आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की साझी चुनौती पर अब निर्णायक चोट की दरकार

 आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की साझी चुनौती पर अब निर्णायक चोट की दरकार

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड यानी कि संगठित अपराध जैसे रक्तबीजों के मूल स्वरूप को समझे बिना इनका खात्मा कदापि नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल फिर वही कि आखिरकार इसे समझेगा कौन, विधायिका या कार्यपालिका या फिर दोनों। क्योंकि इस संदर्भ में न्यायपालिका, मीडिया और सिविल सोसाइटी की भूमिका या तो बिल्कुल हाशिये पर पहुंच चुकी है, या फिर क्रमशः बाद में ही मुखर होती दिखाई दे रही है! 

मसलन, यह एक ऐसा जटिल सवाल है जो लगभग चार या फिर सात दशकों से अपना माकूल जवाब तलाश रहा है। लेकिन मिल रही है चुनाव दर चुनाव सियासी उलटबासी। इसलिए मन में यह पूरक सवाल कौंध रहा है कि आखिर व्यवस्थागत खामियों के बीच हमलोग कबतक गिनते रहेंगे अपने ही वीर जवानों की क्षत विक्षत शरीरें। कब थमेगा ये अंतहीन सिलसिला। क्या आंतरिक भूभाग पर जारी खूनी झड़पों का कोई सर्वमान्य हल निकल पायेगा, और यदि नहीं तो बनावटी विद्रोह के फनों को कुचलेगा कौन?

दो टूक कहें तो जिन पर इन बातों को समझने तथा औरों को भी समझाने की महती जिम्मेदारी है, वह तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी विभिन्न वादों में बंटकर जनतांत्रिक तुष्टिकरण के लिए तरह-तरह के नैतिक-अनैतिक कशीदे गढ़ रहा है। जिससे स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है कि कहीं अल्पमत-बहुमत के चक्कर में पड़कर यह पूरी  लोकतांत्रिक व्यवस्था या तो अपने मूल मकसद से भटक चुकी है, या फिर तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति-प्रतिपूर्ति की गरज से भटकाई जा रही है, जिससे बचने के लिए एक उदारमना मार्गदर्शक का बेसब्रीपूर्वक इंतजार कर रहा है यह देश।

कहना न होगा कि जिस नैतिक हस्तक्षेप की बाट यह जनतांत्रिक व्यवस्था जोह रही है, वो नामुमकिन है! भले ही समकालीन सियासी नेतृत्व और उसके सिपहसालार इस बात को जोर जोर से चिल्ला रहे हैं कि 'मोदी है, तो मुमकिन है।' क्योंकि आंका जाए तो लोकतंत्र की मूल भावना की रक्षा करने जैसी चौकीदारी में मोदी प्रशासन भी पूर्ववर्ती सरकारों की भांति लगभग विफल रहा है, क्योंकि इस प्रशासन ने भी कांग्रेस की कतिपय असंगत नीतियों में ही हां में हां मिलाई है।

ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि अपने शुरुआती दौर में स्वतंत्रता, समानता और विश्व-बंधुत्व जैसे पवित्र भावों का वाहक समझी जाने वाली यह लोकतांत्रिक व्यवस्था, अब मानवतावाद और समाजवाद को तिलांजलि देते हुए जिस पूंजीवादी परिवेश में बढ़ चली है और जातिवादी आरक्षण, परिवारवादी सियासी विरासत और सम्पर्कवादी लूट-खसोट का पर्याय समझी जा रही है, उसकी कोख से साम्प्रदायिक आतंकवाद, जातीय-वर्गीय नक्सलवाद और पूंजीवादी अंडरवर्ल्ड जैसे अनश्वर रक्तबीज भी जन्म ले चुके हैं, जिनका खात्मा मुश्किल है। 

