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जून 7, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शक्ति के विकेंद्रीकरण और चुनाव सुधार का यक्ष प्रश्न

शक्ति के विकेंद्रीकरण और चुनाव सुधार का यक्ष प्रश्न  # कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार शक्ति के विकेंद्रीकरण के बिना ग्राम स्वराज और चुनाव सुधार की परिकल्पना व्यर्थ है। वजह यह कि क्रिमिनल जस्टिस और विलम्बित न्याय प्रणाली से लोकतांत्रिक संवाद की प्रक्रिया न केवल धीमी, बल्कि प्रभावित भी हो रही है। लगभग सभी बुद्धिजीवी इस बात को लेकर आगाह करते रहते हैं कि सत्तागत सांठगांठ से किसी का भी हित नहीं सधेगा। जनहित तो कदापि नहीं। इसलिए हर जिम्मेदार संस्था और अधिकारियों को चुनावों में स्टेट फंडिंग या फिर समतुल्य प्रावधानों के बारे में गम्भीरता पूर्वक सोचना होगा, विचार करना होगा।  ऐसा इसलिए कि धनबल और बाहुबल बहुत कम लोगों के पास है, जिससे हमारा लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। समाज में बहुत से लोग हैं जिनके पास न धन है, न बाहुबल है, जिससे एक धनी अथवा बाहुबली व्यक्ति के चुनाव जीतने की संभावना अधिक बलवती हो जाती है।  लिहाजा, राजनीतिक दल भी किसी भी तरह से चुनाव जीतने और सत्ता हथियाने की गरज से ऐसे लोगों को  टिकट देकर आगे बढ़ाते हैं, जिससे पूरी व्यवस्था ही सवालों के घेरे में खड़ी है। सच...

ग्राम स्वराज की बात आखिर आगे बढ़े तो कैसे, जानिए इसे

ग्राम स्वराज की बात आखिर आगे बढ़े तो कैसे, जानिए इसे # कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार महात्मा गांधी ने अपनी हत्या के एक दिन पहले अपनी डायरी में आजादी, स्वराज, पंचायत, देश को जाना कहां है और जाएगा किधर आदि जो बातें आदतन लिखी हैं, उससे भविष्य के भारत को लेकर उनकी भावना का पता चलता है। इसलिए इसे उनका अंतिम वसीयत कहा जाता है। विकास के तमाम दावों के बीच आज भी गांव की तस्वीर और बापू की छवि देखने के बाद जो सवाल हमारे दिल में कौंधते हैं, उससे यही महसूस होता है कि आखिरकार कैसे इस विषमता को दूर किया जा सकता है।  महात्मा गांधी ने तब कहा था कि भले ही हमारा देश आजाद हो गया है, लेकिन 7 लाख गांव आज भी गुलाम हैं। जब तक ग्रामीण जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी नहीं मिलती, तबतक अनौपचारिक चुनावों का कोई भी महत्व नहीं रह जाता। कुछ यही वजह रही होगी कि तब भी उन्होंने कांग्रेस को भंग करने की वकालत करते हुए लोक सेवक संघ बनाने का सुझाव समकालीन सहयोगियों को दिया था। उन्होंने कहा था कि हर गांव में 5 लोगों की पंचायत बने, जो देश को आगे ले जाए। इसे ही उनकी ग्राम स्वराज की परिकल्पना करार दिया जात...

धूल भरी आंधी और बदलते मौसम की दोहरी मार झेल रहे दमा के मरीज

धूल भरी आंधी और बदलते मौसम की दोहरी मार झेल रहे दमा के मरीज @ कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार यदि आप दमा के मरीज हैं तो बदलते मौसम में सावधान रहिए। इस वक्त जो धूल भरी आंधी चल रही है, वह आपकी परेशानी बढ़ा सकती है। दरअसल, हाल ही में यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल कौशांबी में तकरीबन सौ से भी ज्यादा लोगों ने अपनी फेफड़ों की स्वास्थ्य जांच एक निःशुल्क परामर्श शिविर में करवाई है, जिसके विश्लेषण के बाद यह तथ्य प्रकाश में आया है कि बदलते मौसम में धूल भरी आंधियों के चलने से श्वांस एलर्जी एवं बिगड़े हुए दमे के मरीजों की संख्या बढ़ी है, जिससे दिल्ली-एनसीआर वासियों का चिंतित होना स्वाभाविक है। इस बारे में वरिष्ठ सांस एवं फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के के पांडे, डॉक्टर अर्जुन खन्ना एवं डॉक्टर अंकित सिन्हा की टीम से परामर्श करने के बाद मरीजों ने फेफड़ों के संक्रमण, सांस फूलने, दमा एलर्जी एवं खर्राटे की बीमारियों से निजात पाने के उपाय पूछे एवं उपचार समझे। डॉक्टरों ने बताया कि इस शिविर के माध्यम से इन बीमारियों के कुछ नवीनतम ट्रेंड का भी पता चला है, जिसे संज्ञान में रखकर ही मरीजों को आवश्यक परामर्श...

