पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी दबदबा बढ़ने के वैश्विक मायने
पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी दबदबा बढ़ने के वैश्विक मायने
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एशिया, यूरोप और अफ्रीका महादेश में अमेरिकी साम्राज्यवाद को मिलती मजबूत चुनौती के बाद अब पुनः उसने पश्चिमी गोलार्द्ध यानी उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के देशों में खुद को मजबूत बनाने का पुनः निश्चय किया है। यह अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ की दूरदर्शिता और इतिहास से सबक, दोनों माना जा रहा है। शायद इसलिए उन्होंने बेनेज़ुएला, क्यूबा, मेक्सिको, कनाडा, ब्राजील आदि की नकेल कसनी शुरू की और ग्रीनलैंड को पुनः पाने की वैश्विक महत्वाकांक्षा प्रदर्शित की। चूंकि ट्रंफ एक कुशल व्यवसायी भी हैं, इसलिए उनकी रणनीति अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों के लिए अब भी एक पहेली बनी हुई है। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने जिस तरह से रूस, चीन और भारत समर्थकों को निशाने पर लेना शुरू किया है, वह उनकी साहसिक पहल समझी जा सकती है। इसलिए अब यहां तक कहा जाने लगा है कि ट्रंफ ने डीप स्टेट के सामने घुटने टेक दिए हैं, ताकि मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का उनका स्वप्न साकार हो सके।
बताते चलें कि पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी दबदबा ऐतिहासिक रूप से मोनरो सिद्धांत (1823) से जुड़ा है, जो यूरोपीय शक्तियों के हस्तक्षेप को रोकने और अमेरिकी महाद्वीपों को अमेरिका का विशेष प्रभाव क्षेत्र घोषित करता है। हाल के घटनाक्रमों में, ट्रंप प्रशासन ने वेनेज़ुएला पर सैन्य कार्रवाई (जनवरी 2026) के जरिए इस दबदबे को पुनर्जनन दिया, जिसे "डॉनरो सिद्धांत" कहा जा रहा है। वैश्विक स्तर पर इसका मतलब चीन और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वियों को लैटिन अमेरिका से दूर रखना है, जिससे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर दबाव पड़ रहा है।
आइए सबसे पहले यह जानते हैं कि आखिर पश्चिमी गोलार्द्ध की परिभाषा क्या है? तो यह जान लीजिए कि पश्चिमी गोलार्द्ध में उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका (कनाडा से चिली तक) शामिल हैं। अमेरिका इसे अपना विशेष क्षेत्र मानता है, जहां बाहरी शक्तियों का कोई दखल स्वीकार्य नहीं। हालिया अमेरिकी कार्रवाई से पुनः यह बात स्पष्ट हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र में राजदूत माइक वाल्ट्ज ने वेनेज़ुएला ऑपरेशन का बचाव करते हुए कहा कि यह क्षेत्र अमेरिकी दुश्मनों के लिए बेस नहीं बनेगा। ट्रंप ने मादुरो को हिरासत में लेने वाले हमलों से इस नीति को लागू किया।
