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संसद का शीतकालीन सत्र: स्वस्थ बहस हो पर सियासी बाजीगरी नहीं!

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क्या संसद का शीतकालीन सत्र कोई नया मानक स्थापित कर पाएगा या फिर वही घिसी-पिटी सियासत दोहरायी जाएगी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कभी लोकतंत्र की जनभावनाओं को स्पष्ट करते हुए फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर ने कहा था कि "मैं आपके विचार से सहमत नहीं हो सकता, लेकिन उसे कहने के आपके अधिकार की रक्षा आखिरी दम तक करूंगा।" लेकिन यह विशुद्ध रूप से संस्कारवान नीति की बात है। आज जबकि लोकतांत्रिक सियासत का विकृत चेहरा घटना दर घटना सामने आ चुका है और चाहे उच्च सदन हो या निम्न सदन, दोनों की विभिन्न कुसंस्कारी घटनाएं कुछ गलत नजीर/नजरिया प्रदान कर चुकी हैं तो इनकी निरन्तरता को लेकर अब प्रशासनिक और न्यायिक सख्ती की जरूरत आन पड़ी है। क्योंकि अब राजनीतिक अचार संहिता भी पक्षपात पूर्ण प्रतीत होने लगी हैं। ऐसे में फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर के विचारों से पूर्णतया सहमत नहीं हुआ जा सकता है। चूंकि भारतीय संसद का शीतकालीन सत्र आगामी 1 दिसंबर 2025 से शुरू होगा। इसलिए सदन के कामकाज को सुचारू ढंग से चलाने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष को अपनी नकारात्मक अतीत से सबक लेकर सकारात्म...

आखिर भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक कैसे बना राममंदिर का धर्मध्वज, समझिए विस्तार से

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आखिर भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक कैसे बना राममंदिर का धर्मध्वज, समझिए विस्तार से @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक राम मंदिर का धर्म ध्वज केवल एक धार्मिक निशान नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के दीर्घकालिक पुनर्जागरण (रिनेसां) का जीवित प्रतीक बनकर सामने आया है। इसके रंग, आकृति, चिन्ह और जिस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ में इसे फहराया गया है, वह सब मिलकर इसे “सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज” बनाते हैं। यही वजह है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वज फहराते हुए कहा कि यह धर्मध्वज भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक है और रामराज की कीर्ति को स्थापित करता है। उन्होंने इसे संकल्प, संघर्ष और सफलता की भाषा बताया और राम के आदर्शों का उद्घोष माना, जो अयोध्या को राममय और धर्ममय बनाने का प्रतीक है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा है कि यह धर्मध्वज समाज की सहभागिता और संतों की साधना की गाथा है, जो सदियों से चला आ रहा संघर्ष और स्वप्नों का साकार रूप है। उन्होंने इसे "प्राण जाए पर वचन न जाए" यानी जो कहा जाए वही किय...