हिममानव 'यति' की मौजूदगी पर पड़ी वक्त की धूल एकबार फिर छंटी

 हिममानव 'यति' की मौजूदगी पर पड़ी वक्त की धूल एकबार फिर छंटी @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार सनातन संस्कृति साहित्य से जुड़ीं मिथक करार दी जाने वाली कतिपय बातों पर जब आधुनिक सोच वाली संस्थाएं भी 'सच्चाई' की मुहर लगाती प्रतीत होती हैं, तो निःसन्देह कभी विश्व गुरु होने के एहसास को वर्तमान में भी साकार करने की संभावनाओं को बल मिलता है। क्योंकि समकालीन सरकार की प्राथमिकताएं भी कुछ ऐसी ही हैं, जिससे इस दिशा में की गई कोई भी सकारात्मक कोशिश एक बड़ी मुहिम में तब्दील हो सकती है और वह दिन दूर नहीं जब वे अपनी बुलंदियों तक पहुंच जाएं। शायद इसलिए भी भारतीय सेना द्वारा हाल ही में हिम मानव की मौजूदगी को लेकर की गई टिप्पणी और साझा की गई तस्वीर का अपना महत्व है। एक बार फिर यह सवाल मुखर हो चुका है कि क्या हिमालय पर वाकई हिम मानव विचरता है? प्रश्न यह भी है कि आखिरकार उसके अस्तित्व के निशान दुनिया मात्र को कब कब मिले हैं? इससे जुड़ी हुई एक बात यह भी कि क्या हिम मानव या येती या शेरपा का धरती पर अस्तित्व है? क्योंकि, सेना द्वारा साझा की गईं कुछ हालिया तस्वीरों से इस मिथकीय मानवीय प्रज...

आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की साझी चुनौती पर अब निर्णायक चोट की दरकार

 आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की साझी चुनौती पर अब निर्णायक चोट की दरकार @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड यानी कि संगठित अपराध जैसे रक्तबीजों के मूल स्वरूप को समझे बिना इनका खात्मा कदापि नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल फिर वही कि आखिरकार इसे समझेगा कौन, विधायिका या कार्यपालिका या फिर दोनों। क्योंकि इस संदर्भ में न्यायपालिका, मीडिया और सिविल सोसाइटी की भूमिका या तो बिल्कुल हाशिये पर पहुंच चुकी है, या फिर क्रमशः बाद में ही मुखर होती दिखाई दे रही है!  मसलन, यह एक ऐसा जटिल सवाल है जो लगभग चार या फिर सात दशकों से अपना माकूल जवाब तलाश रहा है। लेकिन मिल रही है चुनाव दर चुनाव सियासी उलटबासी। इसलिए मन में यह पूरक सवाल कौंध रहा है कि आखिर व्यवस्थागत खामियों के बीच हमलोग कबतक गिनते रहेंगे अपने ही वीर जवानों की क्षत विक्षत शरीरें। कब थमेगा ये अंतहीन सिलसिला। क्या आंतरिक भूभाग पर जारी खूनी झड़पों का कोई सर्वमान्य हल निकल पायेगा, और यदि नहीं तो बनावटी विद्रोह के फनों को कुचलेगा कौन? दो टूक कहें तो जिन पर इन बातों को समझने तथा औरों को भी समझाने की ...

