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फ़रवरी 2, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या अमेरिका के स्वर्णिम दौर में शेष विश्व को मिल पाएगी तीसरे विश्वयुद्ध से मुक्ति?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनियावी चक्रब्यूह में निरंतर घिरते जा रहे अमेरिका ने जब यौद्धिक 'चंद्रायण व्रत' की बात कही तो सहसा विश्वास नहीं हुआ! वहीं, दुनिया के थानेदार की मजबूरी, दूरदर्शिता और खुदगर्जी भी स्पष्ट महसूस हुई। क्योंकि लगातार किसी न किसी सांसारिक संघर्ष में उलझकर थक-हार चुके देश अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ ने अपनी विक्ट्री रैली में विक्ट्री स्पीच देते हुए जो कुछ संकेत दिया, उसका सार-सत्य यही है कि अपने लोगों के बेहतर भविष्य के लिए अमेरिका अब तीसरा विश्व युद्ध नहीं लड़ना चाहता है और इसकी बची-खुची संभावनाओं को भी जल्द खत्म करने की हिमायत करेगा।  इसलिए सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका के स्वर्णिम दौर में शेष विश्व को तीसरे विश्वयुद्ध से मुक्ति मिल पाएगी? या फिर यह किसी अन्य देश यथा- चीन या रूस के मार्फ़त अन्य देशों पर थोपी जाएगी, जिससे प्रथम विश्वयुद्ध की भांति अमेरिका दूर रहेगा। यूं तो दूसरे विश्वयुद्ध के शुरुआती चरण में भी अमेरिका इस महायुद्ध से दूर ही रहा था, लेकिन जब मजबूरी वश उसमें शामिल हुआ तो युद्ध के परिणामों ...

नक्सलियों के खिलाफ चल रही निर्णायक मुहिम के मिलने लगे हैं बेहतर नतीजे

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक आमतौर पर नक्सली, आतंकवादी और अंडरवर्ल्ड के मास्टरमाइंड अपने पूरे जमात के साथ भारतीय गणतंत्र के लिए चुनौती समझे जाते हैं। इसलिए सुरक्षाबलों ने 76वें गणतंत्र दिवस से महज कुछ दिन पहले नक्सलियों के खिलाफ जो निर्णायक कार्रवाई करते हुए अंतरराज्यीय ऑपरेशन चलाए हैं और एक दर्जन से ज्यादा नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया है, वह तिरंगे और संवैधानिक गणतांत्रिक व्यवस्था को सच्ची सलामी है। इसलिए देशवासियों की अपेक्षा है कि सुरक्षा बलों की यह कार्रवाई और अधिक तेज होनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करके ही हम उनके नापाक हौसले को तोड़ सकते हैं।  देखा जाए तो चाहे अंतर्राष्ट्रीय थल या समुद्री सीमा से सटे प्रदेश हों या हमारे आंतरिक प्रदेश, यहां पर नक्सलियों, आतंकवादियों और अंडरवर्ल्ड सरगनाओं की मौजूदगी और उनके मार्फ़त जब-तब होते रहने वाली हिंसात्मक घटनाएं एक ओर जहां शासन व्यवस्था और अमनपसंद लोगों को मुंह चिढ़ाती हैं, वहीं दूसरी ओर धनी लोगों के भयादोहन का कारण भी  बनती हैं। चूंकि अवैध मानव व वस्तु तस्करी, ड्रग्स सिंडिकेट, अवैध हथियारों के कारोबार, ...

आखिर कौन लागू करवाएगा दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में आचार संहिता?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में चीनी दबदबे को नियंत्रित करने के लिए एक आदर्श आचार संहिता लागू करने की मांग सही है, लेकिन वहां पर इसे लागू कौन करवाएगा, इस बात का उत्तर भारत समेत विभिन्न आसियान देशों के पास नहीं है। ये तो सिर्फ वकालत कर रहे हैं कि दक्षिण चीन सागर ऐसा होना चाहिए। जबकि चीन अपनी हठधर्मिता के चलते सैन्य कार्रवाई करने पर उतारू है। इसी दृष्टि से वह लगातार अपनी तैयारी पुख्ता करता जा रहा है। लेकिन उसे रोकने में संयुक्त राष्ट्र संघ भी यहां असहाय प्रतीत हो रहा है।  देखा जाए तो चाहे चीन विरोधी अमेरिका हो या चीन समर्थक रूस या फिर इनके-इनके समर्थक विभिन्न विकसित और विकासशील देश, सबकी नीति इस मामले में अभी तक ढुलमुल ही रही है। इसलिए भारत की भूमिका इस मामले में भी अहम और निर्णायक बताई जा रही है। क्योंकि भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न देशों के बहुत पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध भी हैं। वहीं, वैश्विक दुनियादारी में चीन को संतुलित रखने के लिए भी भारत और आसियान देशों को एक-दूसरे की जरूरत है। इसलिए आशियान देशों के ...

