हिममानव 'यति' की मौजूदगी पर पड़ी वक्त की धूल एकबार फिर छंटी
हिममानव 'यति' की मौजूदगी पर पड़ी वक्त की धूल एकबार फिर छंटी
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
सनातन संस्कृति साहित्य से जुड़ीं मिथक करार दी जाने वाली कतिपय बातों पर जब आधुनिक सोच वाली संस्थाएं भी 'सच्चाई' की मुहर लगाती प्रतीत होती हैं, तो निःसन्देह कभी विश्व गुरु होने के एहसास को वर्तमान में भी साकार करने की संभावनाओं को बल मिलता है। क्योंकि समकालीन सरकार की प्राथमिकताएं भी कुछ ऐसी ही हैं, जिससे इस दिशा में की गई कोई भी सकारात्मक कोशिश एक बड़ी मुहिम में तब्दील हो सकती है और वह दिन दूर नहीं जब वे अपनी बुलंदियों तक पहुंच जाएं।
शायद इसलिए भी भारतीय सेना द्वारा हाल ही में हिम मानव की मौजूदगी को लेकर की गई टिप्पणी और साझा की गई तस्वीर का अपना महत्व है। एक बार फिर यह सवाल मुखर हो चुका है कि क्या हिमालय पर वाकई हिम मानव विचरता है? प्रश्न यह भी है कि आखिरकार उसके अस्तित्व के निशान दुनिया मात्र को कब कब मिले हैं? इससे जुड़ी हुई एक बात यह भी कि क्या हिम मानव या येती या शेरपा का धरती पर अस्तित्व है? क्योंकि, सेना द्वारा साझा की गईं कुछ हालिया तस्वीरों से इस मिथकीय मानवीय प्रजाति को लेकर पुनः चर्चा शुरू हो गई है। इस बार भी उम्मीद यही कि जब बात निकली है तो बहुत दूर तक जाएगी और कुछ नई नई यथार्थपरक बातें और भी क्षणकर आएंगी।
यूं तो पुरातन काल से ही हिमालय की बर्फीली चोटियों और वैसी ही वादियों में हिममानव के रहने की बात कही जाती रही है। लेकिन पहली बार सन 1951 में जब उनके विशालकाय पैरों के निशान से जुड़ीं तस्वीरें तत्कालीन मीडिया माध्यमों में छपीं तो एक बारगी ये दुनिया चौंक गई। उसके बाद गुजश्ते दशक के साल 2013 में जब शेरपा (येती) से संबंधित विभिन्न नमूनों का डीएनए विश्लेषण हुआ तो कतिपय नमूने अन्य जानवरों के पाए गए, जबकि दो अन्य नमूने बिल्कुल अलग साबित हुए, जिनके बारे में विश्लेषकों की राय आई कि वे भालू की दो प्रमुख प्रजातियों से जुड़ी संकर नस्ल हैं।
यही वजह है कि जब भारतीय सेना ने आम अवाम से कुछ अनुभूत बातें साझा की तो लोग रोमांचित हो उठे।उनके जेहन में यह सवाल पुनः कौंधा कि क्या पृथ्वी पर हिम मानव या येती या शेरपा का अस्तित्व वास्तव में है? इसी के साथ हिमालय पर हिम मानव रूपी महामानव की मौजूदगी का वर्षों पुराना सवाल पुनः चर्चा परिचर्चा में अपनी जगह बना चुका है। ऐसा इसलिए कि भारतीय सेना ने बीते रविवार को कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया माध्यमों पर ट्वीट कीं, जिनमें बड़े बड़े पद चिन्हों के स्पष्ट निशान दिखाई दे रहे हैं, जो आकार में 32x15 इंच तक के लंबे-चौड़े हैं, जो असामान्य हैं।
कहने का तातपर्य यह कि वायरल की गईं चित्रों के माध्यम से भारतीय सेना ने हिमालय में हिममानव की मौजूदगी के जो संकेत दिए हैं, वो एक हद तक प्रामाणिक समझे जा सकते हैं। क्योंकि सफेद बर्फ पर पैरों के ये जीवंत निशाना पड़ोसी देश नेपाल के समीप स्थित मकालू बेस कैंप पर पाए गए हैं। मसलन, यह पहली बार नहीं जब बर्फ पर बने इन पैरों के निशानों ने पर्वत राज हिमालय पर हिममानव के संकेत दिए हैं, बल्कि इस मिथकीय प्रजाति को लेकर तरह तरह के किस्से और उनसे जुड़ीं कुछ शोधपरक व जिज्ञासा वर्द्धक परिकल्पनाएं भी मौजूद हैं, जिनके बारे में जानना हर किसी के लिए जरूरी है।
आपको यह जानना-समझना चाहिए कि कब-कब और कहां कहां इस तरह के निशान मिल चुके हैं और उनके फलाफल क्या निकले। क्योंकि देश-दुनिया के सबसे रहस्यमय प्राणियों में से एक हिममानव शेरपा (येती) की कहानी तकरीबन हजारों साल पुरानी बताई जाती है। कई दफे इन्हें देखे या पाए जाने की खबरें भी आती-जाती रही हैं, जिससे आम जनमानस की जिज्ञासा इस विषय में आज तक बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी।
