Is political, social, economic, cultural, administrative and judicial 'hooliganism' the Yaksha question of contemporary democracy?
क्या राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और न्यायिक 'गुंडागर्दी' समकालीन लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न है?
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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
समय के साथ-साथ जैसे-तैसे मैं बड़ा हुआ तो घर-परिवार, गांव-समाज, देश-दुनिया के हर क्षण बदलते चेहरों से वाकिफ होता रहा। कहीं भुक्तभोगी, कहीं प्रत्यक्षदर्शी की तरह और प्रायः समाचार/मीडिया माध्यमों में, जो कुछ देखा-सुना-समझा, उसने हमारे छात्र जीवन और पेशेवर जीवन को झकझोर कर रख दिया।
शायद इसी से हमारे लोक चिंतन की शुरुआत हुई, लेखन को तरह तरह की धार पर धार मिली और समकालीन विश्व का सबसे बड़ा सवाल मन में कौंधा कि आखिर में "राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और न्यायिक 'गुंडागर्दी' समकालीन लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न क्यों बना हुआ है?"
आखिर हर बार हमारा-आपका संविधान खामोश क्यों हो जाता है? संसद, शीर्ष सचिवालय, सुप्रीम कोर्ट, और प्रसार भारती सबकुछ रफा-दफा करने के चक्कर में क्यों पड़ जाता है? आखिर इस सर्वहितकारी विषयों पर कभी राजनेताओं, नौकरशाहों, न्यायविदों, पत्रकारों, शिक्षाविदों, लोक चिंतकों आदि के बीच शाश्वत बहस क्यों नहीं छिड़ती? यदि कभी चर्चा होती भी तो महज लीपापोती क्यों होती?
आखिर हमारे समुत्तथान के सबसे बड़े केंद्र विश्वविद्यालयों, शीर्ष संस्थाओं/संस्थानों, पेशेवर समूहों, चुनाव आयोग आदि में/पर इस गम्भीर बहस पर चर्चा क्यों नहीं होती? जब कागज के पन्नों यानी संविधान को शाश्वत संदेश समझकर यह तर्कपूर्ण ढंग से कहा जाता है कि इसके मूल सिद्धांतों में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता, तो हमारे जेहन में यही प्रश्न उठता है कि क्या चोरी-डकैती, हत्या-बलात्कार, दंगा-फसाद, जबरनवसूली-सुविधा शुल्क आदि हमारी नियति बना दी गई है? भू-जमींदारी यानी सामंती सोच से निकालकर मौद्रिक/कम्पनीगत जमींदारी यानी पूंजीवाद के शोषक अंधकूप में धकेल दिया गया है?
देखा जाए तो यह सबकुछ समकालीन लोकतंत्र की एक गंभीर नैतिक चुनौती की ओर संकेत करता है। सरलतापूर्वक इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि जब लोकतंत्र का आधार कानून का शासन, समानता, स्वतंत्रता और जवाबदेही है, तो फिर जब राजनीति में धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ता है, समाज में भय और असहिष्णुता फैलती है, आर्थिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार और एकाधिकार हावी होते हैं, सांस्कृतिक क्षेत्र में एक दूसरे को नीचा दिखाने के सुनियोजित प्रयत्न परवान चढ़ाए जाते हैं, इसी बीच प्रशासन निष्पक्षता खो देता है तथा न्यायिक प्रक्रिया में विलंब, दबाव या प्रभाव की आशंका पैदा होती है, तब लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर होने लगती है।
यहां "यक्ष प्रश्न" का अर्थ है—ऐसा मूल और कठिन प्रश्न जिसका समाधान अत्यंत आवश्यक हो। इस संदर्भ में उपर्युक्त कथन, उससे जुड़ा हुआ सुलगता बताता है कि लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसी प्रवृत्तियों को रोकना है जो कानून के शासन के स्थान पर शक्ति, भय या अनुचित प्रभाव को बढ़ावा देती हैं। मसलन, इन समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है कि कानून का शासन सभी पर समान रूप से लागू हो। राजनीतिक और प्रशासनिक संस्थाएँ अधिक पारदर्शी एवं जवाबदेह हों।