भाजपा के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर पार्टी से लेकर संघ तक चल रही है माथापच्ची!

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय जनता पार्टी का अगला अध्यक्ष कौन होगा, इसको लेकर अब सियासी हल्के में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। क्योंकि जो भी अध्यक्ष बनेगा, वह कई मायने में महत्वपूर्ण होगा। भाजपा के मिशन 2029 की सफलता का सारा दारोमदार उसी के ऊपर होगा। इससे पहले मिशन यूपी 2027 को सफल बनाने का नैतिक भार भी उसी के कंधे पर होगा। हालांकि, पार्टी अध्यक्ष का चयन इस बार उतना आसान नहीं है, जितना कि पहले हुआ करता था।क्योकि पार्टी-संघ के सभी गुट एक बेहतर समन्वय स्थापित रखने वाला राष्ट्रीय अध्यक्ष चाहते हैं जो उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम हर जगह लोकप्रिय हो और उस पर गुट विशेष की छाप भी नहीं पड़े। हालांकि, भाजपा में अटल-आडवाणी युग को समाप्त करके मोदी-शाह युग का आगाज करने वाली ऊर्जावान टीम अगले अध्यक्ष के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। जबकि संघ की पीठ पर सवार होकर पार्टी की तीसरी पीढ़ी के नेता अपना-अपना अनुभव और अपनी-अपनी भावी भूमिका के दृष्टिगत अपनी-अपनी गोटी सेट करने के जुगाड़ में लगे हुए हैं। ये नेता पार्टी व संघ के सभी गुटों से समुचित तालमेल बिठाने में जु...

क्या 'कैलाश-मानसरोवर' बनेगा एशिया का दूसरा 'येरुशलम' बनेगा या समझदारी दिखाएंगे भारत-चीन?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक साल 2025 की गर्मियों में भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा एक बार फिर से शुरू हो जाएगी। क्योंकि  दोनों देशों के बीच इस यात्रा को लेकर पुनः सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है। वहीं, विगत पांच वर्षों से थमी हुई इस यात्रा को पुनः शुरू करने के लिए दोनों देश डायरेक्ट फ्लाइट शुरू करने को लेकर भी तैयार हो गए हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, एक द्विपक्षीय बैठक में इस आशय की सहमति बनी है।  हालांकि, कैलाश मानसरोवर का जिक्र होते ही सबसे पहले हर किसी के मन में यही सवाल उठता है कि कैलाश मानसरोवर किसका है? जब भगवान शिव देवता भारतीयों के देवाधिदेव महादेव हैं तो फिर यह पुण्यभूमि तिब्बतियों/चीनियों की कैसे हो गई? क्या तिब्बत/चीन ने इस पर जबरन कब्जा किया है? आखिर इससे जुड़ी कैलाश मानसरोवर की वह क्या कहानी है, जिसपर इतिहासकारों और विद्वानों के अलग-अलग आलेख उपलब्ध हैं। वहीं, लोगों के मन में यह विचार पैदा हो रहा है कि यदि 'कैलाश-मानसरोवर' की चीन द्वारा जबरिया परिवर्तित स्थिति को पुनः बदलने के लिए भारत सरकार ने समय रहते ही समुचित कद...