यदि आपको नहीं पता तो यह जान लीजिए कि एक बार लद्दाख के कुछ बौद्ध मठों ने दावा किया था कि हिममानव शेरपा यानी कि 'येती' को उन्होंने देखा है। उनके अलावा कुछ ऐसे भी शोधकर्ता सामने आए जिन्होंने शेरपा (येती) को मनुष्य नहीं बल्कि ध्रुवीय तथा भूरे भालू की क्रॉस ब्रीड यानी कि संकर नस्ल बताया है, जो एक रोमांचक तथ्य है। हालांकि कुछ ऐसे भी वैज्ञानिक हैं जिनका मानना है कि शेरपा (येती) एक विशालकाय जीव है, जिसकी शक्ल-सूरत बिल्कुल बंदरों जैसी होती है, जबकि वह आम इंसानों की तरह दो पैरों पर ही चलता है। यही कारण है कि इसे देखे-सुने-समझे जाने के रोमांचकारी किस्से अक्सर सुनने में आते-जाते रहे हैं। यह बात दीगर है कि इस रहस्यपूर्ण मसले पर भी ज्यादातर वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं और उनके अपने अपने शोधपरक तर्क हैं, जिससे किसी सर्वमान्य निष्कर्षों पर पहुंचना आसान बात नहीं है।
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जब 326 ईसा पूर्व में विश्वविजेता सिकंदर ने जब सिंधु घाटी को जीता था, तब उसने भी हिममानव को देखने की जिज्ञासा प्रकट की थी। लेकिन उस समय जब स्थानीय लोगों ने उसे बताया कि हिममानव शेरपा (यति) काफी ऊंचाई पर पाए जाते हैं, जिस वजह से उनको पकड़ा नहीं जा सकता। उसके बाद आधुनिक कालखंड में सर्वप्रथम वर्ष 1921 में हिममानव शेरपा (यति) को देखने का दावा किया गया था। वो भी तब जबकि हेनरी न्यूमैन नामक एक चर्चित पत्रकार ने ग्रेट ब्रिटेन के खोजकर्ताओं के एक दल का साक्षात्कार लिया था। उस वक्त भी खोजकर्ताओं ने दावा किया था कि उनको पहाड़ पर पैरों के विशालकाय पदचिन्ह दिखाई पड़े थे, जिसके बारे में उनके गाइड ने उन्हें बताया था कि वे निशान "मेतोह-कांगमी" के हैं। बता दें कि मेतोह का अभिप्राय होता है आम आदमी जैसा दिखने वाला भालू और कांगमी का मतलब होता है बर्फों पर पाया जाने वाला लम्बा चौड़ा इंसान।
एक अन्य रिपोर्ट में सन 1925 में एन. ए. तोम्बाजी नाम के एक फोटोग्राफर ने हिममानव शेरपा (येती) के मिलते जुलते हुलिए के बारे में बताया था कि 'उसकी आकृति बिल्कुल इंसान के जैसी थी, जो सीधा खड़ा होकर चल रहा था और बर्फ के बीच उसका काला रंग स्पष्ट नजर आ रहा था। उसने कोई कपड़ा भी नहीं पहन रखा था।' बता दें कि इस तरह के दावे तो कई लोगों ने किए, पर उन्होंने इसका कोई सर्वमान्य सबूत नहीं दिया, जिससे विभिन्न तरह के कयासों को भी बल मिला।
कहना न होगा कि पहली बार यदि किसी ने साक्ष्य दिखाने की कोशिश की तो वह थे विश्व विख्यात पर्वतारोही एरिक शिम्प्टन, जो सन 1951 में ब्रिटिश पर्वतारोही के रूप में एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग की तलाश पर निकले थे। तब उन्हें बड़े बड़े पैरों के निशाने मिले। जिसे उन्होंने अपने कैमरे में कैद कर लिया। इसके बाद तो हिमालय पर काल्पनिक महामानव शेरपा (यति) के होने की चर्चा सुर्खियों में छा गई। तभी हिम मानव के लिए शेरपा शब्द 'येती' प्रचलन में आया। जबकि उनके आलोचकों का कहना था कि यह आकृति बर्फ के पिघलने से बनी है। अलबत्ता, सच क्या था, वक्त की धूल के नीचे दब गया।
उसके बाद सन 1986 में नामचीन पर्वतारोही रीनहोल्ड मेसनर ने हिममानव शेरपा (येती) से सामना होने का दावा किया था। फिर वर्ष 2007 में सुपर पावर अमेरिका में एक टीवी शो को होस्ट करने वाले जोश गेट्स नामक व्यक्ति ने भी कुछ इसी प्रकार का दावा किया था। तब उन्होंने बताया था कि हिमालय से निकल रहे एक झरने के समीप बर्फ पर उनको पैरों के तीन रहस्यमय निशान मिले थे। यह बात दीगर है कि तब भी स्थानीय लोगों ने गेट्स की बात को लगभग खारिज कर दिया था और दलील दी थी कि वह भालू के पैरों के निशान थे, जिसे गेट्स ने गलत समझ लिया था। फिर भी वो बहुत दिनों तक चर्चा में बने रहे थे।