सरकार के सक्रिय उपायों के कारण लगने लगा है बैंक घोटालों का पता

सरकार के सक्रिय उपायों के कारण लगने लगा है बैंक घोटालों का पता  # ऐसे मामलों की मीडिया रिपोर्टिंग में भी दर्ज की गई है वृद्धि  @ कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार केंद्र में दूसरी बार सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बैंकों की ऐसी नकेल कसी की, धीरे धीरे कई सारे गड़बड़झाले प्रकाश में आते गए। मोदी सरकार पार्ट टू में ही बैंकों के खिलाफ सख्ती जारी रहेगी। सरकार की पूरी कोशिश होगी कि बैंकों को अभिजात्य वर्गीय लोगों के शिकंजे से निकालकर आमलोगों की चौखट तक पहुंचा दिया जाए। गत दिनों जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, बैंकों द्वारा घोटालों की संख्या में वृद्धि के आरबीआई के आंकड़ों को मीडिया के कुछ हिस्सों में हाल के वर्षों में बैंकों में बढ़ते घोटालों की एक तस्वीर के रूप में चित्रित किया गया है। जिसके लिए मोदी सरकार नहीं, बल्कि मनमोहन सरकार या उनकी पूर्ववर्ती सरकारें जिम्मेदार हैं। मौजूदा सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आंकड़ा रिपोर्टिंग के वर्ष का है, न कि घोटालों के होने या ऋण मंजूर होने या फिर  वचन-पत्र इत्यादि के वर्ष का, जो कि कई मामलों में पुरानी अवधि का है। ...

जानिए, फैमिली फ्लोटर हेल्थ इंश्योरेंस प्लान क्या है? आखिर इसे ही क्यों खरीदना चाहिएॽ

जानिए, फैमिली फ्लोटर हेल्थ इंश्योरेंस प्लान क्या है? आखिर इसे ही क्यों खरीदना चाहिएॽ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार कहा जाता है कि स्वास्थ्य ही धन है। लेकिन जब किसी की तबियत खराब होती है तो उसे दिन में ही तारे नजर आने लगते हैं। क्योंकि तब या तो सगे-सम्बन्धी और करीबी मित्र काम आते हैं या नगदी काम आती है या फिर व्यक्तिगत या सामूहिक स्वास्थ्य बीमा। उसमें भी इंडिविजुअल हेल्थ इंश्योरेंस कम और फैमिली फ्लोटर हेल्थ इंश्योरेंस अधिक, क्योंकि इसमें इंश्योरेंस लिमिट अधिक होती है। इसलिए आपके शुभचिंतक या जागरूक लोग आपसे एक सवाल अवश्य पूछेंगे कि क्या आपने हेल्थ पॉलिसी खरीद ली है? यदि नहीं तो यह सलाह अवश्य देंगे कि अब विलम्ब मत कीजिये।  ऐसा इसलिए कि महानगरों या बड़े शहरों में सबके पास समय की किल्लत होती है। लेकिन जब किसी की तबियत गड़बड़ाती है तो लोग उसे निजी हॉस्पिटल पहुंचा देते हैं, क्योंकि सरकारी हॉस्पिटल हर जगह उपलब्ध नहीं हैं। यदि हैं भी तो स्तरीय सुविधाओं की किल्लत है, जिससे वो अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। जब आपको किसी निजी अस्पताल में ले जाया जाएगा तो उनका पहला सवाल होता है कि हेल्थ...

सूचना का अधिकार कानून क्या है? इसका प्रयोग कैसे किया जाता है?

सूचना का अधिकार कानून क्या है? इसका प्रयोग कैसे किया जाता है?  @ कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आमलोगों को 'सूचना का अधिकार' प्रदान करने का तातपर्य होता है, जनभागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया  सराहनीय कदम। क्योंकि किसी भी संवैधानिक सत्ता से समुचित सूचना पाने का जो अधिकार पहले सिर्फ जनप्रतिनिधियों के पास होता है, वही कमोबेश इस कानून के माध्यम से जनता में भी हस्तांतरित कर दिया गया है।  यदि आमलोगों के द्वारा इसका सदुपयोग किया जाए तो सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार में काफी कमी आ सकती है।इससे विकास और सुशासन की अवधारणा परिपुष्ट होती है। लेकिन यदि इसका किसी भी प्रकार से दुरुपयोग किया जाए अथवा दुश्मन देशों से एकत्रित आंकड़े व जानकारियां साझा की जाने लगें तो किसी भी शासन द्वारा स्थापित व्यवस्था की स्वाभाविक गति भी अवरुद्ध हो सकती है।  शायद यही वजह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, एकता व अखंडता जैसे कतिपय अहम पहलुओं के मद्देनजर कुछ सूचनाओं को मांगने का जनता का अधिकार ही इस कानून में कानूनन प्रतिबंधित कर दिया गया है। # वर्ष 2005 में भारत...

