ओबीसी कथावाचकों के सामाजिक अपमान के मुद्दे पर छिड़ी सियासत से उभरते सवाल

ओबीसी कथावाचकों के सामाजिक अपमान के मुद्दे पर छिड़ी सियासत से उभरते सवाल


@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

उत्तर प्रदेश के इटावा में कथित 'यादव' कथावाचकों के साथ मारपीट के मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है और कोढ़ में खाज यह कि अब इस पर सियासत भी तेज हो गई है, जो हमारी प्रशासनिक कमजोरी और सियासी विफलता दोनों का ही तकाजा है। इस मामले में यूपी के पूर्वमुख्यमंत्री और सपा नेता अखिलेश यादव के कूद पड़ने और इसे पीडीए विरोधी रंग देने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने भी मोर्चा संभाल लिया है और इस घटना की निंदा करते हुए स्पष्ट कहा है कि ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। यही वजह है कि ओबीसी कथावाचकों के सामाजिक अपमान के मुद्दे पर छिड़ी सियासत से कतिपय तल्ख सवाल भी उभरकर सामने आ रहे हैं, जिनका समुचित जवाब भी ढूंढा जाना चाहिए।

ऐसा इसलिए कि गत गुरुवार को इसे लेकर बड़ी संख्या में 'अहीर रेजिमेंट' के लोगों ने दादरपुर गांव में घुसने और ब्राह्मण परिवकी कोशिश की और इस दौरान पथराव होने पर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। यही वजह है कि 
कथावाचकों के साथ हुए मारपीट के बाद हुए इस पलटवार पर भी कतिपय सवाल उठ रहे हैं। आपको बता दें कि इटावा के दांदरपुर गांव में गत 21 जून को कथित कथावाचक मुकुट मणि यादव और उनके शिष्य संत कुमार यादव के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार की एक घटना सामने आई थी। दरअसल, इस दौरान लोगों ने संत यादव का सिर भी मुड़वा दिया था, क्योंकि उन पर आरोप था कि उन्होंने जाति छिपाकर कथा की और एक महिला से छेड़छाड़ भी की, जिसके बाद उन्हें पारिवारिक सजा स्वरूप दी गई यह कार्रवाई है। जिसका वीडियो वायरल होने के बाद इस मामले ने जब तूल पकड़ा तो पुलिस ने 23 जून को चार ब्राह्मण युवकों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद कथा आयोजकों ने कथावाचकों के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करवाई। 

वहीं, दिग्गज यादव नेता व सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तरप्रदेश ने इस मामले में प्रदेश सरकार पर निशाना साधा और पीड़ित कथावाचकों से मुलाकात कर उन्हें सम्मानित किया। वहीं, कथावाचक कांड के बाद यादव बहुल इटावा के दांदरपुर में बवाल काटा गया, जहां 'अहीर रेजिमेंट' के लोगों की पुलिस से झड़प हुई। इस दौरान पत्थरबाजी व फायरिंग की भी खबरें हैं। यही वजह है कि प्रख्यात ओबीसी नेता सुभासपा प्रमुख ओपी राजभर ने आरोप लगाया कि कुछ लोग दो-दो आधार कार्ड बनवाकर दूसरों का अधिकार छीन रहे हैं। उन्होंने कहा कि, "यादवों को अपना काम करना चाहिए और दूसरों के हिस्से में दखल नहीं देना चाहिए। यह सामाजिक संतुलन के लिए जरूरी है।" उन्होंने कहा कि समाज में हर वर्ग का एक तय काम होता है और उसी के अनुसार सबको चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि, " विभिन्न वर्गों में जातियों को बांटा गया है। ब्राह्मणों का काम शादी-विवाह और पूजा-पाठ जैसे कार्य करना है। ऐसे में अगर यादव यह काम करते हैं तो यह दूसरे के हक पर कब्जा करना हुआ।" 

वहीं, इस मुद्दे पर टीवी चैनल्स पर जो बहस हो रही हैं और उसमें जो विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं उससे स्पष्ट है कि वैदिक भारत और संवैधानिक भारत की मनमाफिक व्याख्या की जा रही है, जो अस्वीकार्य है। चाहे शंकराचार्य हों या राजनेता व उनके प्रवक्ता, उन्हें सोचना होगा कि मानवता से परे कोई नहीं है और मानवतावादी व्यवस्था की वकालत में यदि वे विफल रहे, तो इतिहास का कूड़ादान उनके स्वागत में बैठा है। इसलिए राष्ट्रवादी बातों-जज्बातों से परे और मानवतावादी दृष्टिकोण से इतर कोई भी तर्क स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और प्रशासन को ऐसे मामलों में निष्पक्ष और दृष्टांत के लायक कार्रवाई करनी चाहिए। क्योंकि राजनैतिक पक्षपात अब जनतांत्रिक कैंसर का रूप अख्तियार कर चुका है।

