संकल्प से सिद्धि, उद्वेग रहित कर्म
संकल्प से सिद्धि, उद्वेग रहित कर्म @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस, डीएम, जौनपुर (यूपी) कहा गया है कि "अतिरेकं पौरुषं यत्नं वर्जयित्वेतरा गतिः। प्रारब्धं फलते कर्मं कालेन न हि दुर्लभम्।। सर्वदुःखक्षयप्राप्तौ सुखस्य चोदयस्थितौ। मनसः सङ्गतारम्भः प्रथमं प्रविजायते।। शुभकर्मण्यशु पतिता: पापकर्मण्युद्यताः। स्वार्थान्धा दुष्कृतान्वेषी नृणां सा दुर्गतिर्मता।। शुभकर्माण्यशु पतिता: पापात्मानं निराकुलाः। शुभानि केवलं कर्म पुण्यस्य फलभागिनः।। न तदस्ति जगत्कोशे नानारत्नसमन्वितम्।" "यत् पौरुषेण शुद्धेन सत्येन तपसा विना। न सिद्ध्यति नरव्याघ्र न तदस्ति कुतः चन।। न किञ्चिन्महाबुद्धे दैवं कर्मातिगं किला। संसिद्ध्यसंसिद्ध्योर्वा तूष्णीं किं व्यथसे पुनः।।" कहने का तातपर्य यह कि इस संसार में सब दुःखों का क्षय करने के लिए पुरुषार्थ (मनुष्यों के यत्न) के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है। संसार रूपी कोश में ऐसा कोई रत्न नहीं है जो शुद्ध पुरुषार्थ से किए हुए शुभ कर्म के द्वारा प्राप्त न हो सके। वस्तुतः तीनों लोकों में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो उद्वेग रहित पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त न...