हद तो यह है कि जिस लोकतांत्रिक सूझबूझ से इनका सम्मिलित मुकाबला करना चाहिए, उसका नितांत अभाव महसूस किया जा रहा है। कमोवेश उसकी कथनी-करनी के विरोधाभासों को जांचने-परखने की न्यायिक अथवा मीडियाई कसौटी भी अब निरंतर विवादों में घिरती चली जा रही है। यह एक आसन्न नैतिक संकट है। तभी तो जनतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े कतिपय अहम यक्ष प्रश्नों का उत्तर मिलना भी अभी तलक बाकी है।

चाहे हमलोग हाल ही में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सलियों द्वारा दी गई रणनीतिक चुनौती में वीरगति को प्राप्त हुए दर्जनाधिक सुरक्षा बल के जवानों की शहादत और घायलों को देखने से उपजी टीस की बात करें। या फिर, संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भारत की लाख गुजारिश के बाद कुख्यात आतंकवादी सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करवाने में मिली अप्रत्याशित  सफलता से उपजे हर्ष की बात, एक ही सिक्के के दो पहलू सरीखे नीतिगत विफलता और कूटनीतिक सफलता, दोनों से साक्षात्कार हो जाता है।

दरअसल, जब भी हमारे वीर जवान कहीं शहीद होते हैं तो मेरे जेहन में यही सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों, कब तक और किसके लिए! क्या उनके लिए जिनकी फितरत ही कुछ और है तथा यह प्रशासनिक व्यवस्था भी जिनकी गणेश परिक्रमा करने की।अभ्यस्त मालूम पड़ती है। क्योंकि, पूरी लोकतांत्रिक दुनिया इस अनचाही विभीषिका से त्रस्त है। 

समकालीन ग्लोबल विलेज की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि शासन व्यवस्था के मानवीय पहलू को विकसित करने में किसी की दिलचस्पी नहीं है। प्रायः सभी लोग जिस लाभ आधारित हिंसा-प्रतिहिंसा को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रहे हैं, वह त्याग आधारित सेवाभावी और सहानुभूति वर्द्धक कैसे बनेगी, यह जानने-समझाने की फुर्सत भी किसी के भी पास नहीं है। जबकि सनातन संस्कृति से जुड़े वैदिक वाङ्गमय ऐसे उद्धरणों से भरे पड़े हैं। स्वाभाविक है कि आजकल हर किसी के समक्ष जो चुनौती सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी है, उससे निपटाना उतना आसान भी नहीं, जितना कि हमलोग समझते आए हैं। 

सच कहा जाए तो हमारी पुलिस, अर्द्धसैनिक बल और तीनों सेनाओं ने इस 'आपराधिक त्रिकोण' से निबटने की जो खुदरा रणनीति बनाई है, उसी से ऐसे तत्व न केवल अस्तित्व में बने हुए हैं, बल्कि यदा कदा हमारी सुरक्षात्मक और प्रतिरक्षात्मक व्यवस्था पर भारी पड़ते प्रतीत होते हैं। लिहाजा, अब भी वक्त है कि साम्प्रदायिक आतंकवाद, जातीय-वर्गीय नक्सलवाद और पूंजीवादी संगठित अपराध को जड़ मूल से खत्म करने के लिए एकीकृत और निर्णायक पहल करें, भले ही इन्हें शह प्रदान करने वाले सफेदपोशों यानी कि लोकतांत्रिक दुष्प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाले बहुमत प्राप्त क्षुद्र नेताओं का भी साथ साथ ही सफाया क्यों नहीं करना पड़े! अन्यथा, शहादत की लंबी चौड़ी हो रही सूची में अगला नाम आपका भी हो सकता है। 

फिलवक्त यह बात सबको समझना होगा कि हर बात में घड़ियाली आंसू बहाने वाली लोकतांत्रिक जमात को समझने और सख्त शासन-प्रशासन की भाषा उन्हें समझाने की जिस जरूरत को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है, उस पर अब निर्द्वंदता पूर्वक अमल किये जाने की दरकार है, क्योंकि इसके बिना आगे की शांतिपूर्ण और प्रगतिशील राहें निरापद और भयमुक्त नहीं बनाई जा सकती हैं।

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