इससे अमेरिका का वैश्विक प्रभाव बढ़ेगा, क्योंकि यह दबदबा वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करता है। चूंकि अमेरिका अब एशिया जैसे अन्य क्षेत्रों पर कम फोकस कर रहा है। क्योंकि इससे रूस-चीन के साथ उसका तनाव बढ़ा और लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभुत्व मजबूत हुआ। उसकी यह नीति वैश्विक शक्ति संतुलन को बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर धकेल रही है, क्योंकि अमेरिका पश्चिमी गोलार्द्ध पर फोकस करके एशिया-यूरोप जैसे क्षेत्रों में अपनी प्रतिबद्धताओं को कम कर रहा है। इससे चीन और रूस को लैटिन अमेरिका में सीमित रहने पर मजबूर किया जा रहा है, लेकिन अमेरिकी सहयोगी अनिश्चित हो रहे हैं।
जहां तक बहुध्रुवीयता को बढ़ावा देने की बात है तो अमेरिका की क्षेत्रीय प्राथमिकता से एकध्रुवीयता समाप्त हो रही है, और क्षेत्रीय शक्तियां (जैसे भारत) मुद्दा-आधारित गठबंधनों से उभर रही हैं। इससे वैश्विक दक्षिण के लिए अवसर बढ़े हैं, लेकिन कमजोर राष्ट्रों पर असर भारी पड़ेगा। जहां तक प्रतिद्वंद्वियों पर प्रभाव की बात है तो वेनेज़ुएला जैसे मामलों में चीन-रूस के प्रभाव क्षेत्र को चुनौती मिली है, जिससे शक्ति संतुलन में नई प्रतिस्पर्धा जन्म ले रही है। वहीं, रूस 'स्विंग पावर' बन सकता है, जबकि चीन एशिया में मजबूत होगा। जहां तक सहयोगियों की दुविधा की बात है तो यूरोप और एशियाई साझेदार अब अमेरिका पर कम भरोसा करेंगे, जिससे नए विकल्प तलाशने पड़ेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।
जहां तक पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका के इतिहास की बात है तो यह मूल रूप में अमेरिकी सभ्यताओं से शुरू होता है, जो यूरोपीय उपनिवेशवाद के बाद तेजी से बदला। 1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज के बाद स्पेन, ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड्स ने उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट पर उपनिवेश स्थापित किए, जो 18वीं सदी तक 13 ब्रिटिश कॉलोनियों में बदल गए। जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति यानी 1775-1783 के अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में 13 कॉलोनियों ने ब्रिटेन से विद्रोह किया, जिसके फलस्वरूप 4 जुलाई 1776 को स्वतंत्रता उद्घोष जारी हुआ। जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में योद्धाओं ने यॉर्कटाउन में ब्रिटिश सेना को हराया, और 1783 की संधि से अमेरिका को पूर्वी उत्तरी अमेरिका पर स्वतंत्रता मिली। ततपश्चात यह विश्व का पहला लिखित संविधान वाला गणतंत्र बना।
जहां तक पश्चिमी विस्तार की बात है तो 19वीं सदी में अमेरिका ने "मेनिफेस्ट डेस्टिनी" नीति अपनाई, जिससे पश्चिम की ओर विस्तार हुआ। 1803 के लुइसियाना खरीद से मिसिसिपी नदी तक क्षेत्र मिला, 1846 की ओरेगन संधि से उत्तर-पश्चिम, और 1848 के मेक्सिकन युद्ध से कैलिफोर्निया व दक्षिण-पश्चिम प्राप्त हुआ। इस दौरान मूल निवासियों पर युद्ध चले, जिन्हें भूमि से विस्थापित किया गया। फिर गृहयुद्ध और औद्योगीकरण से अमेरिका मजबूत बना। क्योंकि 1861-1865 के गृहयुद्ध में उत्तरी राज्य (यूनियन) ने दासता विरोधी नीति अपनाई और दक्षिणी कन्फेडरेट को हराया, जिससे राष्ट्र एकीकृत हुआ। उसके बाद औद्योगिक क्रांति ने अमेरिका को आर्थिक महाशक्ति बनाया, रेलवे और फैक्टरियों से वृद्धि हुई।
इस प्रकार एक विश्व शक्ति के रूप में अमेरिका का उदय हुआ। क्योंकि 20वीं सदी में प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों में अमेरिका की बढ़ी हुई बड़ी भूमिका ने इसे पश्चिमी गोलार्ध का प्रमुख राष्ट्र बनाया। मोनरो सिद्धांत (1823) ने यूरोपीय हस्तक्षेप रोका, जबकि लैटिन अमेरिका पर प्रभाव बढ़ा। आज यह आर्थिक, सैन्य और सांस्कृतिक रूप से प्रभुत्व रखता है। अमेरिका के विश्व शक्ति बनने के प्रमुख कारणों में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की आर्थिक उन्नति, सैन्य श्रेष्ठता और तकनीकी नवाचार शामिल हैं। यूरोप और एशिया की तबाही के बीच अमेरिका सुरक्षित रहा, जिससे उसकी औद्योगिक क्षमता बढ़ी। इसके अलावा प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और डॉलर की वैश्विक मुद्रा के रूप में प्रधानता ने इसे मजबूत बनाया।
जहां तक आर्थिक प्रभुत्व की बात है तो द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने हथियार और सामग्री उत्पादन से अपार धन अर्जित किया, जबकि अन्य राष्ट्र कमजोर हो गए। मास्टर प्लान जैसे लीज-लीज एक्ट और मार्शल प्लान ने यूरोप को पुनर्निर्माण में सहायता दी, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था को वैश्विक व्यापार का केंद्र बनाया। विश्व बैंक, आईएमएफ और जीएटीटी जैसी संस्थाओं की स्थापना में नेतृत्व ने डॉलर को प्रमुख मुद्रा स्थापित किया।
जहां तक सैन्य विस्तार की बात है तो अमेरिका की विशाल भौगोलिक स्थिति ने इसे दो महासागरों से सुरक्षा प्रदान की, जिससे संसाधनों को आक्रामक विस्तार पर केंद्रित किया जा सका। नाटो गठबंधन, 800 से अधिक विदेशी सैन्य अड्डे और परमाणु हथियारों ने सैन्य श्रेष्ठता सुनिश्चित की। स्पैनिश-अमेरिकी युद्ध (1898) से फिलीपींस और क्यूबा जैसे क्षेत्र प्राप्त हुए, जो वैश्विक प्रभाव की नींव बने।
जहां तक तकनीकी नेतृत्व की बात है तो औद्योगिक क्रांति से स्टीम इंजन, रेलवे और फैक्टरियां बनीं, जबकि सिलिकॉन वैली ने आईटी क्रांति लाई। अपोलो मिशन से चांद पर पहुंच और नासा-स्पेसएक्स जैसे कार्यक्रमों ने अंतरिक्ष में वर्चस्व स्थापित किया। सांस्कृतिक निर्यात जैसे हॉलीवुड ने सॉफ्ट पावर बढ़ाया। इस प्रकार से अमेरिका की औद्योगिक क्रांति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को आधुनिक रूप प्रदान किया, उत्पादन क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि लाई। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में यह दूसरी औद्योगिक क्रांति के रूप में उभरी, जिसने मशीनों, बिजली और स्टील उत्पादन को बढ़ावा दिया।
इससे अमेरिका का आर्थिक प्रभाव बढ़ा। क्योंकि इस क्रांति ने अमेरिका को विश्व का प्रमुख औद्योगिक केंद्र बनाया, जिससे निर्यात बढ़ा और यूरोपीय देशों पर निर्भरता घटी। रेलवे, ऑटोमोबाइल और तेल उद्योगों का विकास हुआ, जो वैश्विक व्यापार को गति प्रदान करने वाले साबित हुए। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अमेरिकी उत्पादों का प्रभुत्व स्थापित हुआ, जिससे आर्थिक साम्राज्यवाद का युग शुरू हुआ।
