आखिरकार ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले भारत और उसके पास-पड़ोस के लिए चिंता की बात क्यों हैं?
आखिरकार ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले भारत और उसके पास-पड़ोस के लिए चिंता की बात क्यों हैं?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
दुनिया की चौथी आर्थिक महाशक्ति भारत के इसराइल और ईरान दोनों के साथ गहरे और अलग-अलग स्तर पर महत्वपूर्ण रिश्ते हैं। यही वजह है कि जब पिछले हफ़्ते इसराइल ने ईरान पर अचानक हमला किया, तो एक ध्रुवीकृत वैश्विक माहौल में भारत के लिए किसी एक पक्ष का समर्थन करना आसान नहीं था। यह बात दीगर है कि, क़रीब एक महीने पहले जब भारत ने पाकिस्तान के कुछ इलाक़ों में सैन्य कार्रवाई की थी, तब इसराइल ने भारत का खुलकर समर्थन किया था।
लेकिन, देखा जाए तो एक ओर जहां इसराइल के लिए ऐसा करना एक सहज निर्णय था, क्योंकि पाकिस्तान अब तक इसराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं देता है। वहीं दूसरी ओर, भारत और ईरान के बीच लंबे समय से मज़बूत और सभ्यतागत स्तर के संबंध रहे हैं। इतना ही नहीं, दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहरे हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह बिना अपने दीर्घकालिक हितों को नुक़सान पहुंचाए इस संघर्ष में किसके साथ खुलकर खड़ा हो सकता है और किसके साथ नहीं। यही वजह है कि ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले भारत और उसके पास-पड़ोस के लिए चिंता की बात है।
दरअसल, भारत के मध्य एशिया में कई अहम हित जुड़े हुए हैं। एक ओर हमारे लिए तेल का आयात, खाड़ी देशों के साथ व्यापारिक वॉल्यूम और सबसे बड़ी बात- वहाँ रह रहे नौ मिलियन से ज़्यादा भारतीय लोग हैं जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में अगर युद्ध बढ़ता है, तो इस पूरे क्षेत्र को इससे अलग नहीं किया जा सकता। ऐसे में सुलगता सवाल है कि जिस तरह से ईरान की परमाणु साइट्स को निशाना बनाया गया है, उसमें अगर कहीं ज़रा सी भी चूक हुई और रेडिएशन हवा में फैल गया, तो उसका असर बहुत भयावह हो सकता है। यही वजह है कि भारत, पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान जैसे ईरान के पड़ोसी देश इन हमलों से चिंतित हैं। पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जो यहां अमेरिका व चीन के बीच दोगली भूमिका निभा रहा है। इससे ईरान भी भ्रमित है।
चूंकि भारत के लिए इसराइल और ईरान दोनों के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, इसलिए भारत कदापि नहीं चाहेगा कि मौजूदा तनाव और ज्यादा बढ़े क्योंकि उसका असर सभी पर पड़ेगा। इन हमलों के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से फोन पर बात की और अपने दृष्टिकोण से अवगत कराते हुए ईरानी मदद के लिए आभार प्रकट किया। इन तमाम पहलुओं को देखते हुए, हर देश- चाहे भारत हो या फिर कोई और- सीज़फ़ायर को ही सबसे उचित विकल्प मानेगा, लेकिन फिलहाल इस निर्णय का दारोमदार अमेरिका पर है।
दरअसल, जब हमलोग अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बात करते हैं, तो यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि हमारी रणनीतिक साझेदारी किसके साथ कितनी गहरी है। यही वजह है कि भारत ने अभी तक अपने रिश्तों को संतुलन में रखा है, लेकिन अगर कभी ऐसी कोई परिस्थिति आ जाए कि आपको इस देश का साथ देना है या दूसरे देश का, तो जो हमारे देश के लिए फायदेमंद है उसे देखते हुए हम स्टेटमेंट देते हैं। रही बात कि दोनों देशों में से हमें किसी एक को जब चुनना होगा तो उस समय हम देखेंगे कि कौन-से देश के साथ हमारा पलड़ा भारी है।
वहीं, भारत के महत्वपूर्ण पड़ोसी देश चीन ने अपनी सरकारी मीडिया के ज़रिए अमेरिकी बमबारी की आलोचना की और कहा कि वॉशिंगटन ने पिछली रणनीतिक ग़लतियों को दोहराने का जोखिम उठाया है। चीन के राष्ट्रीय प्रसारक की अंतरराष्ट्रीय शाखा CGTN ने इस कार्रवाई को "एक ख़तरनाक मोड़" बताया। 2003 के इराक युद्ध का हवाला देते हुए टिप्पणी में कहा गया, "इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि मध्य पूर्व में सैन्य हस्तक्षेप अक्सर अनपेक्षित परिणाम उत्पन्न करते हैं, जिनमें लंबे समय तक संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता शामिल है।"