सूचना का अधिकार कानून: किन-किन देशों में क्या है स्थिति?

सूचना का अधिकार कानून: किन-किन देशों में क्या है  स्थिति? @ कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार विश्व के पांच देशों के सूचना के अधिकार कानून का तुलनात्मक अध्ययन अपने आपमें एक दिलचस्प पहलू है। जब हम स्वीडन, कनाडा, फ्रांस, मैक्सिको तथा भारत में लागू इस कानून को देखते और परखते हैं तो कई बातें अपने आप मुखरित हो जाती हैं। क्योंकि वर्ष, शुल्क, सूचना देने की समयावधि, अपील या शिकायत प्राधिकारी, जारी करने का माध्यम, प्रतिबन्धित करने का माध्यम आदि की तुलना जब एक प्रदत्त सारणी के माध्यम से की जाती है तो उसके गुणावगुणों का भी पता चलता है। दरअसल, विश्व में सबसे पहले स्वीडन ने सूचना का अधिकार कानून 1766 में लागू किया, जबकि कनाडा ने 1982, फ्रांस ने 1978, मैक्सिको ने 2002 तथा भारत ने 2005 में लागू किया। अब इनके तुलनात्मक अध्ययन से जो तथ्य सामने आते हैं, वो इस प्रकार हैं:- पहला, विश्व में स्वीडन पहला ऐसा देश है जिसके संविधान में सूचना की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इस मामले में कनाडा, फ्रांस, मैक्सिको तथा भारत का संविधान उतनी आज़ादी प्रदान नहीं करता। जबकि स्वीडन के संविधान ने 250 वर्ष पूर्व सूचन...

जानिए कैसे बनें सरकारी या निजी अध्यापक, कौन सी डिग्री बनाएगी आपको बेहद सफल

जानिए कैसे बनें सरकारी या निजी अध्यापक, कौन सी डिग्री बनाएगी आपको बेहद सफल   @ कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार किसी भी समाज में शिक्षक की महत्ता सर्वोपरि है। गुरुकुल शिक्षा पद्धति से लेकर कॉरपोरेट एजुकेशन कल्चर तक में ज्ञान के आयाम और तकनीक भले ही बदले, लेकिन शिक्षा और शिक्षक की उपयोगिता सदैव बरकरार रही। तभी तो हमारे समाज में शिक्षक अथवा गुरुजी को पूजनीय स्थान प्राप्त है। इसके अलावा, नए आर्थिक परिवेश में पैसे की कमी भी इस पेशे में नहीं रही, बशर्ते कि किसी में वास्तविक टैलेंट हो। हालांकि, निजी क्षेत्र की तमाम दुश्वारियों से दूर रहने के लिए आज भी हर युवक सरकारी नौकरी की चाह रखता है, क्योंकि यह काफी प्रतिष्ठाजनक नौकरी होती है। यही वजह है कि कई लोग इंटरमीडिएट करने के बाद प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स या स्नातक (ग्रेजुएशन) करने के बाद बीएड आदि करके से शिक्षण (टीचिंग) में ही अपना करियर बनना चाहते हैं। यह बात दीगर है कि कई बार उनको सही मार्गदर्शन उचित वक्त पर नहीं मिल पता, जिससे वो सफल नहीं हो पाते।  लिहाजा, स्पष्ट कर दें कि अगर आप शिक्षक बनने के लिए निर्धारित डिग्री प्...

ऐसे बनवाएं अपना मूल निवास प्रमाण पत्र, विभिन्न प्रदेशों में इसकी ऑनलाइन प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेजों के बारे में जानिए

ऐसे बनवाएं अपना मूल निवास प्रमाण पत्र, विभिन्न प्रदेशों में इसकी ऑनलाइन प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेजों के बारे में जानिए  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार किसी भी व्यक्ति के मूल निवासी होने का प्रमाण पत्र उनके गृह राज्य से बनता है। उस राज्य के जिस जनपद के आप निवासी हैं, वहां की तहसील से यह प्रमाण पत्र निर्गत किया जाता है। लेकिन, जब से यह ऑनलाइन बनने लगा है, तब से आप कहीं से भी इसे हासिल कर सकते हैं। इससे लोगों को काफी सहूलियत हुई है। हालांकि, जो लोग कई वर्षों से किसी दूसरे प्रदेश के विभिन्न शहरों में स्थायी रूप से बस चुके हैं और अपने मूल प्रदेश से लगभग नाता तोड़ चुके हैं, तो वैसे लोग वहां से भी अपना मूल निवास प्रमाण पत्र बनवा सकते हैं। आज के डिजिटल युग में इस सम्बन्ध में आवेदन करने की सुविधा और उसका प्रिंट हासिल करने की सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। यह बात अलग है कि विभिन्न प्रदेशों में इसकी अलग-अलग सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कुछ मौलिक बातें एक ही हैं। बहुत से राज्यों में मूल निवास प्रमाण पत्र बनाने की सुविधा अब आवेदकों को घर बैठे ही मिल रही है। यहां हम मध्यप्रदेश, राजस्था...