फिर, 2011 में एडिनबर्ग चिड़ियाघर के शोधकर्ताओं ने एक अंगुली पर शोध किया, जो नेपाल के एक मठ में रखी मिली थी। जिसके बारे में दावा किया जाता था कि वह शेरपा (येती) की अंगुली है। हालांकि बाद में हुई जांच में पता चला कि वह किसी इंसान की अंगुली थी, जिससे यह सवाल संशय में घिरा रहा और अपने माकूल उत्तर को तलाशता रहा।
तभी, रूसी सरकार की एक पहल से प्रोत्साहित विशालकाय पैरों वाले जानवर के एक्सपर्ट जॉन बाइंडरनैगल ने एक दिलचस्प दावे ठोंककर लोगों को चौंका दिया था। बता दें कि रूस की पुतिन सरकार ने तब शेरपा (येती) के रहस्योद्घाटन में दिलचस्पी दिखाई थी। तब उसने पश्चिमी साइबेरिया में विशालकाय पैरों वाले जानवर के विभिन्न एक्सपर्ट्स की एक कॉन्फ्रेंस बुलाई थी, जिसमें जॉन ने दावा किया था कि शेरपा (येती) का न सिर्फ वजूद है अपितु वे अपने निवास के लिए घर भी बनाते हैं। यह बात अलग है कि तब भी कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने उसके दावे को एक स्वर से खारिज कर दिया था।
एक और रिपोर्ट के नजरिए से, वर्ष 2013 में ऑक्सफर्ड के जेनेटिक्स एक्सपर्ट ब्रायन साइक्स ने हिममानव शेरपा (येती) से संबंधित कतिपय नमूने मंगवाए थे, जिसमें दुनिया भर से शेरपा (येती) के कथित बाल, दांत और टिशू भेजे गए थे। आंकड़े बताते हैं कि तब ब्रायन के पास कुल 57 सैंपल पहुंचे थे, जिनमें से 36 पर उन्होंने गहन शोध किया और अपने पास मौजूद अन्य जानवरों के डीएनए के नमूने से मिलाया। तब वह यह जानकर हैरान रह गए थे कि ज्यादातर सैंपल किसी न किसी जानवर के डीएनए से मेल खा गए। महज दो सैंपल अलग प्रकृति के निकले, जो लगभग 40 हजार वर्ष पहले पाए जाने वाले ध्रुवीय भालू के पाए गए। इस परीक्षण के बाद साइक्स का मानना था कि ये नमूने संकर नस्ल के हैं जो ध्रुवीय भालू और भूरे रंग के भालू के बीच हुए संकरण से पैदा हुई है।
तदुपरांत, साल 2017 में भी हिममानव शेरपा (येती) के कथित दांत, हड्डी, बाल, त्वचा एवं मल के संग्रहित नमूने की जांच की गई। जो हिमालय तथा तिब्बत के पठार में स्थित मठों, गुफाओं व अन्य स्थानों से जमा किए गए थे। उस वक्त भी शोधकर्ताओं ने उस क्षेत्र सहित दुनिया के विभिन्न इलाकों से भालुओं व अन्य जानवरों का नमूना एकत्रित किया। इस बार भी परीक्षण के दौरान हिम मानव शेरपा (येती) के अलग-अलग नौ नमूनों में से आठ एशियाई काले भालू, हिमालयायी भूरे भालू और तिब्बती भूरे भालू से मैच कर गए। जबकि नौवां नमूना एक कुत्ते का साबित हुआ। इस रिसर्च से भी कोई सर्वमान्य बात नहीं निकली।
बावजूद इसके, सनातन भूमि आसेतु हिमालय के भारत, भूटान, नेपाल, तिब्बत तथा म्यांमार की संस्कृति में हिममानव शेरपा (येती) नाम का अच्छा खासा महत्व है। इनकी चर्चाओं से सनातन संस्कृति साहित्य भरे पड़े हैं। लोक गाथाओं में गुंथित इनकी महिमाओं का ही असर है कि नेपाल सहित इन सभी देशों में आपको लग्जरी होटल और एयरलाइन के नाम में शेरपा (येती) शब्द जुड़ा हुआ मिल जाएगा। क्योंकि आस्था प्रधान इन देशों में वैज्ञानिक शोध-अनुसंधान में क्या दावे किए गए और क्या नहीं, इससे इन भोले भाले लोगों को कोई मतलब नहीं है। बल्कि कड़वी सच्चाई यही है कि हिममानव शेरपा (येती) को लेकर इस क्षेत्र के जनमानस में एक खास तरह की उत्सुकता पाई जाती है, जिनमें बुजुर्ग और बच्चे दोनों रस लेते हैं। भारतीय सेना की ताजातरीन ट्वीट से भी इनपे छाई नीरसता के बादल छंटे हैं और एक नई ज्ञान किरण मिलने की उम्मीद एक बार फिर जगी है। बशर्ते कि पर्याप्त सरकारी समर्थन भी मिले।
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