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जनवरी 8, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तीखी बात: अमेरिका के इशारे पर न थिरकने वाले देश कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें!

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तीखी बात: अमेरिका के इशारे पर न थिरकने वाले देश कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अंतर्राष्ट्रीय जगत में आर्थिक और तकनीकी दृष्टिकोण से संपन्न अमेरिका अपनी 'डीप स्टेट खलनीति' के बल पर दुनिया का दादा बन चुका है। चूंकि जी-7 के देश उसके मजबूत हाथ हैं, इसलिए ब्रिक्स देशों की औकात उससे खुलेआम उलझने की आजतक नहीं बन पाई है। आखिर पहले भारत के पास-पड़ोस में, फिर ईरान में और अब बेनेज़ुएला के दास्तान जो चुगली कर रही हैं, उसके वैश्विक मायने तो यही हैं। अब अगला नम्बर शायद कम्बोडिया का आएगा, जिसे ट्रंफ ने ताजा धमकी दी है। देखा जाए तो मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के स्वप्नद्रष्टा डॉनल्ड ट्रंफ उनकी मुद्रा को चुनौती दिलवाने वाले, यदा कदा उनको आंखें दिखाने वाले रूस-चीन के मजबूत समर्थकों के एक एक कर रीढ़ तोड़ने और इसी झांसे में जांबाज भारत को धमकाकर अपने खेमे में मिलाने के लिए सधी चालें चलना शुरू कर चुके हैं। डीप स्टेट से जुड़े लोगों की मानें तो आगे अमेरिका अभी बहुत कुछ करने वाला है। इस बात का संकेत कभी न्यूयॉर्क के महापौर ममदानी और भारतीय-अमेरिकी आश...

दुनियादारी: अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की कथनी व करनी में अंतर के वैश्विक मायने

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अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की कथनी व करनी से बचकर रहें विकासशील देश @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कथनी और करनी में वैश्विक स्तर पर कतिपय महत्वपूर्ण अंतर दिखता है, जो खुद अमेरिका फर्स्ट नीति को ही प्रभावित करता है। उनकी आक्रामक बयानबाजी अक्सर प्रत्यक्ष सैन्य या आर्थिक कार्रवाइयों से मेल खाती है, लेकिन यह वैश्विक स्थिरता को भी चुनौती देती है। इससे सहयोगी देशों में अनिश्चितता बढ़ती है और प्रतिद्वंद्वी शक्तियां मजबूत होती हैं। इसलिए उनकी कथनी और करनी के अंतर को समझकर ही अपने अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा विभिन्न देश कर सकते हैं, अन्यथा अमेरिकी लाभ के शिकार बनते देर नहीं लगेगी। अचरज की बात तो यह है कि दुनिया को शांति का संदेश देने वाले ट्रंफ ही अब 'युद्ध' की अटकलों के सबसे बड़े पर्याय बनते प्रतीत होने लगे हैं। ट्रंफ की कथनी और करनी के कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं- पहला, ट्रंप ने वेनेजुएला पर बड़े पैमाने पर हमले का दावा किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने की बात कही, जो सोशल मीडिया पर साझा की गई। दूसरा,...

यक्ष प्रश्न: आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश?

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आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश? यक्ष प्रश्न! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक समकालीन रमणीक जनतांत्रिक दुनिया अमेरिकी वर्चस्व और उसकी समर्थित हिंसक हस्तक्षेपवादी राजनीति से तभी ज्यादा महफूज़ हो सकती है, जब शक्ति-संतुलन बहुध्रुवीय होगा, अंतरराष्ट्रीय क़ानून को वास्तविक दाँत मिलेंगे, और वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ के देश परस्पर मिलकर वैकल्पिक संस्थागत ढांचे खड़े करेंगे। ऐसा इसलिए कि केवल नैतिक अपील या यूएनओ की प्रतीकात्मक निंदा से, जैसा कि यूक्रेन, गाजा और वेनेज़ुएला पर हालिया हमले में उसका गैरजिम्मेदाराना रोल दिखा, स्थितियाँ नहीं बदलेंगी। इसलिए यक्ष प्रश्न है कि आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश? इसलिए खतरे की असल प्रकृति को समझना पड़ेगा, फिर रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, उत्तर कोरिया, कम्बोडिया, क्यूबा, मेक्सिको आदि देशों को परस्पर मिलकर अमेरिकी आपराधिक प्रवृति को हतोत्साहित करना होगा। इस निमित्त चीन को भी अपनी विस्तारवादी नीति और ईरा...