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आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज है या नाजायज? चिंतन कीजिए

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आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज है या नाजायज? चिंतन कीजिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 53वें  मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के क्रम में याचिकाकर्ता की अपरिपक्व भाषा और समकालीन “सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति” पर एक तल्ख टिप्पणी की और परजीवी तक कह डाला। लिहाजा इसको भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह टिप्पणी केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद, चुनाव आयोग, मीडिया, नौकरशाही और संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार बढ़ते अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया आधारित आक्रामक विमर्श की ओर संकेत करती है।  इसलिए इसके अहम सियासी और प्रशासनिक मायने हैं और संविधान का संरक्षक होने के नाते सर्वोच्च न्यायालय भी अपने नैतिक दायित्व से सिर्फ छिछली टिप्पणी करके बच नहीं सकता, क्योंकि उसे हासिल स्वतः संज्ञान का अधिकार भी गरीबों की भलाई में एक हदतक निरर्थक प्रतीत होता आया है। बावजूद इसके सीजेआई की टिप्पणी कई मायनों में जायज म...

अमेरिका और चीन में बढ़ती घनिष्ठता के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स!

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अमेरिका और चीनी की बढ़ती संवाद-प्रक्रिया के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स को यूँ समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल में ही बढ़ती संवाद-प्रक्रिया और संभावित रणनीतिक समझौते को दुनिया बेहद गंभीरता से देख रही है, क्योंकि बदलती वैश्विक दुनियादारी और नवमहत्वाकांक्षी देशों-गुटों की मतलबी कूटनीति-अर्थनीति से अमेरिका-चीन दोनों की अंतरराष्ट्रीय बादशाहत खतरे में है। आखिर जब एक तरफ रूस और भारत अपनी दशकों पुरानी मित्रता पर अडिग हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप भी अपने पुराने सम्बन्धों को तरोताजा कर रहे हैं, जो कि अमेरिकी डीप स्टेट की बिल्कुल नई विसात है। देखा जा रहा है कि भारत की चतुराई और रूस की दृढ़ता से अमेरिका अपने ही बुने हुए जाल में फंसकर तड़फड़ा रहा है। वहीं, रूस-चीन की समझदारी से पश्चिमी एशिया में जो अमेरिका की फजीहत हुई है, उसके बाद अब चीन के समक्ष हथियार डालने के अलावा उसके पास कोई चारा भी नहीं  बचा है। चूंकि ट्रंफ मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के फार्मूले पर काम कर रहा है...

ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों के 'दिल्ली-विमर्श' के निहितार्थ

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ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों के 'दिल्ली-विमर्श' के निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक ब्रिक्स (BRICS) के विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय दिल्ली बैठक ने दुनिया को कई महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक संदेश दिए हैं, जिनके कूटनीतिक निहितार्थ को समझने की जरूरत है। अन्यथा शेष दुनिया को अमेरिकी-यूरोपीय दादागिरी (नाटो सैन्य गठबंधन) के दुनियावी दांवपेंचों से निजात मिलनी मुश्किल है।  लिहाजा, इस बैठक में मुख्य रूप से वैश्विक शक्ति-संतुलन, अमेरिकी प्रतिबंध नीति, पश्चिम एशिया संकट, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और “ग्लोबल साउथ” की भूमिका पर जोर दिखाई दिया।  देखा जाए तो नई दिल्ली में ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों का जमावड़ा लगा हुआ है। दो दिनों का यह 18वां शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया कई मोर्चे पर अस्थिरता से गुजर रही है। ब्रिक्स के सदस्य देश - ईरान और यूएई सीधे तौर पर इस हलचल में शामिल है। ऐसे में यह जुटान पूरी दुनिया के लिए अहम हो जाती है। इस अहम बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर, रूस के विदेश मंत्री सर्जेइ लावरोव और ...