इसमें कहा गया है कि सशस्त्र संघर्ष पर चर्चा को प्राथमिकता देने वाला एक सुविचारित, कूटनीतिक दृष्टिकोण पश्चिम एशियाई सुरक्षा के लिए सर्वोत्तम आशा प्रदान करता है। इससे पहले, चीन ने राष्ट्रपति ट्रम्प पर इजरायल-ईरान संकट पर “तेल डालने” का आरोप लगाया था। आधिकारिक मीडिया के अनुसार, कुछ दिनों बाद, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सभी पक्षों, “विशेष रूप से इजरायल” से “शत्रुता समाप्त करने” का आग्रह किया।
वहीं, भारत के भरोसेमंद वैश्विक पार्टनर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसराइल और ईरान, दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों से फोन पर बातचीत की है। उनकी चिंता यह है कि जिस तरह से तुर्की के विश्वासघात और अमेरिका के परोक्ष इशारे पर 2024 का अंत सीरिया में रूस समर्थक बशर अल असद की सत्ता के अंत से हुआ, वह अप्रत्याशित है। वाकई सीरिया से बशर अल असद का जाना रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए किसी भी लिहाज से ठीक नहीं था। क्योंकि पश्चिम एशिया में रूस की मज़बूत मौजूदगी के लिए सीरिया में बशर अल असद की सत्ता में मौजूदगी अहम थी, लेकिन पिछले साल दिसंबर में असद को रूस में शरण लेनी पड़ी थी।
चूंकि रूस ख़ुद भी फ़रवरी 2022 से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है। ऐसे में अब ईरान पर इसराइल ने जो हमला किया है, उसे अमेरिका का पूरा समर्थन हासिल है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ईरान में भी सत्ता परिवर्तन होता है, तो पश्चिम एशिया में रूस की बची-खुची मौजूदगी और सिमट जाएगी। यही वजह है कि सीरिया की तरह ईरान भी एक अलग तरह की मुश्किल में है लेकिन रूस उसकी मदद नहीं कर रहा है। ऐसे में रूस को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।
पहला सवाल यह कि रूस ईरान की मदद क्यों नहीं कर रहा है? दूसरा सवाल यह कि अगर ईरान इसराइल से युद्ध हार जाता है तो रूस पर इसका क्या असर पड़ेगा? इस साल की शुरुआत में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के बीच एक रणनीतिक साझेदारी समझौता भी हुआ था, जिसमें सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल है कि रूस का आधिकारिक रुख़ क्या है? तो बता दें कि अब तक रूस ने इसराइल-ईरान युद्ध को लेकर जो रुख़ अपनाया है, वह अपेक्षाकृत संतुलित और सतर्क दिखाई देता है। रूस ईरान पर इसराइली हमले का विरोध कर रहा है लेकिन इसराइल के ख़िलाफ़ कोई मदद नहीं कर रहा है।
एक समाचार एजेंसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, संघर्ष की शुरुआत यानी 13 जून को ही रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसराइल और ईरान, दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों से फोन पर बातचीत की थी। पुतिन ने ईरान के राष्ट्रपति से कहा था कि मॉस्को तेहरान के ख़िलाफ़ इसराइल की कार्रवाई की निंदा करता है। वहीं, इसराइल के प्रधानमंत्री से बात करते हुए उन्होंने यह ज़ोर देकर कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी चिंताओं का समाधान केवल कूटनीति के ज़रिए ही निकाला जा सकता है।
इसके कुछ दिन बाद, रूस की सरकारी न्यूज़ एजेंसी तास ने जानकारी दी कि पुतिन ने संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाहयान से फोन पर चर्चा के दौरान यह भी संकेत दिया कि रूस, इसराइल और ईरान के बीच वार्ता की मध्यस्थता करने के लिए तैयार है। यानी अब तक रूस का रवैया स्पष्ट रूप से यह दिखाता है कि वह इस युद्ध में कूटनीतिक रास्ता अपनाना चाहता है न कि सैन्य हस्तक्षेप। ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर क्या वजह है जो रूस, अपने रणनीतिक सहयोगी ईरान की खुलकर मदद करता नहीं दिख रहा है?
