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डिजिटल यूनिवर्सिटी क्या है, यह कैसे बनेगी, इससे किसको फायदा मिलेगा, देश-विदेश में इसकी क्या स्थिति है?

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डिजिटल यूनिवर्सिटी क्या है, यह कैसे बनेगी, इससे किसको फायदा मिलेगा, देश-विदेश में इसकी क्या स्थिति है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार केंद्र सरकार ने देश भर के छात्रों को उनकी क्षेत्रीय (रीजनल) भाषा में ही विश्व स्तरीय गुणवत्ता वाली सार्वभौमिक शिक्षा उनके दरवाजे तक पहुंचाने के लिए जिस डिजिटल यूनिवर्सिटी की स्थापना का ऐलान आम बजट 2022 में किया है, उसको लेकर छात्र, शिक्षक और शैक्षणिक जगत के उद्यमी भी उत्साहित हैं। वैसे तो केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उसके बारे में अद्यतन स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है, लेकिन ऐसे प्रस्तावित  विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल करने की उत्सुकता न केवल खास बल्कि आमलोगों में भी बढ़ गई है।  बहरहाल, लोगों के मन में यह सवाल उठ रहे हैं कि डिजिटल यूनिवर्सिटी क्या है, यह कैसे बनेगी, इसका फायदा किसको मिलेगा, इसकी क्षेत्रीय, स्थानीय व वैश्विक उपयोगिता क्या है, इसकी उपादेयता क्या है, भारत और विश्व में इसकी क्या स्थिति है और स्टूडेंट्स किस तरह से इससे शिक्षा हासिल कर सकेंगे? ये सारे ऐसे गूढ़ सवाल हैं जिनका फिलवक...

आईटीआर फाइल करते समय यदि आपने कोई गलती कर दी है तो इन गलतियों को ऐसे सुधारें

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आईटीआर फाइल करते समय यदि आपने कोई गलती कर दी है तो इन गलतियों को ऐसे सुधारें @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार क्या आपको पता है कि आपके टैक्स रिटर्न में गलती को सुधारने और विलंबित रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा एक ही है, यानी 31 दिसंबर। यदि नहीं तो यह जान लीजिए कि वित्त वर्ष 2020-21 के लिए इसकी तिथि आगामी 31 मार्च 2022 तक बढ़ा दी गई है। इसलिए, यदि आप 31 मार्च, 2022 को देरी से रिटर्न दाखिल करते हैं, तो आप यह मौका चूक जाएंगे। कहने का तातपर्य यह है कि वित्तीय वर्ष (एफवाई) 2020-21 और (एवाई 2021-22) में आपने अपने आईटीआर में यदि कोई गलती हो, तो 31 मार्च 2022 के बाद इसको सुधारने का मौका आप चूक जाएंगे। बता दें कि असेसमेंट ईयर उस वित्तीय वर्ष के ठीक बाद का साल होता है, जिसके लिए रिटर्न फाइल किया जाता है। आपको पता होना चाहिए कि संशोधित रिटर्न आपको अपना मूल आईटीआर दाखिल करते समय की गई त्रुटि या तथ्यों की चूक को सुधारने की अनुमति देता है। इसलिए इसका लाभ अवश्य उठाना चाहिए। दरअसल, आईटीआर दाखिल करते समय की गई गलती को संशोधित आईटीआर दाखिल करके सुधारा जा सकता है। आई-टी अधिनियम की धार...

भूमंडलीकरण ने समाजवादी भारत के ताने-बाने को पूंजीवादी इंडिया के सांचे में ढलने को विवश कर दिया

