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शब्दों के 'संवैधानिक आडंबर' से पैदा होने वाले सियासी बवंडरों को आखिर थमेगा कौन, नेताओं ने तो निराश किया!

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक लोकसभा में भारत के संविधान की 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पर चर्चा हुई जिसमें तमाम दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, चाहे मजे-मजाए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हों, या नई नवेली लोकसभा सदस्य प्रियंका गांधी या अन्य दलों के सांसद या मंत्रीगण, सबों ने बातों ही बातों में एक-दूसरे की खूब मीनमेख निकाली, जबकि अपने गिरेबान में झांकने की कोशिश नहीं की। हां, सबने अपने अपने पसंदीदा संविधान निर्माताओं की जमकर तारीफ की।  हालांकि, यह सवाल एक बार फिर निरुत्तर रह गया कि आखिर शब्दों के 'संवैधानिक आडंबर' से पैदा होने वाले सियासी बवंडरों को आखिर थमेगा कौन, क्योंकि नेताओं की संकीर्ण सियासी सोच ने तो जनमानस को एक बार फिर से निराश किया है! वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने तो लिंक्डइन पर यहां तक लिख दिया कि "संविधान पर चर्चा में आरोप-प्रत्यारोप ज़्यादा रहा। बेहतर होता कि सभी पक्ष मूल मुद्दों, समस्याओं और चुनौतियों पर विचार करते। 1997 जैसी चर्चा हो सकती थी, तब आजादी की स्वर्ण ...

संविधान निर्माता अम्बेडकर के अपमान पर मचे सियासी तूफान के पूंजीवादी एजेंडे को ऐसे समझिए

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक स्तम्भकार लीजिए, हमारे विपक्षी नेताओं को एक और अपमानजनक मुद्दा मिल गया, ताकि संसद की जनहितकारी कार्यवाही को बाधित कर दिया जाए और सड़क से संसद तक हंगामा खड़ा करके लोगों को गोलबंद किया जाए। इससे मिशन आम चुनाव 2029 की विपक्षी राह आसान हो जाएगी। बताया जाता है कि एक संसदीय चर्चा के दौरान संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने यह कह दिया है कि आजकल आंबेडकर का नाम लेना सियासी फैशन हो गया है। इतना नाम भगवान का लेते तो सात जन्मों के लिए स्वर्ग मिल जाता।  बकौल शाह, "आंबेडकर-आंबेडकर-आंबेडकर क्यों कह रहे हो? आप अगर भगवान-भगवान कहेंगे तो 7 पीढ़ियां आपकी स्वर्ग में जाएंगी।" बस इसी बयान को लेकर प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी का विरोध करना शुरू कर दिया है।  इस प्रकार विभिन्न दलों के समर्थन-विरोध और बचाव की सियासत के बीच संसद में धक्कामुक्की तक की नौबत आई गई और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी व...

'आरएसएस-शिवसेना' के हिन्दू दर्शन की 'अकाल मौत' के मायने को ऐसे समझिए

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक आखिर जब पूरी दुनिया में मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतें हावी होती जा रही हैं और लोकतंत्र को चुनौती देते हुए एक के बाद दूसरी 'आतंकी सरकारें गठित करती जा रही हैं, वैसी विडंबनात्मक परिस्थिति में भारत की हिंदूवादी ताकत के रूप में शुमार विश्व का सबसे बड़ा संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और उसका पिछलग्गू रही शिवसेना (अब शिवसेना यूबीटी) आदि का अपेक्षाकृत नरमपंथी रवैया अख्तियार करना पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है।  जानकारों के मुताबिक, इससे हतप्रभ ईसाई जगत तो यहां तक कह रहा है कि ऐसा होना भारत/हिंदुस्तान के समुज्ज्वल भविष्य के साथ किसी विश्वासघात जैसा है। इससे पाक समर्थित आईएसआई का काम आसान हो जाएगा जो चीनी-अमेरिकी शह पर भारत को पाकिस्तानी साम्राज्य में मिलाने के लिए यहां के मुसलमानों को गोलबंद कर रही है। कुछ इसी तरह की कवायद वह बंगलादेश में भी कर रही थी और इसी वर्ष उसमें सफल हुई। परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान के बाद बंगलादेश में भी हिंदुओं का जीना मुहाल हो चुका है। वहीं, उसके प्लान के अनुरूप हमलोग जम्मू-कश्मीर, केरल और...

