अमेरिका और चीन में बढ़ती घनिष्ठता के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स!

अमेरिका और चीनी की बढ़ती संवाद-प्रक्रिया के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स को यूँ समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल में ही बढ़ती संवाद-प्रक्रिया और संभावित रणनीतिक समझौते को दुनिया बेहद गंभीरता से देख रही है, क्योंकि बदलती वैश्विक दुनियादारी और नवमहत्वाकांक्षी देशों-गुटों की मतलबी कूटनीति-अर्थनीति से अमेरिका-चीन दोनों की अंतरराष्ट्रीय बादशाहत खतरे में है। आखिर जब एक तरफ रूस और भारत अपनी दशकों पुरानी मित्रता पर अडिग हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप भी अपने पुराने सम्बन्धों को तरोताजा कर रहे हैं, जो कि अमेरिकी डीप स्टेट की बिल्कुल नई विसात है।

देखा जा रहा है कि भारत की चतुराई और रूस की दृढ़ता से अमेरिका अपने ही बुने हुए जाल में फंसकर तड़फड़ा रहा है। वहीं, रूस-चीन की समझदारी से पश्चिमी एशिया में जो अमेरिका की फजीहत हुई है, उसके बाद अब चीन के समक्ष हथियार डालने के अलावा उसके पास कोई चारा भी नहीं  बचा है। चूंकि ट्रंफ मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के फार्मूले पर काम कर रहा हैं और रूस, भारत, फ्रांस, ब्राजील, जापान ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिए हैं, ऐसे में पाकिस्तान को साधकर अरब में अपनी इज्जत बचाना और चीन के दरबार में हाजिरी लगाने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं 
बचा हुआ था।

ऐसे में यदि अमेरिका और चीन के बीच टकराव कुछ कम होता है और “नई दोस्ती” या व्यावहारिक सहयोग बढ़ता है, तो इसके वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। चूंकि दोनों देश पहले भी एक दूसरे के करीब रहे हैं, इसलिए उनके बीच कूटनीतिक प्रेम की पहल अमेरिकी की भूल सुधार रणनीति समझी जानी चाहिए और अपने उद्देश्य में ट्रंफ सफल प्रतीत हो चुके हैं। हालांकि यह भविष्य के गर्त में है कि चीनी चाकरी अमेरिका कहाँ तक कर पाएगा?

# समझिए,अमेरिका-चीन रिश्तों में नरमी क्यों महत्वपूर्ण है?

अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्तियाँ हैं। इनके संबंधों का असर लगभग हर देश पर पड़ता है। ऐसे में यदि दोनों के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और कूटनीति पर समझ बढ़ती है, तो वैश्विक तनाव कुछ हद तक कम हो सकता है। साथ ही 
दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर लाजिमी है।

पहला, वैश्विक बाजारों में स्थिरता: अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध कम होने पर शेयर बाजारों और निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है। सप्लाई चेन संकट कम हो सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र को राहत मिल सकती है।

दूसरा, तेल और ऊर्जा बाजार: यदि दोनों देश सहयोग करते हैं, तो वैश्विक ऊर्जा कीमतों में अनिश्चितता कम हो सकती है। मध्य पूर्व में तनाव कम कराने के लिए संयुक्त दबाव बन सकता है।

तीसरा, डॉलर बनाम युआन: चीन लंबे समय से डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है। ऐसे में अगर रिश्ते सुधरते हैं, तो अमेरिका कुछ आर्थिक संतुलन के साथ चीन को सीमित छूट दे सकता है, लेकिन डॉलर की केंद्रीय भूमिका तुरंत कमजोर नहीं होगी।

चतुर्थ, रूस, यूरोप और भारत पर प्रभाव: जहां तक रूस
की बात है कि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के लिए यह स्थिति मिश्रित हो सकती है। यदि अमेरिका और चीन करीब आते हैं, तो रूस की सामरिक उपयोगिता कुछ घट सकती है। लेकिन चीन रूस को पूरी तरह छोड़ने की स्थिति में नहीं होगा, क्योंकि उसे ऊर्जा और सैन्य संतुलन की जरूरत है।
वहीं, जहां तक यूरोप की बात है तो यूरोपीय देश राहत महसूस करेंगे क्योंकि अमेरिका-चीन तनाव से वैश्विक व्यापार प्रभावित हो रहा था। लेकिन यूरोप को डर रहेगा कि कहीं अमेरिका चीन के साथ सौदेबाजी में यूरोपीय हितों को पीछे न छोड़ दे। 

जहां तक भारत की बात है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों ला सकती है। जहां संभावित अवसर के रूप में वैश्विक व्यापार स्थिर होने से भारतीय निर्यात को लाभ मिलेगा। अमेरिका और चीन दोनों भारत को संतुलनकारी शक्ति के रूप में महत्व देते रहेंगे। भारत वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र बन सकता है। 

जहां तक संभावित चुनौतियाँ की बात है तो यदि अमेरिका चीन के प्रति नरम होता है, तो भारत पर चीन-विरोधी रणनीतिक दबाव कम हो सकता है। सीमा विवादों पर चीन अधिक आत्मविश्वासी रुख भी अपना सकता है। वहीं, क्वाड (QUAD) जैसे समूहों की रणनीतिक धार कुछ कम हो सकती है।

जहां तक सैन्य और सामरिक प्रभाव की बात है तो 
ताइवान मुद्दे पर तनाव कुछ समय के लिए कम हो सकता है। दक्षिण चीन सागर में सैन्य टकराव की आशंका घट सकती है। लेकिन दोनों महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा पूरी तरह खत्म नहीं होगी। सवाल है कि क्या यह स्थायी दोस्ती होगी? संभवतः नहीं। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा संरचनात्मक है: तकनीकी वर्चस्व, सैन्य प्रभुत्व, वैश्विक व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, और इंडो-पैसिफिक रणनीति।
इन मुद्दों पर दोनों देशों के हित टकराते रहेंगे। इसलिए यह “पूर्ण मित्रता” से अधिक “व्यावहारिक समझौता” हो सकता है।

इस पुनर्मिलन का सबसे बड़ा वैश्विक संदेश यह है कि
दुनिया अब बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहाँ
अमेरिका अकेला निर्णायक शक्ति नहीं रहेगा, बल्कि
चीन भी खुलकर वैश्विक नेतृत्व चाहता है। वहीं, भारत, रूस, यूरोप, ब्राजील और खाड़ी देश भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र मजबूत कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में ट्रंप-जिनपिंग संवाद वैश्विक शक्ति-संतुलन को नया आकार दे सकता है।

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