यक्ष प्रश्न: आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश?

आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश? यक्ष प्रश्न!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

समकालीन रमणीक जनतांत्रिक दुनिया अमेरिकी वर्चस्व और उसकी समर्थित हिंसक हस्तक्षेपवादी राजनीति से तभी ज्यादा महफूज़ हो सकती है, जब शक्ति-संतुलन बहुध्रुवीय होगा, अंतरराष्ट्रीय क़ानून को वास्तविक दाँत मिलेंगे, और वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ के देश परस्पर मिलकर वैकल्पिक संस्थागत ढांचे खड़े करेंगे। ऐसा इसलिए कि केवल नैतिक अपील या यूएनओ की प्रतीकात्मक निंदा से, जैसा कि यूक्रेन, गाजा और वेनेज़ुएला पर हालिया हमले में उसका गैरजिम्मेदाराना रोल दिखा, स्थितियाँ नहीं बदलेंगी।
इसलिए यक्ष प्रश्न है कि आखिरकार अमेरिका की हस्तक्षेपवादी राजनीति से कैसे सुरक्षित रहेंगे उसके प्रतिद्वंद्वी देश?

इसलिए खतरे की असल प्रकृति को समझना पड़ेगा, फिर रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, उत्तर कोरिया, कम्बोडिया, क्यूबा, मेक्सिको आदि देशों को परस्पर मिलकर अमेरिकी आपराधिक प्रवृति को हतोत्साहित करना होगा। इस निमित्त चीन को भी अपनी विस्तारवादी नीति और ईरान को इस्लामिक पूर्वाग्रही नीति से तौबा करना पड़ेगा। अन्यथा तटस्थ देश भारत का सहयोग ग्लोबल साउथ को नहीं मिल पायेगा और वह मजबूरी में अमेरिका-इजरायल-जापान खेमे से सहयोग लेते रहने को अभिशप्त हो जाएगा। 

हालांकि, रूसी-चीनी मित्रता से और भारत-चीन की शत्रुता से भारत हमेशा सावधान रहता है और अमेरिका-यूरोप के प्रति भी सहानुभूति रखता है। लेकिन पश्चिमी देशों की दोगली नीति के चलते भारत की भलाई गुटनिरपेक्ष नीतियों में ही है। यह स्थिति भारत-रूसी मित्रता की प्रगाढ़ता के लिए भी अच्छी नहीं होगी। क्योंकि अमेरिका, रूस और चीन को आर्थिक व सैन्य दृष्टि से तेजी से मजबूत बनते भारत को रोकने का स्वांग रच कर उसको आंख दिखाने वाले विकासशील देशों पर अनैतिक कार्रवाई करके उन्हें अपने काबू में ले रहा है।

दुनिया ने देखा कि अमेरिका ने वेनेज़ुएला पर “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व” के तहत राष्ट्रपति मादुरो को गिरफ़्तार कर बाहर ले जाकर “देश चलाने” तक की बात कही, जो संप्रभुता पर सीधा हमला और पुराने मॉनरो सिद्धांत की वापसी है। ऐसा करके उसने इराक की तरह ही तेल और दुर्लभ खनिज संपदा का खेल शुरू कर दिया है। साथ ही कम्बोडिया, मेक्सिको, क्यूबा, ग्रीनलैंड, ईरान आदि को लेकर डॉनल्ड ट्रंफ ने जो धमकी दी है, वह हैरतअंगेज पर काबिलेगौर है। 

वहीं, बेनेज़ुएला के कार्यकारी राष्ट्रपति से उन्होंने अपेक्षा जताई है कि वह रूस, चीन, ईरान और क्यूबा से अपने सम्बन्धों को न्यूनतम करें ताकि अमेरिका को रणनीतिक खतरों से बचाया जा सके। अभी तक का जो अमेरिकी इतिहास है, उसके दृष्टिगत लक्षित देश इराक, लीबिया, सीरिया, फिलिस्तीन, वियतनाम आदि की तरह बर्बाद हुए हैं। सच कहा जाए तो बेनेज़ुएला के तरह के एकतरफ़ा सैन्य ऑपरेशन को अंतरराष्ट्रीय क़ानून और यूएन चार्टर के उल्लंघन के रूप में कई विशेषज्ञों व देशों ने देखा, लेकिन स्थायी सदस्यों की राजनीति के कारण कोई ठोस दंडात्मक क़दम नहीं उठ पाया। 