प्रयागराज महाकुंभ के हृदयविदारक हादसे के लिए जिम्मेदार कौन?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्रयागराज महाकुंभ के दौरान मौनी अमावस्या ब्रह्ममुहूर्त स्नान से ठीक पहले संगम नोज पर जुटी बेकाबू भीड़ की आपाधापी से जो भगदड़ मची और हृदय विदारक घटना घटी, उससे सनातन धर्म पुनः कलंकित हुआ है। इस अप्रत्याशित हादसे से एक बार फिर हमारा 'धर्म अनुशासन' सवालों के घेरे में आ चुका है। साथ ही साथ भीड़ प्रबंधन सम्बन्धी प्रशासनिक तैयारियां भी, जिसको लेकर लाख प्रशासनिक दावे होते रहे हैं, जबकि एकाध घटनाएं ही उसकी तैयारियों की पूरी पोल खोल देती हैं।  इसलिए सुलगता सवाल है कि प्रयागराज महाकुंभ में भीड़ प्रबंधन की विफलता से हुए हृदयविदारक हादसे के लिए जवाबदेह कौन है? जिम्मेदार कौन है? आखिर ब्रेक के बाद जहां-तहां होते रहने वाली ऐसी रूह कंपा देने वाली घटनाओं को रोकने में हमारा प्रशासन अबतक नाकाम क्यों है और वह कबतक सक्षम हो पाएगा? या फिर कभी नहीं हो पाएगा, क्योंकि ऐसे मामलों में उसका ट्रैक रिकॉर्ड हमेशा खराब प्रतीत हुआ है।  फिलवक्त योगी सरकार ने प्रयागराज महाकुंभ हादसे की न्यायिक जांच करवाने के आदेश दे दिए हैं, ताकि यह पता चल सके कि इतनी बड़...

आम बजट 2025: सर्वसमावेशी और दूरदर्शी बजट से भारत निर्माण को मिलेगी गति

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक आम बजट 2025 एक सर्वसमावेशी और दूरदर्शी बजट है। यह कई मायने में सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी भी है। खासकर ताजा बजट प्रस्तावों के माध्यम से मध्यम वर्ग को जो भारी कर राहत प्रदान किया गया है और आयकर छूट सीमा को बढ़ाकर 12 लाख रुपया तक कर दिया गया है, उससे अर्थव्यवस्था को विभिन्न कोणों से मजबूती मिलने के आसार प्रबल हैं। कुल मिलाकर यह आम आदमी का बजट है, जो गरीबों, युवाओं, अन्नदाता किसानों और नारी शक्ति को आर्थिक मजबूती प्रदान करता है।  सच कहा जाए तो यह आम बजट विकसित भारत यानी हर क्षेत्र में श्रेष्ठ भारत के निर्माण की दिशा में मोदी सरकार की दूरदर्शिता का ब्लूप्रिंट है, जिसमें किसानों, गरीबों के साथ-साथ मध्यम वर्ग पर भी ध्यान दिया गया है। वहीं, महिला और बच्चों की शिक्षा, उनके पोषण व स्वास्थ्य पर भी फोकस किया गया है। इस बजट में स्टार्टअप, इनोवेशन और इन्वेस्टमेंट तक, यानी कि अर्थव्यवस्था की समुन्नति के हर क्षेत्र को समाहित किया गया है। इस प्रकार यह बजट मोदी सरकार के आत्मनिर्भर भारत का व्यापक रोडमैप है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क...

क्या डॉलर के दम पर चीन जैसे भस्मासुर से निबटेगा अमेरिका?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चीन दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनना चाहता है और  ऐसा वह उस अमेरिका की कीमत पर करना चाहता है जिसने उसके नवनिर्माण और समुत्थान में महती भूमिका निभाई है। हालांकि अमेरिका भी इसे भलीभांति समझ चुका है और समुपस्थित विभिन्न परिस्थितियों से निपटने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ और विदेश मंत्री मार्को रूबियो के डॉलर की चिंता और उसके लिए जिम्मेदार चीन सम्बन्धी हालिया बयानों पर जब आप गौर करेंगे तो यह समझ जाएंगे कि अमेरिका की चिंता सिर्फ डॉलर की गिरती साख को ही बचाने की नहीं है बल्कि वह सोवियत संघ की भांति ही अब चीन को भी निबटाने की रणनीति पर फोकस कर चुका है।  ऐसे में सुलगता सवाल यह है कि क्या अमेरिका सिर्फ डॉलर के दम पर चीन जैसे भस्मासुर से निबटेगा या फिर कुछ अन्य मौजूं उपाय भी करेगा! उल्लेखनीय है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की जगह किसी और मुद्रा के इस्तेमाल की कवायद जिस तरह से चीन कर-करवा रहा है और इस नजरिए से ब्रिक्स देशों यानी रूस-ब्राजील आदि को ढाल बनाए हुए है, उससे अम...