पड़ोसियों की तिकड़मों से सबक सीखे भारत, हिंदुत्व की पकड़े राह?
पड़ोसियों की तिकड़मों से सबक सीखे भारत, हिंदुत्व की पकड़े राह? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न सुलगते हुए प्रादेशिक-राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय और मानवीय विषयों पर भारतीय राजनेताओं, नौकरशाहों, न्यायविदों, संपादकों, समाजसेवियों और अपने-अपने पेशे में दक्ष लोगों के जो नीतिगत अंतर्विरोध हैं, वह राष्ट्रहित में तो कतई नहीं है। वहीं कुछ लोगों का स्पष्ट मानना है कि इन अंतर्विरोधों का असली स्रोत हमारे संविधान में अंतर्निहित है, जो 'विदेशी फूट डालो, राज करो' की नीतियों का 'देशी स्वरूप' मात्र है। अजीब विडंबना है कि समकालीन माहौल में चिन्हित संवैधानिक त्रुटियों को बदलने के लिए जिस राजनीतिक कद के व्यक्ति को आगे आना चाहिए, वह अभी तक आगे नहीं आ पाया है। वैसे तो इतिहास ने पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी को सर्वाधिक मौका दिया, लेकिन संतुलित राष्ट्रवाद और अटल राष्ट्रीयता की कसौटी पर ये लोग खरे नहीं उतरे। यह कड़वा सच है कि इनके तमाम किंतु-परंतु से स्थितियां और अधिक उलझती गईं। इससे हमारे पड़ोसी देशों का दुस्साहस बढ़ता गया और आज का भारत अपने अस्तित्व ...