राजनीतिक दलों को कार्यस्थल पर पॉश एक्ट, 2013 से प्राप्त वैधानिक छूट एक नैतिक विडंबना नहीं तो क्या?
राजनीतिक दलों को कार्यस्थल पर पॉश एक्ट, 2013 से प्राप्त वैधानिक छूट एक नैतिक विडंबना नहीं तो क्या? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक राजनीतिक दलों को महिलाओं की कार्यस्थल सुरक्षा संबंधी कानून प्रोटेक्शन ऑफ सेक्सुअल हरासमेंट एक्ट (पॉश एक्ट), 2013 से प्राप्त वैधानिक छूट किसी नैतिक विडंबना से कम नहीं है, चाहे इसका विधिक कारण कुछ भी हो! यह हमारी संसद और सर्वोच्च न्यायालय दोनों की नैतिक लापरवाही या खामोशी दोनों का नतीजा है? ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह तर्क कि राजनीतिक दल और उनके सदस्यों के बीच पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध नहीं होता है, किसी के गले नहीं उतरता है। यह अनुभव की व्यवहारिक कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता है। यह ठीक है कि उनके बीच पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी का सम्बन्ध नहीं होता, लेकिन दफ्तर और कार्यसंस्कृति दोनों होती है। यहां तक कि टूर के दौरान ठहरने वक्त नेताओं और महिला कार्यकर्ताओं का कमरा आसपास ही रखा जाता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि इससे राजनीतिक दलों व उनके नेताओं को कार्यकर्ताओं के शोषण का अंतहीन अधिकार मिल जाता है! खासकर, जब ...