शब्दों के 'संवैधानिक आडंबर' से पैदा होने वाले सियासी बवंडरों को आखिर थमेगा कौन, नेताओं ने तो निराश किया!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक लोकसभा में भारत के संविधान की 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पर चर्चा हुई जिसमें तमाम दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, चाहे मजे-मजाए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हों, या नई नवेली लोकसभा सदस्य प्रियंका गांधी या अन्य दलों के सांसद या मंत्रीगण, सबों ने बातों ही बातों में एक-दूसरे की खूब मीनमेख निकाली, जबकि अपने गिरेबान में झांकने की कोशिश नहीं की। हां, सबने अपने अपने पसंदीदा संविधान निर्माताओं की जमकर तारीफ की। हालांकि, यह सवाल एक बार फिर निरुत्तर रह गया कि आखिर शब्दों के 'संवैधानिक आडंबर' से पैदा होने वाले सियासी बवंडरों को आखिर थमेगा कौन, क्योंकि नेताओं की संकीर्ण सियासी सोच ने तो जनमानस को एक बार फिर से निराश किया है! वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने तो लिंक्डइन पर यहां तक लिख दिया कि "संविधान पर चर्चा में आरोप-प्रत्यारोप ज़्यादा रहा। बेहतर होता कि सभी पक्ष मूल मुद्दों, समस्याओं और चुनौतियों पर विचार करते। 1997 जैसी चर्चा हो सकती थी, तब आजादी की स्वर्ण ...