सुलगता सवाल है कि जब भारत विभिन्न प्रकार की अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से गुजर रहा हो, खासकर ये चुनौतियां भी सांप्रदायिक सोच से ग्रस्त हों, तभी भारत में जातीय विवादों को कुरेदे जाने से किसका हित सधेगा, समझना मुश्किल नहीं है। वैश्विक खुफिया एजेंसियां भारत को धर्म के आधार पर तोड़ चुकीं हैं और जाति के आधार पर इसे कई खण्ड में बांटना चाहती हैं, ताकि एक मज़बूत और सशक्त भारत का निर्माण हो नहीं पाए। ऐसी परिस्थिति में भारत के राजनेताओं, उनके राजनीतिक दलों और विभिन्न धर्म गुरुओं का दायित्व बढ़ जाता है। वहीं, यदि ये पूर्वाग्रह प्रेरित नजर आते हैं तो इन्हें पैदल का रास्ता दिखा देना, इनकी राजनीतिक मान्यता समाप्त कर देना शीर्ष प्रशासन की जिम्मेदारी है, अन्यथा राष्ट्रहित कैसे सधेगा, यक्ष प्रश्न है।

याद कीजिए कि जब 1930 के दशक में औपनिवेशिक काल में भारत में चुनावी राजनीति की शुरुआत हुई तो उस समय फूट डालो और राज करो कि फितरत से ब्रिटिश भारत में जातीय व सांप्रदायिक आरक्षण की परिकल्पना की गई, 1933 में जातीय जनगणना करवाई गई, जिसका साइड इफेक्ट्स आजतक भारतीय व उनका समाज झेल रहे हैं। आलम यह है कि प्रशासनिक हुक्मरान व उनके सिपहसालार जातीय फितरत से फैसले लेते आए हैं, कुछेक अपवादों को छोड़कर। कारण यह कि विभिन्न शिक्षण संस्थानों में उन्हें प्रारम्भ से ही इसी विकृत मानसिकता का सामना करना पड़ा जो बाद में उनकी आदतों में शुमार हो गई।

कहना न होगा कि विभिन्न शिक्षण संस्थानों और पेशेवर संगठनों में जातीय व सांप्रदायिक सोच का प्रवेश किसी नैतिक कैंसर की तरह देश को खोखला व बर्बाद कर रहा है। यह सोचने वाली बात है कि जब आरक्षण सर्वस्वीकार्य हो चुका है, उसे मजबूती देने के लिए जातिगत जनगणना करवाने पर आम सहमति बन चुकी है, तब सामाजिक विषबमन के लिए विभिन्न प्रशासनिक विफलताओं से जुड़े मुद्दों को जातीय रंग देकर कुरेदना और इसे सियासी रूप देना न तो राष्ट्र्वादी राजनीतिक धर्म है और नहीं ही सामाजिक धर्म। 

देखा जाए तो यह हमारी संवैधानिक संस्थाओं की विफलता है। सवाल है कि रोटी, कपड़ा और मकान; शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान; बिजली सड़क और पानी, बेरोजगारी, भुखमरी और कुपोषण, सबको रोजगार, राष्ट्रीय संसाधनों के एक समान बंटवारे आदि जैसी लोकहित की बातों की जगह पहले कांग्रेसी आजादी, मिश्रित अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीयकरण, फिर समाजवादी भ्रष्टाचार,  जातीय आरक्षण, सांप्रदायिक विवाद, ततपश्चात कांग्रेसी निजीकरण व भाजपाई स्वदेशी, सर्वदलीय आरक्षण के भीतर आरक्षण प्रपंच जैसे भावनात्मक मुद्दों पर सियासत की इजाजत क्यों दी जा रही है?

इसी क्रम में सर्वदलीय फ्रीबीज यानी मुफ्तखोरी, एनजीओ आधारित कथित समाजसेवा और निजीकरण आधारित कथित कमजोर व पक्षपाती विकास की सियासत भी चलती रही। इस मामले में सही समय पर सशक्त हस्तक्षेप नहीं करके हमारे नौकरशाहों, न्यायविदों, शिक्षाविदों, पत्रकारों व विभिन्न पेशेवर प्रमुखों ने राष्ट्र विरोधी व जनविरोधी कार्य किए हैं। क्योंकि भारतीय संविधान यह कभी नहीं कहता कि राजनीतिक नंगई पर कोई रोक नहीं लगेगी, लेकिन जिस तरह से पहले कांग्रेस और अब भाजपा को राजनीतिक कठघरे में खड़े करने वाले दल चरित्रहीन राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं, उससे भारत की बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। 

बेशक कुछ लोग अपवाद भी होंगे, लेकिन वो भी अल्पसंख्यक हैं। इसलिए भारतीय प्रशासन को चाहिए कि वह भावनात्मक मुद्दों पर पक्षपाती राजनीति करने वाले तमाम दलों की मान्यता खत्म करे। अन्यथा ये दल विदेशी एजेंट्स बनकर भारत व भारतीयता की कब्र खोद रहे लगातार हैं और भारत व भारतीयता को इसमें कब दफन कर देंगे, पता नहीं चलेगा। क्योंकि चीनी सहयोग से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की यही रणनीति है, जिसे कभी सीआईए का सहयोग भी प्राप्त रहा है। 

