संदेश

नवंबर 27, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मौलिक कारणों को समझे बिना निदान बेहद मुश्किल, समझिए हुजूर!

चित्र
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मौलिक कारणों को समझे बिना निदान बेहद मुश्किल, समझिए हुजूर! @ कमलेश पाण्डेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता वायु प्रदूषण अब केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के गले ही हड्डी बन चुकी है, क्योंकि उनके मातहत कार्यरत प्रशासन निरंतर अदूरदर्शिता भरा निर्णय लेने का आदी बन चुका है। लिहाजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की चिंताएं स्वाभाविक हैं, लेकिन इन्हें भी प्रदूषण की बुनियादी बातों को समझना पड़ेगा और सर्वमान्य हल देने पड़ेंगे अन्यथा बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगेगी।  इसलिए सबको पहले दिल्ली-एनसीआर के बढ़ते प्रदूषण के मौलिक कारणों को समझना होगा, फिर उसका माकूल वैज्ञानिक हल निकालने का माकूल प्रयास करना होगा, अन्यथा इसका निदान बेहद मुश्किल प्रतीत होता रहेगा। आखिर बीते कई दशकों से 'सांप निकल जाने के बाद लाठी पीटने' की जो प्रशासनिक कवायद जारी है, उससे किसी का भी भला होने वाला नहीं है। खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों का तो कतई नहीं। क्योंकि दिल्ली का न तो मौसम अपना है, न पानी। बस ...

भारतीय संविधान का रक्षा कवच है नौवीं अनुसूची, लेकिन कतिपय सीमाओं के बाद नहीं!

चित्र
भारतीय संविधान का रक्षा कवच है नौवीं अनुसूची, लेकिन कतिपय सीमाओं के बाद नहीं! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची को उसका रक्षा कवच करार देते हुए उसे राजनेताओं द्वारा अत्यंत जरूरी ठहराया गया है, क्योंकि यह उन विशेष कानूनों की एक सूची है जिन्हें न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। इस प्रकार से देखा जाए तो कतिपय व्यापक जनहितकारी निर्णयों के विरुद्ध सत्तागत बहुमत प्रेरित सियासी सोच को इसी नौवीं अनुसूची के माध्यम से राष्ट्र पर थोप दिया गया है और आगे भी ऐसा किया जा सकता है।  चूंकि संविधान की नौंवीं अनुसूची को वर्ष 1951 में प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा ही शामिल किया गया था, खासकर भूमि सुधार और अन्य प्रगतिशील कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए ताकि इन्हें बिना किसी विघ्न के लागू किया जा सके। इसलिए इस पर एक स्वस्थ बहस अपेक्षित है। भले ही इसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करना और किसानों तथा वंचित वर्गों को संरक्षण देना बताया जाता है, लेकिन कुछेक मामलों में इससे आम आदमी के प्राकृतिक अधिकारों का हनन भी हुआ ह...

हाइब्रिड वारफेयर क्या है? भारत इसमें कितना सक्षम है? विश्व के कौन-कौन से देश इस युद्ध तकनीकी में आगे हैं?

चित्र
हाइब्रिड वारफेयर क्या है? भारत इसमें कितना सक्षम है? विश्व के कौन-कौन से देश इस युद्ध तकनीकी में आगे हैं? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार हाइब्रिड वारफेयर वह युद्ध रणनीति है जिसमें पारंपरिक और गैर-पारंपरिक दोनों तरह की युद्धक तकनीकों का संयोजन होता है। यह पूर्ण युद्ध के बिना राजनीतिक, सैन्य या आर्थिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किया जाता है, जिसमें साइबर अटैक, मीडिया प्रोपेगेंडा, आर्थिक प्रतिबंध, और अन्य अप्रत्यक्ष तरीके शामिल होते हैं।  हाइब्रिड वारफेयर में देश प्रत्यक्ष लड़ाई किए बिना भी विरोधी को कमजोर कर सकता है और इससे संघर्ष की संभावना भी नियंत्रित रहती है। इसमें कम लागत और कम जटिलता वाले तरीकों से किसी राष्ट्र को अस्थिर करने की क्षमता होती है। भारत ने हाइब्रिड वारफेयर की चुनौतियों के प्रति अपनी रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने पर काम शुरू कर रखा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) जैसे संस्थान अत्याधुनिक हथियार प्रणाली विकसित कर रहे हैं। भारतीय सेना में ‘हाइब्रिड वारफेयर डिवीजन’ की आवश्यकता बताई जा रही है, जिसमें साइबर सुरक्षा, ड्रोन, एआई तकनीक ...