स्पष्ट है कि रूस को यूक्रेन सहित पश्चिमी यूरोप से, भारत को पाकिस्तान-बंगलादेश समेत अन्य पड़ोसी देशों से और चीन को ताइवान सहित दक्षिण चीन सागर में उलझाने के बाद अब उसने नए सिरे से अमेरिकी विस्तारवाद का बिगुल फूंक दिया है। जिसका मकसद साफ है कि अमेरिका अब उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में रूस, चीन, भारत, ब्राजील की दाल नहीं गलने देगा, ताकि समय रहते ही ब्रिक्स की हवा निकल जाए। यह मुनरो सिद्धांत की वापसी है ताकि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका अपराजेय बन जाए।

कूटनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, अब तक अमेरिका की रणनीति रही कि यूरोप में रूस, चीन, भारत की दाल नहीं गले। लेकिन जब उसने महसूस कर लिया कि जी-सेवन के अन्य यूरोपीय व एशियाई देश चीन, भारत, रूस व अरब देशों से सम्बन्ध प्रगाढ़ बना रहे हैं और अमेरिका से मदद लेकर यह सबकुछ कर रहे हैं तो डॉनल्ड ट्रंफ ने इनकी आर्थिक नकेल कसनी शुरू कर दी। साथ ही खुद को पश्चिमी गोलार्द्ध यानी उत्तरी अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका में मजबूत करने का संकल्प लिया और बेनेज़ुएला से अमल प्रारंभ कर दिया और भावी इरादे भी स्पष्ट कर दिए।

इससे भविष्य में अमेरिका का प्रतियोगी बनने की चाहत रखने वाले सभी देशों में हड़कंप मचा हुआ है। कल तक जो डॉलर को रिप्लेस करने का स्वप्न पाले हुए थे, वो अब अपने समर्थकों को भी अमेरिका के खूनी पंजों से बचा नहीं पा रहे हैं। वहीं, हैरत की बात है कि अब तक इस्लामिक देशों के आतंकवादियों के मार्फ़त अपनी दादागिरी चलाने वाला अमेरिका अब खुद ही सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर उतर आया है जो ब्रिक्स देशों को खुली चुनौती है कि जोर है तो रोक लो। 

शायद इसलिए अमेरिका रूस, चीन, भारत से एक एक करके अपने रिश्ते तो मजबूत रखना चाहता है, लेकिन इन्हें परस्पर भिड़ाये रखना भी चाहता है ताकि ये तीनों देश कभी एक न हो पाएं और अमेरिका की दादागिरी उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी एशिया, पूर्वी एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया तक चलती रहे।

यही वजह है कि वैश्विक ढांचे में सुधार की जरूरत है। इसमें भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान और जर्मनी जैसे देशों को शामिल करने की आवश्यकता है। क्योंकि
दुनिया ने देखा कि यूएन सुरक्षा परिषद में पी-5 वीटो की असीमित शक्ति ने यूक्रेन, गाज़ा और वेनेज़ुएला जैसे मामलों में पक्षपात और पंगुता साबित की है, इसलिए प्रस्ताव है कि नरसंहार, युद्ध अपराध जैसे मुद्दों पर वीटो पर थीमैटिक प्रतिबंध लगे और उसकी सार्वजनिक जवाबदेही तय हो।

 “यूनाइटिंग फॉर पीस” और 2022 की Veto Initiative जैसे उपायों के ज़रिये जनरल असेंबली को ज़्यादा सक्रिय भूमिका देने की दिशा उभर रही है, जिससे एकतरफ़ा दखल पर सामूहिक राजनीतिक लागत बढ़े। इसलिए बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन जरूरी है। BRICS और BRICS+ का विस्तार 2025 के बाद से पश्चिमी प्रभुत्व के मुकाबले एक वैकल्पिक आर्थिक-राजनीतिक धुरी बना रहा है, जहाँ “फेयर एंड रिप्रेज़ेंटेटिव ग्लोबल ऑर्डर” का लक्ष्य रखा गया है।