यह कितनी गंभीर बात है कि सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण और उसने सहयोग से प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई पर सीआईए के एजेन्ट होने के आरोप लगते आए हैं। यह स्थिति हमारी प्रशासनिक व न्यायिक विफलताओं को उजागर करते हैं, जो कतई ठीक नहीं है। राजनेता तो 5 साल बाद बदलते रहते हैं, लेकिन कार्यपालिका व न्यायपालिका को राष्ट्रवादी, जनवादी और मानवतावादी हितों को वरीयता देनी चाहिए।

यह सवाल मैं इसलिए उठा रहा हूँ कि एक पूर्वाग्रही वरिष्ठ पत्रकार और कथित दलित-ओबीसी चिंतक ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है कि "एक बात समझ में नहीं आ रही है, हिंदीभाषी क्षेत्र में ओबीसी की विभिन्न बिरादरियों के बीच से उभरते ये 'नये-नये कथावाचक' मिथकीय-काल्पनिक कथाओं को बांचने में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं?" वहीं उन्होंने इशारे किये हैं कि यदि "ये पढे-लिखे कथावाचक थोड़ी तैयारी करके ज्योतिबा फुले कथा, सावित्री बाई फुले कथा, शिवाजी कथा, अम्बेडकर कथा, शाहू जी महराज कथा, मंडल कथा, ललई कथा, रामस्वरूप वर्मा कथा, कर्पूरी कथा, जगदेव कथा या मुलायम कथा ही क्यों नहीं सुनाते?" 

यदि उनकी अधूरी बात को आगे बढ़ाया जाए तो लालू कथा, रामविलास कथा, नीतीश कथा, कांशीराम कथा, मायावती कथा, कल्याण कथा को भी यूपी बिहार में अल्लहा-रुदल की कथाओं की तरह सुनाया जा सकता है। यही नहीं, देश के अन्य राज्यों में भी ऐसे कथित लोकनायकों की कमी नहीं है। हां, एक बात की जो कमी है, वह यह कि भगवान राम (रामचरितमानस पाठ) और भगवान कृष्ण (श्रीमद्भागवत पाठ) वाला लोककल्याणकारी चरित्र इनमें नहीं है। भारत में शिव कथा, देवी भागवत कथा, गीता पाठ, सुंदर कांड पाठ आदि भी होते रहते हैं। लेकिन इन्हें सनातनी या हिंदूवादी नजरिए से देखने के बजाय इसमें जो सवर्ण, ओबीसी, दलित, अल्पसंख्यक जैसे सियासी एंगल घुसेड़े जा रहे हैं, इसके खिलाफ नौकरशाही व न्यायपालिका दोनों को आना होगा, अन्यथा पहले सामाजिक संघर्ष बढ़ेगा, फिर राष्ट्रीय क्षति होगी।

हालांकि, यदि ऐसे क्षुद्र बुद्धिजीवियों की या इन जैसों पीड़ाओं को आगे बढ़ाया जाए तो भगवान श्री राम की कथा मात्र क्षत्रिय गुण गाथा भर है और भगवान श्री कृष्ण की कथा यदुवंशी गुणगाथा भर है। लेकिन अब इन्हें कौन समझाए कि हमारे भारत में कभी भी वैसी विकृत जातीय सोच नहीं रही है, जैसी कि आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था ने पैदा कर दी है। इसके अन्तरजातीय विवाह, अंतर धार्मिक विवाह के ढेरों उदाहरण भारतीय समाज में भरे पड़े हैं।यह कौन नहीं जानता कि कौरव-पांडव क्षत्रिय थे और भगवान श्री कृष्ण की बुआ इसी परिवार में थीं, इसलिए वो भी क्षत्रिय होंगे। और यदि गौपालक के रूप में यदुवंशी भी थे, तो इनके लिए सामाजिक श्रेष्ठता की ही बात है। लेकिन आरक्षण ने इन्हें ओबीसी बना दिया।

हालांकि, इसी सामाजिक श्रेष्ठता के आधार पर बनी यूपी की अजगर जाति समीकरण, जिसमें अहिर, जादव (यादव), गुर्जर और राजपूत जाति शामिल रहे और समाजवादी सियासत करने वाली जनता पार्टी, लोकदल, जनतादल और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में गोलबंद होकर तत्कालीन ब्राह्मण बहुल सियासत करने वाली कांग्रेस की ऐसी कब्र यूपी-बिहार में खोदी की, वह आजतक इससे नहीं उबर पाई है। ऐसे कई राजनीतिक समीकरण देखे जा सकते हैं जहां एक दूसरे के खिलाफ विषबमन करने वाले सवर्ण, पिछड़े, दलित व अल्पसंख्यक नेता एक मंच पर आए और अपने ही समाज के प्रतिद्वंद्वियों को सियासी धूल चटा दिया। इससे साफ है कि जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र की सियासत भारत के मतदाताओं को बांटकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने की एक गहरी साजिश है, जो अस्वीकार्य है।

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