंडा (प्रशांत भूषण के शब्दों में), इस हेतु ‘ वामपंथी अर्बन नक्सलियों’ की बढ़ती सक्रियता और R इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में हांफती दिल्ली की विधि-व्यवस्था से सीधा सवाल उठता है कि क्या ऐसी राजनीति से देश का भला हो पाएगा?  इस देश में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने एक लंबे कालखंड तक शासन किया, लेकिन जिस तरह से अराजक तत्वों को बढ़ावा मिला, नक्सलियों और आतंकियों को संरक्षण मिले, अंडरवर्ल्ड को शह मिला, इस्लामिक चरमपंथियों को बढ़ावा मिला, ...

आखिर हुतियों को नियंत्रित करने में सऊदी अरब, अमेरिका और ‘इस्लामिक नाटो’ क्यों विफल प्रतीत हो रहे हैं?

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आखिर हुतियों को नियंत्रित करने में सऊदी अरब, अमेरिका और ‘इस्लामिक नाटो’ क्यों विफल प्रतीत हो रहे हैं?  "सऊदी अरब के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि हूतियों पर सैन्य दबाव कैसे बढ़ाया जाए, बल्कि यह भी है कि अपने नागरिकों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री व्यापार की सुरक्षा करते हुए यमन में ऐसा राजनीतिक समाधान कैसे खोजा जाए जो बार-बार युद्ध की स्थिति पैदा होने से रोके।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  खाड़ी देशों में ईरान पर जोरदार हमला करके अमेरिका-इजरायल ने जो आग भड़काई, उसकी भारी कीमत आज उसके समर्थक चुका रहे हैं। जब ईरान ने अपनी सधी हुई रणनीति से और रूस व चीन के बल पर अमेरिका-इजरायल को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, तो उन्होंने अपनी सैन्य कार्रवाई रोक ली। इधर ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने जब सऊदी को निशाने पर लिया और ताबड़तोड़ हमले शुरू किए, तो उनके विरुद्ध अमेरिका, सऊदी अरब और इस्लामिक नाटो की सैन्य क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। आधुनिक हथियारों, उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बावजूद हूती विद्रोही सऊदी...

चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए

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चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए "भारत में राजनीतिक कारणों से जितने पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के मतदाता पहचान पत्र बनाए गए, उसके लिए तत्कालीन बीएलओ, एसडीएम और डीएम के अलावा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं हैं, तो कौन है? क्या कभी इस लापरवाही की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई? इनकी जमीनी लापरवाहियों या राजनीतिक पक्षपात के लिए इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए, न कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए जाने चाहिए।" @ कमलेश पांडेय/ वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन भारत के नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने इसे एक हास्यास्पद विषय बना दिया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति के जन्मभूमि पर ही मतदाता पहचान पत्र बना दिया जाए, और उसके पलायन के बावजूद उसका स्थाई नंबर नहीं बदलने दिया जाए, तो इससे बहुत सारे गड़बड़ झाले को रोका जा सकता है। इसे आधार कार्ड से लिंक करने पर व्यक्ति की वास्तविक पहचान भी सु...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्पों और उपलब्धियों के राजनीतिक मायने समझिए

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्पों और उपलब्धियों के राजनीतिक मायने समझिए  "आने वाले समय में राजनीतिक बहस के तीन प्रमुख प्रश्न हो सकते हैं: एक, 25 वर्षों में क्या बदला और किसे कितना लाभ मिला? दो, विकास और कल्याण के दावों को जमीन पर कैसे मापा जाए? तीन, 2047 के लक्ष्य को पूरा करने के लिए अगले चरण की प्राथमिकताएँ क्या होंगी?" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  जोड़-तोड़ वाली भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के प्रमुख के रूप में 25 वर्ष तक अनवरत रूप से कार्य करना कोई साधारण बात नहीं है। पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर भारत कब प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने इस बेमिसाल उपलब्धि को साकार करके दिखा दिया है और उनकी यह यात्रा जारी है। इस मौके पर उन्होंने अपने संकल्पों और उपलब्धियों का जो जिक्र किया है, वो वाकई कबीलेगौर हैं।  मसलन, 7 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार के प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अपने राजनीतिक सफर को मुख्यतः सेवा, जनविश्वास, मिशन और विकसित भारत के फ्रेम में प्रस्तुत किया। उ...

जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है?

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जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है? "दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभिन्न दल अपनी अपनी नीतियों और नैरेटिव के जरिए इस वर्ग को साधने का प्रयास करते हैं।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  भारत में दलित राजनीति किसी एक नेता या एक पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग राज्यों में अलग सामाजिक समूह, दलित उप-समुदाय और राजनीतिक गठबंधन अलग नेताओं को प्रभाव देते हैं। भले ही अपने अपने जमाने में बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर, जगजीवन राम और मान्यवर कांशीराम ने दलित राजनीति की जो राष्ट्रीय साख स्थापित की, उस पर दावेदारी को लेकर दलित नेता, अन्य दलित नेताओं की राह में सियासी कांटे बिछाने से बाज नहीं आ रहे हैं, जिससे राज्यवार अलग अलग नेता मजबूत हो रहे हैं और उन्हें उनके ही राज्य में दूसरे दलित नेता भी कड़ी चुनौती दे रहे हैं।  इस प्रकार  दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभ...