यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बन्द किया तो उछलेंगे पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और भारत-चीन-अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं होगी तबाह!
यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बन्द किया तो उछलेंगे पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और भारत-चीन-अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं होगी तबाह!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
ईरान की संसद ने कथित तौर पर अपने तीन परमाणु स्थलों पर अमेरिकी हमलों के बाद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (होर्मुज स्ट्रेट) को बंद करने की मंजूरी दे दी है। अब यह प्रस्ताव ईरानी सुरक्षा संस्था के पास भेजा जाएगा, जहां यदि मंजूरी मिल गई तो ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य पर हमले करते हुए इसे बंद कर सकता है।
और यदि ऐसा हुआ तो तीसरा विश्वयुद्ध भी सम्भाव्य है, जिससे अमेरिका-इजरायल की पेशानी पर बल पड़ेगा। क्योंकि ऐसा करके जहां एक ओर मुस्लिम देश एकजुट होंगे, वहीं दूसरी ओर अमेरिका-भारत जैसे परस्पर विरोधी परन्तु महत्वपूर्ण देश भी अपने पेट्रोलियम हितों की पूर्ति के लिए एक दूसरे के और अधिक करीब आएंगे।
जानकार बताते हैं कि इसी दरम्यान मुस्लिम देशों की एकजुटता की भी परीक्षा होगी और यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि इस बेढंगे निर्णय पर रूस-चीन कितना ईरान का साथ देंगे। क्योंकि इससे न केवल अमेरिका बल्कि भारत और चीन के पेट्रोलियम हित भी प्रभावित होंगे, जबकि पेट्रोलियम पदार्थों के भाव बढ़ने से रूस लाभान्वित होगा। इससे चीन-भारत के आर्थिक विकास को भी झटका लगेगा, क्योंकि इन दोनों देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ने का असर जीवन के हरेक क्षेत्र पर पड़ेगा।
इससे स्पष्ट है कि यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बन्द किया तो पेट्रोलियम पदार्थों के दाम उछलेंगे और भारत-चीन-अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं तबाह होंगी। यह स्थिति रूस के लिए भी फायदेमंद होगी। यही वजह है कि अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि ईरान का होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने का फैसला बड़े नुकसान की वजह बनेगा। जबकि उसे इस बात का सुकून मिलना चाहिए कि अब तेल की बढ़ती कीमतों से भारत-चीन दोनों परेशान होंगे। लेकिन अमेरिका इसलिए चिंतित है कि उसकी कई तेल कम्पनियां और उसके समर्थक ओपेक देशों की तैलीय अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी।
उल्लेखनीय है कि रुबियो ने ईरानी संसद के होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की मंजूरी देने से जुड़ी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे 'आर्थिक आत्महत्या' बताया है। साथ ही उन्होंने चीन से भी ईरान को ऐसा करने से रोकने का आग्रह किया है। सनद रहे कि अमेरिकी हवाई हमलों के जवाब में ईरान की संसद ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का प्रस्ताव पास किया है। अब यह प्रस्ताव ईरानी सुरक्षा संस्था के पास भेजा जाएगा। इसके बाद ईरान ने जलडमरूमध्य पर हमले करते हुए बंद कर सकता है।
यही वजह है कि एक टीवी न्यूज के कार्यक्रम में रुबियो ने ईरान के होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से जुड़ी खबरों पर जवाब देते हुए कहा कि, 'मैं चीनी सरकार से कहूंगा कि वो ईरान को ऐसा ना करने के लिए मनाए क्योंकि वे अपने तेल के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर बहुत निर्भर हैं।' उन्होंने कहा कि ईरान का ये फैसला भयानक गलती और आर्थिक आत्महत्या जैसा होगा। रुबियो ने चेतावनी दी कि जलडमरूमध्य को बंद करने से संघर्ष बढ़ेगा क्योंकि अमेरिका और अन्य देश इस पर प्रतिक्रिया देंगे।
वहीं, ईरान के विदेश मंत्रालय ने गत रविवार को एक बयान में कहा है कि ईरान क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा बनाए रखने के लिए दृढ़ है। मंत्रालय के प्रवक्ता नासिर कनानी ने कहा कि ईरान अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार जहाजों के सुरक्षित मार्ग के अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए दृढ़ है। होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और उसके अरब खाड़ी के पड़ोसियों के बीच स्थित है। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा दैनिक परिवहन करने में सक्षम बनाता है।
बताया जाता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य खाड़ी देशों से कच्चे तेल और गैस के परिवहन के लिए महत्वपूर्ण है। इस जलडमरूमध्य से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल और तेल उत्पादों की खेप गुजरती है। ओपेक के सदस्य सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक एशियाई देशों को अपने अधिकांश कच्चे तेल का निर्यात इसी जलडमरूमध्य के माध्यम से करते हैं। ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कता है तो इससे तेल और गैस की कीमतें बढ़ जाएंगी।
गौरतलब है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना एक गंभीर विकल्प होगा, जिससे दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। हालांकि इससे नुकसान ईऱान को भी होगा, क्योंकि ईऱान का तेल भी इसी रास्ते से निकलता है, जिसका बड़ा खरीदार चीन है। स्वाभाविक है कि ईरान के फैसले से अमेरिका परेशान हुआ है। अमेरिका के विदेश मंत्री रूबियों का तर्क है कि इससे चीन को भी नुकसान होगा क्योंकि चीन की ऊर्जा आपूर्ति भी इसी मार्ग से होती है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ बताते हैं कि अभी तक के इतिहास में ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को कभी भी पूरी तरह से अवरुद्ध नहीं किया है। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान भी इसे ईरान ने इस मार्ग में बाधा नहीं डाली, क्योंकि ईऱान भी इसका उपयोग करता है। लेकिन ईऱान ने इस बार कठोर कदम उठाया तो इसका सीधा नुकसान खाड़ी के कई देशों के साथ अमेरिकी तेल कॉरपोरेशनों को होगा, जिनका मध्य-पूर्व में खासे व्यापारिक हित है।
दरसअल अमेरिका ने कुछ स्थिति इस तरह की बना दी है कि ईऱान कम से कम दिखाने के लिए सख्त कार्रवाई करेगा। क्योंकि उसे पता है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य अगर बंद किया गया तो इससे भारत को अच्छा खासा नुकसान होगा। इससे बचने के लिए वह अमेरिकी कैम्प जॉइंन कर सकता है, अन्यथा उसकी आर्थिक बर्बादी भी अमेरिका, जापान, जर्मनी, इंग्लैंड जैसे उसके आर्थिक प्रतिस्पर्धी देशों के लिए किसी जश्न सरीखे होगी।
आंकड़े बताते हैं कि 2024 में इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाला 84 प्रतिशत कच्चा तेल और 83 प्रतिशत एलएनजी एशियाई देशों में गया। इसमें से भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया प्रमुख देश हैं। हालांकि, भारत विकल्प के तौर पर रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी तेल खरीद रहा है, लेकिन खाड़ी देशों से निकटता के कारण भारत का आयात लागत काफी कम होता है। यही वजह है कि यदि इस जलमार्ग में बाधा आयी, तो भारत में तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी होगी, क्योंकि भारतीय कंटेनरों के बीमा और शिपिंग खर्च भी बढ़ेंगे। इसका सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। वहीं, इस रास्ते के बंद होने पर चीन भी अऩ्य विकल्पों से तेल खरीदेगा। जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि वैश्विक मांग संतुलन खराब होगा। इससे भारत में तेल महंगा होगा।
बता दें कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे इसे अरब सागर से जोड़ता है। यह ईरान और ओमान के बीच स्थित है, जो सऊदी अरब, ईरान, और संयुक्त अरब अमीरात जैसे बड़े तेल निर्यातक देशों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है। इसका सबसे संकरा हिस्सा महज 33 किलोमीटर चौड़ा है, और जहाजों की आवाजाही के लिए केवल 3-3 किलोमीटर चौड़ी दो धाराएं हैं। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के टैंकरों के लिए पर्याप्त गहरा है और इसका उपयोग पश्चिम एशिया के प्रमुख तेल और गैस उत्पादकों और उनके ग्राहकों द्वारा किया जाता है। ईरान इस मार्ग को अवरूद्व करने के लिए मिसाइल या बम से हमला कर सकता है, गुजरने वाले जहाजों को जब्त कर सकता है, बारूद बिछा सकता है।
वहीं, कुछ अन्य कूटनीतिक पंडित बताते हैं कि भारतीय विदेश नीति इस समय दिग्भ्रमित (कन्फ्यूज) है। इसका असर भारत के भविष्य पर पड़ेगा। देखा जाए तो अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों से चीन नहीं डरा, लेकिन भारत डर गया। अमेरिकी प्रभाव में भारत ने ईऱान से तेल आयात बंद कर दिया, लेकिन चीन ईरान से सस्ता तेल ले रहा है। यह स्थिति तब है जबकि ईऱान इंटरनेशनल नार्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर में ईरान भारत की अहम भूमिका को स्वीकार करता है। वहीं, ईऱान भारत का एक बड़ा बासमती चावल आयातक देश भी है। इसलिए ईऱान-इजरायल युद्व से भारत के बासमती निर्यातक परेशान है। क्योंकि ईऱान को जाने वाला बासमती निर्यात इस समय गुजरात के बंदरगाह पर अटक गया है।
वहीं, अफगानिस्तान में पिछले बीस सालों में पाकिस्तान ने भारत को बाहर करने की हर चाल चली, लेकिन अफगानिस्तान की धरती पर ईऱान ने अपने प्रॉक्सी के माध्यम से हमेशा भारत को सहयोग किया। वहीं, अफगानिस्तान तक भारत को पहुंचने का रास्ता आज भी ईरान ही दे रहा है। गौरतलब है कि जब अमेरिका तालिबान से शांति वार्ता कर रहा था तो उसने भारत को शांति वार्ता में आमंत्रण तक नहीं भेजा था, क्योंकि इस पर पाकिस्तान को आपति थी। वहीं, परिवर्तित हालात में चीन जब तालिबान से शांति वार्ता कर रहा था तो उसने भारत को शांति वार्ता में आमंत्रण तक नहीं भेजा था, क्योंकि इस पर पाकिस्तान को आपति थी। इसलिए भारत हमेशा सिक्के के दोनों पहलुओं पर गौर करके ही निर्णय लेता है और यही वजह है कि उसकी गुटनिरपेक्षता अभी तक की हिट नीति समझी जाती है।
कुछ यही वजह है कि अमेरिका ने फिर ईरान को चेतावनी दी है कि वह 'शांति या त्रासदी' में से कोई एक विकल्प चुन लें, अन्यथा अंजाम और भी बुरे होंगे। सच कहूं तो अमेरिका प्रोत्साहित आतंकवाद के समानांतर रूस-चीन-ईरान-उत्तरकोरिया प्रोत्साहित आतंकवाद को प्रश्रय देने के खिलाफ अब अमेरिका खुद सजग हुआ है और आतंकवाद पीड़ित इजरायल के समर्थन में आतंकवाद पैदा करने की फैक्ट्री बन चुके ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ उसने जो ऐतिहासिक कार्रवाई की है, उसके लिए ट्रंफ प्रशासन की जितनी सराहना की जाए, वह कम है।
ऐसा करके उन्होंने रूस को स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि तुम भी आतंकवाद पीड़ित रूस के वास्तविक शुभचिंतक हो तो
ईरान के ही पड़ोस में आतंकवाद पैदा करने की दूसरी फैक्ट्री बन चुके पाकिस्तान (अमेरिका/चीन समर्थित) के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ जबर्दस्त कार्रवाई करो या फिर ऐसा करने की इच्छा रखने वाले इजरायल-भारत की मदद करो। दरअसल, यह कोई व्यंग्यात्मक वाक्य नहीं बल्कि ईरान पर अमेरिकी हमले का परोक्ष संदेश है, जिस पर निकट भविष्य में अमेरिका भी कार्रवाई कर सकता है, यदि चीन के इशारे पर पाकिस्तान उसके खिलाफ दोहरी चालें चलता रहा तो। भारत-इजरायल सम्बन्ध के लिए इससे अच्छी स्थिति कुछ और हो ही नहीं सकती है।
इससे ग्रेटर इजरायल और ग्रेटर इंडिया का स्वप्न भी बहुत जल्दी पूरा हो जाएगा, यदि अमेरिका के खिलाफ 56 मुस्लिम देश एकजुट हो गए तो। शायद भारत-इजरायल की प्रगाढ़ दोस्ती का एक गुप्त उद्देश्य यह भी है, क्योंकि दुनिया के दो प्राचीन धर्म यानी हिन्दू धर्म और यहूदी धर्म को कुचलने के लिए जिस प्रकार से इस्लाम धर्मावलंबियों के द्वारा आतंकवादी व हिंसात्मक साजिशें रची जा रही हैं, उसका निर्णायक अंजाम भी ग्रेटर इजरायल और ग्रेटर इंडिया के सपने को पूरा करेगा। यह स्थिति रूस-चीन के लिए भी थोड़ी कष्टकारी हो सकती है, लेकिन अमेरिका की तरह ये दोनों देश भी समय रहते ही यदि पलटमार आतंकवादियों का समर्थन बन्द नहीं किए तो उनकी भी बड़ी दुर्गति होगी। लोहे को लोहे से काटने की उनकी रणनीति उन पर ही भारी पड़ेगी, अमेरिका की तरह। हालांकि सभी बाहुबली देश इसी मुगालते में हैं कि समरथ को नहिं दोष गोसाईं।
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