जानिए क्या है पॉक्सो एक्ट 2012, वर्ष 2018 में क्या हुआ इसमें संशोधन, कितनी खतरनाक हैं इसकी विभिन्न धाराएं

जानिए क्या है पॉक्सो एक्ट 2012, वर्ष 2018 में क्या हुआ इसमें संशोधन, कितनी खतरनाक हैं इसकी विभिन्न धाराएं @ कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आये दिन समाज में बच्चों के साथ यौन अपराधों की ख़बरें मिलती रहती हैं, जो किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार करती हैं। लिहाजा, इस तरह के मामलों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर सरकार ने वर्ष 2012 में एक विशेष कानून "पॉस्को एक्ट" बनाया। इस कानून के तहत दोषी व्यक्ति को उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। क्योंकि यह कानून बच्चों को छेड़खानी, बलात्कार और कुकर्म जैसे मामलों से सुरक्षा प्रदान करता है। खास बात यह कि वर्ष 2018 में इस कानून में संशोधन किया गया, जिसके बाद 12 साल तक की बच्ची से दुष्कर्म के दोषियों को मौत की सजा देने का प्रावधान किया गया है। इससे 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस' यानी पॉक्सो (पीओसीएसओ) एक्ट को काफी मजबूती मिली है और जनसामान्य में भय पैदा हुआ है कि यदि गलत आचरण करेंगे तो कड़ी दंड भी मिल सकती है। इस कानून के बनने के बाद ऐसी हिंसा में कहीं कमी आने के संकेत हैं तो कहीं-कहीं स्थिति में अपेक्षाकृत सुधार महसूस नही...

जानिए, क्रिप्टो करेंसी क्या है? कैसे कार्य करती है? इससे क्या लाभ-हानि है? इसका भविष्य कैसा है?

जानिए, क्रिप्टो करेंसी क्या है? कैसे कार्य करती है? इससे क्या लाभ-हानि है? इसका भविष्य कैसा है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार देश-दुनिया के किसी भी व्यक्ति, संस्था तथा देश को अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और आपसी लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए एक मुद्रा (करेंसी) की जरूरत होती है ताकि उसका उपयोग वह सुचारू रूप से कर सके। इसलिए, प्रत्येक देश की अपनी अलग-अलग मुद्रा होती है, जैसे-भारत में रुपया, अमेरिका में डॉलर आदि। दरअसल, यह भौतिक करेंसी होती हैं जिसे आप देख सकते हैं, छू सकते हैं और नियमानुसार किसी भी स्थान या देश में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन क्रिप्टो करेंसी इससे अलग होती है जो एक डिजिटल करेंसी है। इसे आप न तो देख सकते हैं, न छू सकते हैं, क्योंकि भौतिक रूप में क्रिप्टो करेंसी का मुद्रण नहीं किया जाता। इसलिए इसे आभासी मुद्रा कहा जाता है। यह पिछले कुछ सालों में ऐसी करेंसी काफी प्रचलित हुई है। # आखिर क्या है क्रिप्टो करेंसी? क्रिप्टो करेंसी एक ऐसी मुद्रा है जो कंप्यूटर एल्गोरिथ्म पर बनी होती है। यह एक स्वतंत्र मुद्रा है जिसका कोई मालिक नहीं होता। यह करेंसी किसी भी ...

