पूंजीवाद के राष्ट्रवादी ढकोसले को समझिए और वामपंथी भारत की जमीन तलाशिए

पूंजीवाद के राष्ट्रवादी ढकोसले को समझिए और वामपंथी भारत की जमीन तलाशिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत आज पश्चिमी लोकतंत्र और पूंजीवादी ताकतों का सहज शिकार बन चुका है, जिससे वास्तविक भारतीयता खतरे में है। दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः की राह दिखाने वाला भारत और भारतीय उपमहाद्वीप आज जातीय-क्षेत्रीय संघर्षों और साम्प्रदायिक-भाषाई उन्मादों की भूमि के रूप में तब्दील किया जा चुका है। 

वास्तव में ये यूरोपीय, अमेरिकी, अफ्रीकी समाज की खामियां-कमजोरियां हैं जो भारतीय उपमहाद्वीप में यूरोपीय धर्मयुद्ध के फलस्वरूप उससे सटे पश्चिमी, उत्तरी और मध्य एशियाई आक्रांताओं के प्रभाव वश आईं और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पसर गईं। बाद में यही विभाजनकारी सोच यूरोपीय औपनिवेशिक शासनकाल का हथियार बन गईं और अपने हित के अनुकूल उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप को वर्मा (म्यांमार), तिब्बत (चीन), अफगानिस्तान, नेपाल, पाकिस्तान आदि टुकड़ों में बांट दिया, ताकि इनकी आपसी सहिष्णुता कमजोर हो और यूरोप की तरह यह भूभाग भी हमेशा संघर्षरत रहकर उनके लिए दूधारू बना रहे।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि पूंजीवाद समर्थक कांग्रेस और भाजपा ने उन्हीं विदेशी टूल्स पर देशी सियासत चमकाई, जिससे भारत पड़ोसी युद्धों, क्षद्म आतंकवाद, नक्सलवाद और जातीय आपराधिक सरगनाओं के अघोषित राज में डूबता उतराता रहा। इससे यहां की एक बड़ी आबादी दलित व पिछड़ी बनी रहे। उनको बरगलाए रखने के लिए जिस फर्जी मनुवादी विचारधारा का ईजाद किया गया, उसका एकमात्र उद्देश्य प्राकृतिक प्रेम और त्याग आधारित ब्राह्मणवाद को कमजोर करना और लाभ-लोभ आधारित बनियावाद को मजबूत करना है। इसके लिए जातिवाद और सम्प्रदायिकता को एक मजबूत पूंजीवादी टूल्स के तौर पर विकसित किया गया। यह भारत के लिए आत्मघाती साबित हुआ। इससे पूर्व वर्गवादी चरित्र वाले वामपंथ का देश-दुनिया में गला घोंटा गया।

वाकई राष्ट्रवाद को मार्क्सवादी-समाजवादी परंपरा में अक्सर एक बूर्ज़्वा (पूँजीपति वर्ग की) विचारधारा कहा गया है, जो वर्गीय शोषण से ध्यान हटाकर जातीय‑सांप्रदायिक पहचान पर झूठी एकता गढ़ती है। ऐसा इसलिए कि पूँजीवाद और राष्ट्रवाद का बुनियादी रिश्ता यही है जो उनकी रणनीति को धार देता आया है। कहना न होगा कि आधुनिक राष्ट्र‑राज्य और राष्ट्रवाद का उभार भी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ साथ ही हुआ; इसलिए कई सिद्धांतकार इसे पूँजीवादी अर्थतंत्र की ऐतिहासिक उपज मानते हैं। दरअसल, राष्ट्रवाद “राष्ट्र” को एक समान सांस्कृतिक‑राजनीतिक इकाई मानकर प्रस्तुत करता है, जबकि पूँजीवादी समाज में असली विभाजन वर्गीय, जातीय और लैंगिक हैं। 