राष्ट्रीय विमर्श: धर्म के प्रति निरपेक्षता से बढ़ते अधर्म को आखिर रोकेगा कौन? बताए आरएसएस!

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक धर्म और अधर्म के बीच मौजूद सूक्ष्म विभाजन को स्पष्ट करते हुए लोक रचयिता गोस्वामी तुलसीदास महाकाव्य रामचरित मानस में लिखते हैं कि 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।' यानी कि दूसरों का हित सोचना-करना ही धर्म है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाना ही अधर्म है। जहां तक भारत और उसकी धर्मनिरपेक्षता का सवाल है तो खुद आरएसएस और उसका राजनीतिक संगठन भाजपा (जनसंघ का परिवर्तित स्वरूप) इस पर सवाल उठाते हुए तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस और समाजवादी दलों की सरकारों पर तुष्टिकरण के आरोप मढ़ती आई है।  इससे स्पष्ट है कि धर्म के प्रति बढ़ती निरपेक्षता से बढ़ते अधर्म को आखिर कौन रोकेगा, यह यक्ष प्रश्न है और इस नीतिगत सवाल पर आरएसएस को ढुलमुल नहीं, बल्कि स्पष्ट रवैया अपनाना चाहिए। चूंकि वह विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन है, दुनिया के सबसे पुराने धर्म सनातन धर्म के आधार पर जीवन पद्धति को विकसित करने और प्राणी मात्र की रक्षा करने का वह पक्षधर रहा है, इसलिए उसके रवैए से देश सहित विश्व का जनमत प्रभावित होता है। क्योंकि वह अमूमन तार्क...

सियासी दांवपेंच: प्रधानमंत्रियों के अंतिम संस्कार और स्मारक के लिए अपनाए गए दोहरे मापदंड पर खुद घिरी कांग्रेस

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पहले पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव और अब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अंतिम संस्कार और उनके स्मारक को लेकर जो घिनौनी राजनीति 'कांग्रेस परिवार' खासकर नेहरू-गांधी परिवार ने शुरू की है, वह बेहद लज्जाजनक और भारतीय राजनीति पर किसी काले धब्बे की मानिंद है। इससे देश का सत्तापक्ष, विपक्ष और जनमानस सभी शर्मसार हुए हैं।  दरअसल, कांग्रेस व विपक्षी दल के कई नेता चाहते थे कि डॉ. मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार राजघाट के पास किया जाए और वहीं पर उनका समाधि स्थल भी बनवाया जाए। जबकि केंद्र सरकार ने डॉक्टर मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार निगमबोध घाट पर किए जाने का फैसला लिया और बाद में उनका स्मारक बनवाए जाने की बात कही। इसी मसले पर सियासत शुरू हो गई।  वहीं, इस मसले पर अबतक हुए सियासी वार-पलटवार में भाजपा से ज्यादा कांग्रेस घिर चुकी है। क्योंकि अब आईना दिखाया जा रहा है कि प्रधानमंत्रियों के अंतिम संस्कार और स्मारक के लिए खुद कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार ने ही दोहरे मापदंड अपनाए थे। जबकि वह नाहक ही इस मसले पर भाजपा को घे...

यक्ष प्रश्न: क्या कांग्रेस का 'वामपंथीकरण' ही राहुल गांधी की नई राजनीति होगी?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि यदि उनकी सरकार आई तो सिर्फ जाति जनगणना ही नहीं, बल्कि आर्थिक सर्वेक्षण भी होगा। दरअसल, इसके जरिए वह पता लगाएंगे कि किसके पास कितनी संपत्ति है। फिर नई राजनीति शुरू होगी। इससे साफ है कि जेएनयू के युवा वामपंथी नेताओं व कार्यकर्ताओं से भरी कांग्रेस अब उस वामपंथ की राह पर अग्रसर है, जो पूरी दुनिया में राजनीतिक तौर पर अप्रासंगिक हो चुका है। बता दें कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर जाति सर्वेक्षण और आर्थिक समीक्षा कराए जाने की वकालत करते हुए कहा कि इसका मकसद है यह पता लगाना कि किसके पास कितनी संपत्ति है। उन्होंने कहा कि अगर वह सत्ता में आए तो यह भारत का पहला काम होगा। दरअसल, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में "न्याय मंच-अब इंडिया बोलेगा" में छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्रीय सत्ता में आने के बाद उनका पहला कदम आर्थिक सर्वेक्षण के साथ-साथ जाति जनगणना करवाना होगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि देश में किसके पास कितनी संपत्ति है।...

भूतपूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के प्रति इतिहास आखिर क्यों दयालु होगा? समझिए विस्तार से!

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह अब नहीं रहे, लेकिन पिछले 10 वर्षों से उनकी एक पंक्ति मुझे रह-रह कर चुभती आई है। वह यह कि वर्तमान मीडिया से ज्यादा इतिहास उनके प्रति दयालु होगा। चूंकि मैं इतिहास स्नातकोत्तर का विद्यार्थी रहा हूँ और पेशेवर मीडिया कर्मी भी हूँ, इसलिए उनकी बात और उसके मर्म को भलीभांति समझता हूं। इसलिए अमूमन सोचता रहता हूँ कि आखिर डॉ सिंह ने इतनी तल्ख टिप्पणी क्यों की?  याद दिला दें कि जनवरी 2014 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि "मैं मानता हूं कि अभी की मीडिया की तुलना में इतिहास मेरे प्रति दयालु होगा।" इसलिए यह यक्ष प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर डॉ मनमोहन सिंह के प्रति इतिहास क्यों दयालु होगा? किस स्तर तक यानी कितना होगा? और उन बातों-जज्बातों को जिन्हें खुद उन्होंने मुखरित होकर उठाया, या फिर मीडिया के उठाने के बावजूद भी उन पर चुप्पी साध ली, उसके बारे में इतिहास विद किस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे, वस्तुनिष्ठ अवलोकन करना जरूरी है।  ऐसा इसलिए कि पत्रकारिता भी तो...

सियासी प्रपंच: इंडिया' गठबंधन के कब्र पर खड़ा होने वाला तीसरा मोर्चा आखिर चलेगा कितने दिन तक?

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@ कमलेश पाण्डेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान जो राजनीतिक बयानबाजियां होती दिखाई दे रही हैं, उससे साफ है कि जहां 'इंडिया गठबंधन' अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, वहीं 'एनडीए गठबंधन' पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। इसके अलावा, एक खास लक्षण यह भी दिखाई दे रहा है कि भारतीय राजनीति में कभी कद्दावर समझा जाने वाला  कांग्रेस-भाजपा विरोधी तीसरा मोर्चा एक बार फिर से अपना नया आकार ग्रहण कर रहा है।  इसके साथ ही यह सवाल भी पैदा हो रहा है कि आखिर में इंडिया' गठबंधन के कब्र पर खड़ा होने वाला तीसरा मोर्चा कितने दिन तक चलेगा? और क्या कांग्रेस उनका भी वही हश्र नहीं करेगी, जैसा कि उसने जनता पार्टी (1977), जनता दल के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय मोर्चा (1989), क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व वाले संयुक्त मोर्चे (1996) का किया है। यही नहीं, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए-2004), महागठबंधन बिहार/उत्तरप्रदेश और महाविकास अघाड़ी महाराष्ट्र में भी कांग्रेस को नीचा दिखाने वालों के साथ उसने सियासी वक्त बदलते ही कैसा सुलूक किया, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है।...

राष्ट्रीय विमर्श: आखिर चुनावी रेवड़ी को परिभाषित करना इतना मुश्किल क्यों है?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 की घोषणा करते वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि 'चुनावी रेवड़ी' क्या है, इसे परिभाषित करना मुश्किल है। चूंकि इस मुद्दे पर आयोग के हाथ बंधे हुए हैं। इसलिए, कानूनी उत्तर ढूंढे जाएं।" हालांकि, उनकी इस साफगोई से हमारी संसद और हमारे संविधान के संरक्षक सुप्रीम कोर्ट, दोनों की जिम्मेदारी बढ़ चुकी है। वह यह कि वो जल्द से जल्द इस मसले पर व्याप्त कानूनी असमंजस को दूर करने के लिए एक नेक पहल करें।  वहीं, अब तक ऐसा नहीं होना निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया पर एक गम्भीर सवालिया निशान छोड़ जाता है। क्योंकि जब इस मसले पर स्पष्ट नियमन होंगे तो इसका उल्लंघन करने वाले राजनीतिक दलों व उनके नेताओं को कानून के कठघरे में खड़ा किया जा सकेगा। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार की बात से अब यह स्पष्ट हो चुका है कि आजादी और गणतंत्र बनने के इतने दशकों बाद भी हमारे सत्ता पक्ष या विपक्ष ने कभी इस मुद्दे पर स्पष्ट नियमन बनाने की पहल ही नहीं की, ताकि दुविधाजनक कानूनी परिस्थितियों से चु...