सवाल है कि आखिरकार ईरान को रूस मदद क्यों नहीं कर रहा है? तो जवाब होगा कि इसका सबसे बड़ा कारण है कि रूस ख़ुद यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है और वो अमेरिका के साथ अपने संबंध और नहीं बिगाड़ना चाहता। अगर यूक्रेन युद्ध न होता, तो संभव था कि रूस पूरी तरह से ईरान के साथ खड़ा होता क्योंकि ईरान अब रूस के लिए बहुत अहम सहयोगी देश बन गया है। ख़ासकर सीरिया से रूस के हटने के बाद। दूसरी बात यह है कि रूस को ख़ुद हथियारों की ज़रूरत है, इसलिए वह ईरान को ज़्यादा सैन्य मदद नहीं दे सकता। पहले कुछ हथियार जैसे ड्रोन वगैरह ईरान से रूस को मिले थे लेकिन अब स्थिति उलटी है, ईरान को ही मदद चाहिए।
बता दें कि रूस-यूक्रेन युद्ध में ईरान ने रूस को ड्रोन भी दिए हैं, जो यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध में रूस के लिए अहम साबित हुए हैं। वहीं ईरान के पास आज भी रूस के कुछ हथियार हैं, जैसे S-300 डिफ़ेंस सिस्टम। वहीं, 'एक और वजह यह है कि ट्रंप के साथ रूस की बातचीत चल रही थी और रूस चाहता था कि अमेरिका के साथ बातचीत की गुंजाइश बनी रहे। ऐसे में रूस किसी एक पक्ष में खुलकर आने से बच रहा है। हालांकि, इस युद्ध से रूस के लिए कुछ संभावित फ़ायदों को भी गिनाया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर तेल की वैश्विक क़ीमतों में इजाफे की संभावना, जिससे रूस की आमदनी बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।
वहीं, इजरायल-ईरान युद्ध से रूस को कुछ फ़ायदे भी हैं। जैसे अगर तेल के दाम बढ़ते हैं तो रूस को आर्थिक रूप से फ़ायदा होता है। वहीं, रूस की कोशिश ये भी है कि वो ख़ुद को मध्य-पूर्व में एक पीस मेकर की भूमिका में पेश कर सके। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों से ऐसा लगता है कि वो रूस की इस कोशिश को पूरा करने के मूड में नहीं हैं।वो (ट्रंप) पूरा दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं, जिसमें रूस की मध्यस्थता की कोई जगह नहीं बचती।
इसलिए अगर ईरान इस संघर्ष में कमज़ोर पड़ता है तो रूस को नुक़सान भी है। क्योंकि ईरान कमज़ोर होता है तो अमेरिका और इसराइल पश्चिम एशिया में पूरी तरह हावी हो सकते हैं। ऐसा न तो रूस चाहता है, न चीन, न तुर्की और न ही इस्लामिक देश। भारत के लिए भी यह चिंता का सबब बन सकता है। पिछले छह महीनों में रूस पश्चिम एशिया में अपना एक महत्वपूर्ण साझेदार सीरिया पहले ही खो चुका है। दिसंबर 2024 में जब सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद को सत्ता से हटाया गया, तो रूस ने उन्हें शरण दी थी। अब ईरान-इसराइल के बीच चल रहे संघर्ष में रूस के लिए एक और रणनीतिक सहयोगी को खोने का ख़तरा बना हुआ है।
सवाल है कि शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और ब्रिक्स जैसे संगठन ईरान के समर्थन में सहयोग के लिए आगे क्यों नहीं आ रहे हैं? ईरान तो इन दोनों संगठनों का हिस्सा है।
