Is political, social, economic, cultural, administrative and judicial 'hooliganism' the Yaksha question of contemporary democracy?
क्या राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और न्यायिक 'गुंडागर्दी' समकालीन लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न है? https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक समय के साथ-साथ जैसे-तैसे मैं बड़ा हुआ तो घर-परिवार, गांव-समाज, देश-दुनिया के हर क्षण बदलते चेहरों से वाकिफ होता रहा। कहीं भुक्तभोगी, कहीं प्रत्यक्षदर्शी की तरह और प्रायः समाचार/मीडिया माध्यमों में, जो कुछ देखा-सुना-समझा, उसने हमारे छात्र जीवन और पेशेवर जीवन को झकझोर कर रख दिया। शायद इसी से हमारे लोक चिंतन की शुरुआत हुई, लेखन को तरह तरह की धार पर धार मिली और समकालीन विश्व का सबसे बड़ा सवाल मन में कौंधा कि आखिर में "राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और न्यायिक 'गुंडागर्दी' समकालीन लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न क्यों बना हुआ है?" आखिर हर बार हमारा-आपका संविधान खामोश क्यों हो जाता है? संसद, शीर्ष सचिवालय, सुप्रीम कोर्ट, और प्रसार भारती सबकुछ रफा-दफा करने के चक्कर में क्यों पड़ जाता है? आखिर...