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भूमंडलीकरण ने समाजवादी भारत के ताने-बाने को पूंजीवादी इंडिया के सांचे में ढलने को विवश कर दिया @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार समाजवादी सोच वाला भारत वैश्विक प्रभाव वश कैसे पूंजीवादी आचरण को प्रश्रय देने वाला इंडिया बन गया, यह जानना, समझना दिलचस्प है। समझा जाता है कि आजादी प्राप्ति के महज साढ़े चार दशक बाद भारत पर आर्थिक संकट के बादल मंडराने लगे। वैसे इन 45 वर्षों में भारत को कई आर्थिक संकट देखने पड़े, क्योंकि कभी छद्म युद्ध, कभी सीधी लड़ाई, कभी अकाल और कभी महामारी आदि के चलते देश पर आर्थिक संकट आता रहता था और भारतीय अर्थव्यवस्था में भुगतान संतुलन गहराता रहता था। लेकिन भारत के 1991 के आर्थिक संकट, जो अब तक का सबसे खराब था, इस बात की ओर इशारा करते हुए आया कि इसके संकेत लंबे समय से स्पष्ट थे। अर्थशास्त्री अपने आलेखों में इस बात की ओर इशारा कर रहे थे, उपाय भी सुझा रहे थे, लेकिन समझदार नेतृत्व की बाट देश जोह रहा था। आधुनिक भारत के इतिहास में देश को पहली बार 240 मिलियन डॉलर का ऋण प्राप्त करने के लिए 30 मई 1991 को निवेश बैंक यूबीएस को 20 टन सोना बेचना पड़ा। आर्थिक स्थिति इतनी बिकट होत...

राष्ट्र पर आर्थिक संकट आए लेकिन राष्ट्र निर्माताओं ने कड़े फैसले लेकर उन्हें दूर किया

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राष्ट्र पर आर्थिक संकट आए लेकिन राष्ट्र निर्माताओं ने कड़े फैसले लेकर उन्हें दूर किया @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आजादी से लेकर आजतक की भारतीय अर्थव्यवस्था के सफर पर जब हमलोग सूक्ष्म दृष्टि डालते हैं तो पता चलता है कि तेजी से औद्योगीकरण की खोज ने, कृषि क्षेत्र से धन का एक बड़ा पुनर्वितरण किया था। वैसे तो दूसरी पंचवर्षीय योजना में कृषि परिव्यय को लगभग आधा करके 14 प्रतिशत कर दिया गया था। इसका असर उत्पादन पर पड़ा।लिहाजा देश में खाने की किल्लत और बढ़ गई, साथ ही महंगाई भी बढ़ गई।  वहीं, खाद्यान्नों के आयात ने बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार को समाप्त कर दिया। चक्रवर्ती "राजाजी" राजगोपालाचारी, जो कभी नेहरू के मित्र-आलोचक थे, आर्थिक स्वतंत्रता के कट्टर समर्थक थे। इसलिए अर्थव्यवस्था में राज्य की अत्यधिक भागीदारी के सवाल पर उनका प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से मतभेद हो गया। यद्यपि 27 मई 1964 को, नेहरू की मृत्यु हो गई। लेकिन, तब और बाद के वर्षों में की गई आलोचनाओं के बावजूद, उन्होंने एक आधुनिकतावादी के रूप में अपनी विरासत को मजबूत किया था। परिवर्तित समय के सा...

आजादी से लेकर आज तक भारतीय अर्थव्यवस्था ने बहुत बदलाव देखे

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आजादी से लेकर आज तक भारतीय अर्थव्यवस्था ने बहुत बदलाव देखे @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आधुनिक भारत के निर्माता और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर समकालीन भारत के निर्माण कर्ता और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक विभिन्न प्रधानमंत्रियों ने 1947 से लेकर 2022 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भरपूर प्रयत्न किया, जिसपर हर कोई आज गौरव कर सकता है। यह बात अलग है कि कुछ को कम यश मिला और कुछ को ज्यादा, लेकिन इतिहास की कसौटी पर खरा उतरने के लिए सबने आवश्यक और हर संभव यत्न जरूर किये, कुछेक अपवादों को छोड़कर। भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू एक बार भाषण देते हुए कहा था कि स्वतंत्रता न केवल व्यक्तिगत, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के सपने भी लेकर आई है। इसलिए स्वाभाविक सवाल है कि किस आकार की आर्थिक नीति हो और सहस्राब्दी भारत में क्या क्या परिवर्तन हुए और क्या क्या किये जाने चाहिए, इस पर विचार जरूरी है। इसलिए आइए एक सूक्ष्म नजर डालते हैं 15 अगस्त 1947 से आज तक के भारतीय अर्थव्यवस्था के एक क्यूरेटेड इतिहास पर। कहना न ह...