वहीं न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुदृढ़ बनी रहे। सांस्कृतिक सहिष्णुता बरकरार रखा जाए और चरमपंथियों पर रोक भी लगे। भड़काऊ शिक्षा-उपदेश-नारे के विरुद्ध सख्त कार्रवाई हो। भ्रष्टाचार और अपराध के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई हो। नागरिक जागरूकता, नैतिक नेतृत्व और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए।
इस प्रकार, उपर्युक्त सवालिया कथन लोकतंत्र को कमजोर करने वाली विभिन्न प्रकार की अवैध या दुरुपयोगपूर्ण प्रवृत्तियों की ओर ध्यान आकर्षित करता है और यह रेखांकित करता है कि इनके प्रभावी नियंत्रण के बिना स्वस्थ और सशक्त लोकतंत्र की कल्पना अधूरी है।
# आखिर भारत व भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ती जा रही सांस्कृतिक गुंडागर्दी को रोकने की जिम्मेदारी भारत का नेतृत्व क्यों नहीं उठाएगा?
सबसे बड़ी बात एशियाई समाज पर, खासकर सनातन धर्म विरूद्ध "सांस्कृतिक 'गुंडागर्दी' समकालीन समाज का सबसे बड़ा ज्वलंत प्रश्न" है जो एक विचारोत्तेजक विषय है। इसका आशय उन परिस्थितियों से है जहाँ संस्कृति के नाम पर भय, दबाव, हिंसा, धमकी या असहिष्णुता के माध्यम से दूसरों पर अपने विचार, मान्यताएँ या जीवनशैली थोपने का प्रयास किया जाता है। यहां सांस्कृतिक 'गुंडागर्दी' से तात्पर्य ऐसी प्रवृत्तियों से है जिनमें:कला, साहित्य, फिल्म, संगीत या अभिव्यक्ति पर दबाव या धमकी दी जाए।
यही नहीं, किसी समुदाय की भाषा, वेशभूषा, खान-पान या परंपराओं को जबरन श्रेष्ठ या हीन बताया जाए। साथ ही मतभेद रखने वालों को सामाजिक बहिष्कार, डर या हिंसा का सामना करना पड़े। सांस्कृतिक विविधता के बजाय एकरूपता थोपने का प्रयास हो। लिहाजा सवाल उठेगा ही कि आखिर भारत व भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ती जा रही सांस्कृतिक गुंडागर्दी को रोकने की जिम्मेदारी भारत का नेतृत्व क्यों नहीं उठाएगा?
सवाल है कि आखिर यह ज्वलंत प्रश्न क्यों है? तो जवाब हो कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सांस्कृतिक स्वतंत्रता और विविधता का सम्मान आवश्यक है। फिर भी यदि संस्कृति के नाम पर असहिष्णुता या दबाव बढ़ता है, तो
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। सामाजिक सद्भाव कमजोर पड़ सकता है। रचनात्मकता और विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान बाधित हो सकता है। विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है।
जहां तक इसके समाधान की बात है तो भले ही संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के मूल्यों का पालन, सभी संस्कृतियों और परंपराओं के प्रति सम्मान, संवाद और सहिष्णुता को बढ़ावा देने, कानून का निष्पक्ष पालन तथा हिंसा या धमकी के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के अलावा
शिक्षा के माध्यम से संवैधानिक मूल्यों और सांस्कृतिक विविधता के प्रति जागरूकता की बात सुनिश्चित करने का जज़्बा प्रदर्शित किया गया है, लेकिन वोट बैंक की राजनीति, उस पर आधारित ट्रांसफर-पोस्टिंग, कमजोर या पक्षपाती प्रशासनिक व्यवहार के चलते सबकुछ गुड़गोबर प्रतीत हो रहा है।
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