साथ ही क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम, मल्टीकरेंसी स्वैप और पश्चिमी वित्तीय संस्थानों से आंशिक स्वावलंबन जैसी पहलें डॉलर-केंद्रित दबाव और प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कम कर सकती हैं, जिससे छोटे देशों पर सैन्य-आर्थिक ब्लैकमेल की गुंजाइश घटती है। इसके अलावा क्षेत्रीय गठबंधन और वैश्विक दक्षिण की गोलबंदी मजबूत करनी होगी और इसमें शामिल देशों को खुद आत्मावलोकन करना होगा कि कहीं वो भी अमेरिका की तरह ही साम्राज्यवादी या विस्तारवादी तो नहीं हैं। 

ऐसा इसलिए किलैटिन अमेरिका में वेनेज़ुएला हमले के बाद वामपंथी सरकारों ने इसे ख़तरनाक मिसाल और “अस्वीकार्य रेखा पार करना” कहा, जबकि कुछ दक्षिणपंथी शासन ने समर्थन किया, जो दिखाता है कि क्षेत्रीय एकजुटता अभी अधूरी है। अगर अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के देश कूटनीतिक फ़ोरमों (BRICS, G77, CELAC, AU आदि) के माध्यम से साझा न्यूनतम एजेंडा बनाकर किसी भी बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ संयुक्त स्थिति लें, तो वैधता की लड़ाई में संतुलन बदल सकता है।

इस प्रक्रिया में भारत जैसी गुटनिरपेक्ष शक्तियों की भूमिका बढ़ जाती है। क्योंकि भारत जैसे मध्यम से बड़ी शक्तियाँ, जो एक तरफ़ क्वाड/US साझेदारी और दूसरी तरफ़ BRICS जैसी संरचनाओं में हैं, अगर लगातार अंतरराष्ट्रीय क़ानून, संप्रभुता और रेजीम-चेंज विरोधी सिद्धांत पर स्पष्ट लाइन लें, तो अमेरिकी “ट्रंप कोरोलरी” जैसी नीतियों पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ेगा। वहीं, ऊर्जा सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और रक्षा के मोर्चे पर विकल्प (रूस, पश्चिम एशिया, घरेलू क्षमता, BRICS नेटवर्क) मजबूत करने से भारत और अन्य वैश्विक दक्षिण देश अमेरिकी प्रतिबंधों और दबाव से कम असुरक्षित होंगे, जो अंततः पूरी दुनिया की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करता है।

अगर चाहें तो अगले चरण में विशिष्ट रोडमैप बना सकते हैं कि भारत, BRICS और वैश्विक दक्षिण मिलकर कौन से ठोस संस्थागत सुधार और सुरक्षा-व्यवस्थाएँ खड़ी कर सकते हैं (जैसे वैकल्पिक सुरक्षा ढाँचा, अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल सुधार, मीडिया नैरेटिव युद्ध इत्यादि)। कहना न होगा कि अमेरिका ने अपने इतिहास में दर्जनों बार दूसरे देशों में प्रत्यक्ष और परोक्ष हस्तक्षेप किए हैं, जिनमें तख़्तापलट, सैन्य आक्रमण, आर्थिक दबाव और गुप्त ऑपरेशन शामिल रहे हैं।

यहां मैं अलग-अलग दौर के कुछ प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण बता रहा हूँ जिनपर गौर करना लाजिमी दिए हैं:-

पहला, शुरुआती और शीतयुद्ध काल: 1953, ईरान: CIA–UK की साझी “ऑपरेशन AJAX” के तहत प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसाद्देक की सरकार गिराकर शाह को सशक्त किया गया, जिससे दशकों की तानाशाही और बाद में इस्लामी क्रांति की पृष्ठभूमि बनी।1954, ग्वातेमाला: “ऑपरेशन PBSUCCESS” के ज़रिये चुने हुए राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्स को हटाकर अमेरिकी हितों के अनुकूल सैन्य शासन स्थापित किया गया, जिसके बाद लंबा गृहयुद्ध और बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ।1961–63, क्यूबा: बे ऑफ पिग्स आक्रमण, ऑपरेशन मोंगूस और फिदेल कास्त्रो को हटाने की कई नाकाम कोशिशें की गईं; 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान समुद्री नाकाबंदी भी अमेरिकी दबाव की मिसाल है। 