जानिए, वेतन संहिता 2019 में निहित न्यूनतम वेतनमान के बारे में

जानिए, वेतन संहिता 2019 में निहित न्यूनतम वेतनमान के बारे में @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार अब करोड़ों मजदूरों को न्यूनतम वेतनमान मिलने लगा है, क्योंकि मोदी सरकार ने वेतन संहिता 2019 बनाकर चार पुराने श्रम कानूनों की सभी खास  विशेषताओं को इसमें शामिल करते हुए कुछ नए प्रावधान भी जोड़ दिए हैं, जिससे इसकी उपयोगिता और दायरा दोनों बढ़ चुका है। बता दें कि पहली बार साल 2017 में पेश हुए इस विधेयक को इसी वर्ष केंद्र सरकार की ओर से हरी झंडी मिली, जिसके बाद जारी हुई वेतन संहिता 2019 की अधिसूचना के साथ ही देश के तकरीबन 50 करोड़ मजदूरों को एकसमान न्यूनतम वेतन मिलने का रास्ता साफ हो गया है। कहना न होगा कि श्रम सुधारों की दिशा में इसे बहुत बड़ा कदम बताया जा रहा है। क्योंकि इसके लागू होने के बाद देश के तमाम मजदूरों को अब सुनिश्चित किए गए न्यूनतम वेतन से कम वेतन देना अपराध माना जाएगा। यही नहीं, अब एक समान काम के बदले एक जैसा वेतन देना भी जरूरी होगा। क्योंकि ये नया कानून ही अब पुराने श्रम कानूनों की जगह ले चुका है। गौरतलब है कि श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने 'कोड ऑन वेजेस' बिल को लोकसभा मे...

पहली ही फिल्म से राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले निर्देशक सत्यप्रकाश उपाध्याय का विशेष साक्षात्कार

पहली ही फिल्म से राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले निर्देशक सत्यप्रकाश उपाध्याय का विशेष साक्षात्कार फिल्म निर्देशक सत्यप्रकाश उपाध्याय ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार को पूरी टीम के लिए गौरव का क्षण बताते हुए कहा कि इससे मेरा उत्साह बढ़ा है और सामाजिक विषयों को प्रमुखता के साथ उठाने की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने फ़िल्म जगत में रचनात्मकता का प्रदर्शन करने वाले श्रेष्ठ कलाकारों सहित विभिन्न लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में सोमवार को 66वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों से नवाज़ा। इस अवसर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर की फ़िल्मों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए फ़िल्म डिवीज़न द्वारा ‘रियल सिंगल विंडो’ शुरू किए जाने की घोषणा की। 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में नॉन फीचर फिल्म श्रेणी के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ आर्ट एण्ड कल्चर फिल्म का पुरस्कार 'बुनकर- द लास्ट ऑफ द वाराणसी वेवर्स' को दिया गया।  निर्देशक सत्यप्रकाश उपाध्याय की यह पहली फिल्म भारतीय बुनकरी की विशेषताओं, इतिहास और बुनकरों की समस्याओं पर केंद्रित है। सत्यप्रकाश...

ईपीएफ सेविंग्स यानी कर्मचारी भविष्य निधि बचत के विषय में जानिए खास बात

# ईपीएफ सेविंग्स यानी कर्मचारी भविष्य निधि बचत के विषय में जानिए खास बात @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार अपने देश में अधिकतर लोगों को यह पता भी नहीं होता है कि कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) क्या चीज है, इसके सहारे कैसे और कितनी बचत की जा सकती है, इसके क्या-क्या अन्य फायदे हैं तथा कौन-कौन से लोग इसके दायरे में आते हैं और कौन-कौन से लोग नहीं। इसलिए हम आपको बताएंगे ईपीएफ से जुड़े उन मूलभूत तथ्यों के बारे में, जो आमतौर पर पूछे जाने वाली बातों, उनसे जुड़े पूरक प्रश्नों एवं समीचीन उत्तरों की बानगी बन सकते हैं। सवाल है कि मेरे दोस्त का ईपीएफ क्यों नहीं कट रहा है? तो जवाब स्वरूप यह बताया जा सकता है कि कोई भी नियोक्ता अपने कर्मचारियों के वेतन में से दो सूरतों में ही ईपीएफ की कटौती नहीं करता है- पहला, यदि किसी प्रतिष्ठान में 20 से कम कर्मचारी हों तो वहां पर पीएफ कटौती आवश्यक नहीं है। दूसरा, यदि किसी प्रतिष्ठान में 20 से अधिक कर्मचारी हैं और सभी कर्मचारियों का मूल वेतन एवं महंगाई भत्ता (डीए) दोनों मिलाकर 15 हजार रुपये मासिक से अधिक है और यदि इन सबने फार्म 11 भरकर ईपीएफ से बाहर रहने का निर्...