तो जवाब होगा कि इन संगठनों में सहयोग राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर है, ये कोई सैन्य गठबंधन नहीं हैं। ब्रिक्स में लोकतांत्रिक देश भी हैं, जो पश्चिमी देशों से सीधे टकराव में नहीं आना चाहते। एससीओ ज़रूर ज्यादा एंटी-वेस्ट है, लेकिन यह भी सुरक्षा पर सिर्फ़ बयान देता है, कोई सैन्य कार्रवाई नहीं करता। चूंकि रूस और चीन दोनों अपने पश्चिमी देशों से जुड़े हितों को पूरी तरह से बलि नहीं देना चाहते। ऐसे में अगर अमेरिका रूस पर सेकेंडरी सैंक्शन लगा दे तो भारत और चीन जैसे देश प्रभावित होंगे और रूस की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होगा। इसलिए ये देश केवल बयानबाज़ी तक सीमित हैं। अभी हाल ही में भारत ने इनके साझा बयानों से भी इसलिए खुद को अलग कर लिया था।
सवाल है कि अगर ईरान इस युद्ध में हार जाता है तो इसराइल का पश्चिम एशिया में प्रभाव और बढ़ जाएगा। यह भारत के लिए चिंता की बात नहीं है, लेकिन उसके अंतरराष्ट्रीय सहयोगी रूस के लिए चिंता की बात होगी, क्योंकि सीरिया से उसके समर्थक बशर अल असद पहले ही बाहर हो चुके हैं। फिर ईरान में भी यदि रूस कमजोर हुआ तो रूसी-भारत मित्रता पर इस क्षेत्र में परोक्ष असर पड़ेगा। चूंकि ईरान समर्थित हथियारबंद समूह पहले ही कमज़ोर हो चुके हैं और गाज़ा को इसराइल पहले ही तबाह कर चुका है। इससे वेस्ट बैंक में उसका जो मन होगा, वह करेगा। अगर ईरान कमज़ोर होता है तो पश्चिम एशिया में रूस का बचा-खुचा प्रभाव भी सिमट जाएगा। लेकिन ईरान के कमजोर होने का मतलब चीन के कमजोर होने से भी है, जो भारत के लिए अच्छी बात होगी। क्योंकि अब चीन भी गल्फ़ में अमेरिकी सहयोगियों के तेल पर और अधिक आश्रित हो जाएगा।
इसके अलावा एक सवाल और है कि अगर ईरान कमज़ोर पड़ता है तो क्या 'बहुध्रुवीय दुनिया' की सोच को झटका लगेगा। क्योंकि रूस, भारत समेत कई देश बहुध्रुवीय व्यवस्था वाली दुनिया की बात करते आए हैं। ऐसे में क्या ईरान-इसराइल के बीच का ये संघर्ष इस सोच के लिए झटका है। बता दें कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गत शनिवार, 21 जून 2025 को वाशिंगटन में व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम से भाषण देने के लिए आए और यह घोषणा करके दुनिया को चौंका दिया कि अमेरिकी विमानों ने ईरान के फोर्डो परमाणु संवर्धन संयंत्र, साथ ही नतांज़ और इस्फ़हान सुविधाओं पर हमला किया है।
बाद में, राष्ट्र के नाम चार मिनट के संबोधन में उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरानी परमाणु स्थलों को "पूरी तरह से नष्ट कर दिया।"उन्होंने यह भी धमकी दी कि यदि "शीघ्र शांति नहीं आती है तो" वे इस्लामी देश में और अधिक ठिकानों पर हमला करेंगे। हालांकि, ईरान ने कहा कि अमेरिका द्वारा उसके प्रमुख परमाणु स्थलों पर हमला करने के बाद 'संदूषण के कोई संकेत नहीं मिले हैं। वहीं, ईरान ने अमेरिका को 'अनंत परिणाम' की चेतावनी दी है।
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