दूसरा, तख़्तापलट और दमनकारी शासन का समर्थन: 1965–67, इंडोनेशिया: सुकार्णो के ख़िलाफ़ सत्ता परिवर्तन के दौरान अमेरिकी खुफ़िया सहयोग और कम्युनिस्ट-विरोधी सफ़ाये को समर्थन का आरोप है, जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों की मौत मानी जाती है। 1973, चिली: CIA-supported तख़्तापलट में चुने हुए राष्ट्रपति सल्वाडोर आयेंदे को हटाकर जनरल पिनोचे की तानाशाही लाई गई, जिसमें हज़ारों हिरासत, हत्या और यातना के मामले दर्ज हुए।1960–70 के दशक, कांगो, ब्राज़ील, अर्जेंटीना, डोमिनिकन रिपब्लिक सहित कई देशों में अमेरिकी समर्थन से सैन्य शासन या रेजीम-चेंज हुए, जिनका दस्तावेजीकरण अब व्यापक रूप से उपलब्ध है।

तीसरा, प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप: वियतनाम, लाओस, कंबोडिया (1960–70 के दशक): “डोमिनो थ्योरी” के नाम पर बड़े पैमाने पर युद्ध, बमबारी और रासायनिक हथियार (एजेंट ऑरेंज) का इस्तेमाल हुआ, जिसके सामाजिक–पर्यावरणीय दुष्परिणाम आज भी महसूस किए जाते हैं।1983, ग्रेनेडा और 1989, पनामा: क्रमशः “कम्युनिस्ट” प्रभाव और नॉरिएगा शासन के बहाने छोटे कैरिबियाई देशों पर हमले कर सत्ता परिवर्तन किया गया। 1991, खाड़ी युद्ध (इराक): कुवैत पर आक्रमण के बाद अमेरिका-नेतृत्व वाले गठबंधन ने इराक पर व्यापक बमबारी की; इसके बाद के “नो-फ्लाई ज़ोन” और प्रतिबंधों से इराक पर स्थायी सैन्य–आर्थिक दबाव बना रहा।

चतुर्थ, “वार ऑन टेरर” और बाद के युद्ध: 2001, अफ़ग़ानिस्तान: 9/11 के बाद अल-कायदा और तालिबान के ख़िलाफ़ आक्रमण कर नया शासन स्थापित किया गया; 20 साल की युद्ध उपस्थिति में भारी नागरिक हताहत और पलायन हुआ। 2003, इराक: “Weapons of Mass Destruction” के बहाने बड़े पैमाने पर आक्रमण कर सद्दाम हुसैन शासन गिराया गया, जबकि बाद में ऐसे हथियार नहीं मिले; इससे गृहयुद्ध, सांप्रदायिक हिंसा और ISIS जैसी शक्तियों का उभार हुआ। 2011, लीबिया: नाटो के नाम पर अमेरिका सहित गठबंधन ने सैन्य हस्तक्षेप कर गद्दाफी की सरकार गिराई, जिसके बाद देश लंबे समय तक अस्थिरता, मिलिशिया-राज और मानव तस्करी के हब में बदल गया।

पंचम, ताज़ा और छुपे रूप के हस्तक्षेप: सीरिया: 2014 के बाद से अमेरिका ने ISIS के ख़िलाफ़ हवाई और ड्रोन हमले तथा सीमित ज़मीनी ऑपरेशन किए, जबकि अलग-अलग विद्रोही गुटों को समर्थन के आरोप भी लगे। यूक्रेन, 2014 और आगे: विश्लेषक अमेरिका और पश्चिमी गठजोड़ की राजनीतिक–सैन्य भूमिका को भी एक तरह के हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं, भले ही यह क्लासिक “इंवेज़न” न हो।

कतिपय शोधों के अनुसार 1776–2023 के बीच अमेरिका लगभग 400 से अधिक विदेशी सैन्य हस्तक्षेपों में किसी न किसी रूप में शामिल रहा, जिनमें से आधे से ज़्यादा 1950 के बाद और लगभग एक चौथाई शीतयुद्ध के बाद के दौर में हुए हैं।

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