संविधान की प्रस्तावना में शामिल 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द पर जारी सियासत के मायने
संविधान की प्रस्तावना में शामिल 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द पर जारी सियासत के मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने संविधान की प्रस्तावना में बाद में शामिल किए गए दो शब्दों 'संविधान की प्रस्तावना में शामिल 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द पर जारी सियासत के मायने' और 'धर्मनिरपेक्ष' को 'संविधान हत्या दिवस' के दिन ही हटवाने की जो वकालत की है, उसके राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक मायने तो स्पष्ट हैं, लेकिन उनकी इस साफगोई ने एक बार से इन दोनों विवादास्पद शब्दों से जुड़े सियासी अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है। ऐसा इसलिए कि उनके दिए गए बयान को लेकर जहां कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं के अलावा एनडीए की सहयोगी लोजपा ने भी होसबोले की टिप्पणी की आलोचना की, वहीं भाजपा ने होसबोले का बचाव किया है। एक सवाल कि, क्या आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में शामिल किए गए 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द वहां बने रह...