सवाल है कि आखिर “पूँजीवादी छलावा” कैसे काम करता है? तो मार्क्सवादी व्याख्या में राष्ट्रवाद प्रभुत्वशाली वर्गों को एकजुट करके राजनीतिक समुदाय की एक भ्रांत (illusory) एकता पैदा करता है, ताकि मजदूर‑किसान और गरीब तबके स्वयं को उन्हीं पूँजीपतियों के साथ एक पक्ष मानें जो उनका शोषण करते हैं: और फिर यही भ्रांति मजदूर वर्ग की वर्ग‑चेतना को दबाती है। चूंकि जनशोषण का मूल कारण पूँजीवादी संबंध हैं, लेकिन इससे ध्यान हटाने के लिए “विदेशी दुश्मन”, “राष्ट्र की सुरक्षा”, “हमारा धर्म, हमारी जाति और हमारी संस्कृति” जैसे नारों की तरफ मोड़ दिया जाता है। 

इसका एक स्पष्ट उदाहरण है, वह यह कि जब आर्थिक संकट या बेरोज़गारी बढ़ती है तो पूँजीवादी व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय प्रवासी, अल्पसंख्यक या किसी दूसरे देश को दोषी ठहराया जाता है; इससे पूँजीपतियों की नीतियाँ लगभग अछूती रह जाती हैं। इसप्रकार, राष्ट्रवाद, जातीय‑सांप्रदायिक विभाजन को मजबूत करने की एक प्रक्रिया मात्र है। जबकिं राष्ट्रवाद खुद एक “राजनीतिक जातीयता” है, जिसमें कोई सांस्कृतिक समूह अपने लिए राष्ट्र‑राज्य बनाने या उसे मजबूत करने का दावा करता है; जो अक्सर अन्य जातीय‑धार्मिक समूहों के बहिष्कार पर टिका रहता है। इसलिए इतिहास में उग्र राष्ट्रवाद ने साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और जातीय सफ़ाये जैसी प्रक्रियाओं को जन्म दिया; उदाहरण के तौर पर जर्मनी में संकीर्ण राष्ट्रीयता से प्रेरित यहूदियों पर अत्याचार को देखा जा सकता है।

दरअसल, पूँजीवादी समाजों में सामाजिक‑आर्थिक stratification (ऊँच‑नीच) अक्सर जातीय stratification के रूप में भी दिखाई देती है; यानी जो जातीय‑धार्मिक समूह पहले से हाशिये पर हैं, वही आर्थिक रूप से सबसे नीचे धकेले जाते हैं। वाकई जाति/जातीयता और सस्ता श्रम के नाम पर एक ताज़ा आलोचनात्मक दृष्टिकोण आया है जो पूँजीवाद को “संचय की प्रणाली” के रूप में देखता है, क्योंकि यह पहले से मौजूद सामाजिक पदानुक्रमों (जाति, नस्ल, प्रवासी‑स्थिति) को पकड़कर सस्ते श्रम के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करती है। 

इस नजरिए से जहां अटलांटिक दुनिया में यह पदानुक्रम "रेस" (race) था, वहीं भारत में “जाति”, खाड़ी देशों में “प्रवासी” और “नागरिक” का फर्क कायम करवाए गए; यानी पूँजीवाद उन विभाजनों को खत्म नहीं करता, बल्कि उन्हें अपने मुनाफ़े के लिए कार्यकारी बना देता है। इसलिए जब राष्ट्रवाद इन विभाजनों को “राष्ट्र की असली पहचान” के रूप में गौरवशाली बनाता है, तो जाति‑आधारित या सांप्रदायिक असमानताएँ नैतिक‑सांस्कृतिक वैधता पा जाती हैं, और उनका आर्थिक उपयोग आसान हो जाता है।

ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि क्या हर राष्ट्रवाद सिर्फ छलावा है? तो जवाब होगा कि अकसर वंचित समाजों का विरोधी-औपनिवेशिक राष्ट्रवाद औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रगतिशील राजनीतिक उपकरण भी रहा है, जैसा कि कई इतिहासकारों ने दिखाया है। बतौर आलोचना मुख्यतः उस राष्ट्रवाद की होती है जो पूँजीवादी ढांचे को चुनौती देने के बजाय उसे “राष्ट्र हित” के नाम पर और मजबूत करता है, तथा वर्गीय और संरचनात्मक शोषण की जगह जातीय‑सांप्रदायिक घृणा को केंद्र में ले आता है। 

दरअसल, मार्क्सवाद में राष्ट्रवाद को मुख्यतः बुर्जुआ विचारधारा माना जाता है, जिसका विकल्प अंतर्राष्ट्रीयतावाद (internationalism) और वर्ग संघर्ष की वैश्विक एकजुटता है। यह "workers of the world, unite!" के सिद्धांत पर टिका है, जो जातीय-सांप्रदायिक सीमाओं को पार कर शोषित वर्गों को एकजुट करता है।

आइए इसके मुख्य विकल्प को समझते हैं, वो भी प्रोलेटेरियत अंतर्राष्ट्रीयवाद के आधार पर। देखा जाए तो मार्क्स और एंगेल्स ने राष्ट्रवाद को पूंजीवाद की उपज बताया, जबकि असली एकता मजदूर वर्ग की वैश्विक एकजुटता में है; राष्ट्र सीमाएँ पूंजीपतियों के हित साधती हैं, न कि शोषितों के। कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में स्पष्ट है कि राष्ट्रवाद मजदूरों को बाँटता है, जबकि अंतर्राष्ट्रीयवाद पूंजीवाद के खिलाफ वैश्विक क्रांति का आधार बनता है।

चूंकि वामपंथ राष्ट्रीय मुक्ति के संदर्भ में लचीलापन दिखलाता है, इसलिए लेनिन ने औपनिवेशिक देशों में "राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार" को स्वीकार किया, लेकिन इसे वर्ग संघर्ष से जोड़कर; यानी राष्ट्रीय मुक्ति को समाजवादी क्रांति की सीढ़ी बनाया। खासकर उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों (जैसे भारत में) में मार्क्सवाद ने राष्ट्रवाद को अस्थायी सहयोगी माना, लेकिन अंतिम लक्ष्य समाजवादी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को ठहराया, जो कि आज भी अधूरा है।

जहां तक आधुनिक संदर्भ और वामपंथी आलोचनाओं की बात है तो सोवियत संघ या चीन जैसे प्रयोगों में "समाजवादी देशवाद" उभरा, लेकिन शुद्ध मार्क्सवाद इसे विचलन मानता है; क्योंकि वामपंथी विकल्प हमेशा वैश्विक मजदूर एकता रहता है। आज के वैश्विक पूंजीवाद में विकल्प "ट्रांसनेशनल सॉलिडैरिटी" है, जहाँ प्रवासी मजदूर, किसान और अल्पसंख्यक वर्गीय मुद्दों पर एकजुट होते हैं। 

वास्तव में, मार्क्सवाद राष्ट्रवाद को पार करने का रास्ता वर्ग-आधारित वैश्विक एकता में देखता है, जो जातीय विभाजनों को कमजोर करता है। भारतीय संदर्भ में इसे आर्य समाज या द्रविड़ आंदोलनों से जोड़कर देखा जा सकता है, जहाँ वर्ग चेतना ने सांप्रदायिकता को चुनौती दी। हालांकि
भारत में कांग्रेस के बाद भाजपा भी अब जाति‑व्यवस्था और हिंदू‑मुस्लिम ध्रुवीकरण को कॉरपोरेट पूँजी के संरक्षण ठोस उपायों के साथ देख रही है, इसलिए दोनों  मिलजुलकर बनावटी तर्क गढ़ती हैं, जिससे भारत के दलितों, पिछड़ों और पददलित सवर्णों का भविष्य खतरे में है।

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