वहीं, अमेरिका में सामाजिक परिवर्तन भी आया। जिससे शहरीकरण तेज हुआ, लाखों लोग खेतों से कारखानों की ओर पलायन कर गए, जिसका प्रभाव यूरोप और एशिया तक फैला। नए सामाजिक वर्ग जैसे पूंजीपति और मजदूर उभरे, श्रमिक आंदोलनों ने वैश्विक स्तर पर यूनियनवाद को प्रेरित किया। इससे वैश्विक प्रवास की लहर चली, जो आधुनिक समाज की नींव बनी।
इसी प्रकार अमेरिका में तकनीकी प्रसार बढ़ा। खासकर स्टीम इंजन, बिजली और टेलीफोन जैसे आविष्कारों ने अन्य देशों में औद्योगीकरण को प्रेरित किया। प्रथम विश्व युद्ध तक अमेरिका ने प्रौद्योगिकी निर्यात से वैश्विक नेतृत्व हासिल किया, जो आज तकनीकी क्रांति का आधार बना हुआ है। पर्यावरणीय प्रभाव जैसे प्रदूषण भी वैश्विक समस्या के रूप में उभरे।
# ट्रंप प्रशासन की पश्चिमी गोलार्द्ध-केंद्रित नीति भारत के लिए हिंद-प्रशांत में स्वतंत्रता बढ़ाने का देती है अवसर
यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन की पश्चिमी गोलार्द्ध-केंद्रित नीति भारत के लिए हिंद-प्रशांत में स्वतंत्रता बढ़ाने का अवसर देती है, क्योंकि अमेरिका एशिया में कम फोकस करेगा। साथ ही, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग मजबूत हो सकता है, लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। भारत के लिए यह एक रणनीतिक अवसर है। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के विरुद्ध भारत की भूमिका मजबूत हो सकती है, क्योंकि अमेरिका लैटिन अमेरिका पर केंद्रित रहेगा। ततपश्चात रक्षा, साइबर सुरक्षा और प्रौद्योगिकी में सहयोग बढ़ेगा, जिससे भारत वैश्विक नवाचार में योगदान दे सकेगा। वहीं, वैश्विक दक्षिण में भारत की नेतृत्व भूमिका उभरेगी, अमेरिकी वर्चस्व कम होने से।
हालांकि इस राह की कुछ प्रमुख चुनौतियाँ भी हैं। खासकर अमेरिका भारत-रूस संबंधों पर दबाव डालेगा, जो भारत की स्वायत्त विदेश नीति को प्रभावित करेगा। कि
वहीं, व्यापार टैरिफ और डेटा गोपनीयता जैसे मुद्दों से आर्थिक तनाव बढ़ सकता है। जबकि क्षेत्रीय गठबंधनों में भारत को 'फ्रंटलाइन स्टेट' बनने का जोखिम, बिना पूर्ण समर्थन के बना रहेगा। इसलिए भारत को उसकी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए बहु-अक्षीय कूटनीति अपनानी होगी, जो अमेरिका के साथ सहयोग को जारी रखते हुए रूस, ईरान जैसे पार्टनरों से संतुलन बनाए।
वहीं, हिंद-प्रशांत में क्वाड (QUAD) जैसे मंचों का उपयोग करें, लेकिन क्षेत्रीय स्वायत्तता सुनिश्चित करें। इस हेतु आर्थिक आत्मनिर्भरता और सैन्य आधुनिकीकरण से बाहरी दबाव कम होगा। वहीं बहु-अक्षीय कूटनीति के तहत रूस से ऊर्जा-सैन्य सहयोग जारी रखें, अमेरिकी दबाव के बावजूद। साथ ही, ब्रिक्स और जी-बीस (G-20) जैसे मंचों से वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व मजबूत करें। खासकर ईरान-मध्य पूर्व से संतुलन बनाएं। इसके लिए भारत को कतिपय आर्थिक व सैन्य उपाय भी करने होंगे। आत्मनिर्भर भारत से आयात निर्भरता घटाएं, विशेषकर रक्षा में। QUAD और I2U2 में सामरिक लाभ लें, लेकिन बंधनकारी न हों। साइबर-डिजिटल क्षमता विकसित करें। वैश्विक भूमिका बढ़ाएं।खासकर जलवायु, व्यापार जैसे मुद्दों पर स्वतंत्र आवाज बुलंद करें। संयुक्त राष्ट्र सुधारों में सक्रिय रहें।
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