मध्य-पूर्व एशिया में शुरू हुए इजरायल-ईरान युद्ध के वैश्विक मायने

मध्य-पूर्व एशिया में शुरू हुए इजरायल-ईरान युद्ध के वैश्विक मायने

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
मध्य-पूर्व एशिया में इजरायल और ईरान के बीच एक बार फिर से युद्ध भड़क गया। इससे पूर्व 2025 के मध्य में भी यह युद्ध शुरू हुआ था, लेकिन खाड़ी-अरब देशों के बीच बचाव के बाद थम गया था। समझा जाता है कि अब इजरायल को मिले अमेरिकी और खाड़ी-अरब देशों के अप्रत्याशित समर्थन से यह युद्ध और भी ज्यादा तेज हो या। जिस तरह से इस्लामिक दुनिया शिया व सुन्नी खेमे में विभक्त है, उससे सुन्नी बहुल सऊदी के इशारे पर शिया बहुल देश ईरान के मानमर्दन में यहूदी बहुल देश इजरायल और ईसाई बहुल देश अमेरिका को काफी मदद मिली है।

वैश्विक कूटनीतिज्ञों के मुताबिक, अमेरिका द्वारा इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर दोबारा हमले किये जाने और ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामेनेई समेत उनके कई प्रमुख सहयोगियों को मार गिराए जाने से मध्य पूर्व के देशों में पारस्परिक तनाव एक बार पुनः चरम पर पहुंचा गया, जिससे वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेंगे। इस संघर्ष से जहां तेल आपूर्ति बाधित होगी, वहीं कई देशों की अर्थव्यवस्था चरमरायेगी और भू-राजनीतिक गठबंधनों को कोई नया आकार भी मिलेगा, जिसमें अमेरिका और चीन के अलावा भारत की भी अहम भूमिका होगी।

वैसे तो यह युद्ध जून 2025 में ही अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरानी परमाणु लक्ष्यों पर किए गए हवाई हमलों से भड़का गया था, जिसके बाद ईरान ने भी मिसाइल और ड्रोन हमलों से तगड़ा जवाब दिया, जिससे परेशान हुए इजरायल द्वारा अपनाई गई कूटनीतिक चतुराई के पश्चात वह युद्ध थम गया था। लेकिन अमेरिका-इजरायल ने इस बार पूरी तैयारी करने के बाद पुनः फरवरी माह के अंतिम दिन शनिवार को ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर एक के बाद एक कई बड़े हमले किए, जिससे ईरान में भारी तबाही मची। 

लिहाजा, इन हमलों से बौखलाए ईरान ने भी इजरायल के अलावा अपने पड़ोसी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर ताबड़तोड़ हमले तेज कर दिए, जिससे क्षेत्रीय तनाव चरम पर पहुंच गया। ईरान ने जवाबी हमले में कतर, कुवैत, यूएई, बहरीन, सऊदी अरब और इजरायल के विभिन्न अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें 200 से अधिक मौतें हुईं। इससे मध्य पूर्व में व्यापक युद्ध का खतरा बढ़ गया है, जो तेल आपूर्ति और व्यापार मार्गों को प्रभावित कर सकता है।

इन हमलों से चिंतित संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस युद्ध को "खतरनाक वृद्धि" करार देते हुए सभी पक्षों से तनाव कम करने की अपील की, क्योंकि इससे संघर्ष नियंत्रण से बाहर भी हो सकता है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी ईरान के परमाणु खतरे को समाप्त करने का लक्ष्य बताया। वहीं, ब्रिटेन के पीएम कीर स्टारमार ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खतरा माना, लेकिन कूटनीतिक समाधान की वकालत की। जबकि यूरोपीय संघ की काजा कल्लास और फ्रांस-जर्मनी-यूके ने संयुक्त बयान में ईरान से परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम रोकने को कहा। वहीं ईरान, चीन, रूस ने अमेरिका-इजरायल के इन हमलों की पुरजोर निंदा की।

इन युद्धों से वैश्विक तेल कीमतों में उछाल और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बाधा आने की आशंका है, जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। इस युद्ध से जहां तेल कीमतें 10% से अधिक उछल चुकी हैं, वहीं ब्रेंट क्रूड $70-90 प्रति बैरल तक पहुंच सकता है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान कभी भी बंद कर सकता है। वहीं वैश्विक जीडीपी में 0.2% की गिरावट और मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा है, खासकर अमेरिका में 4.5% तक मंहगाई बढ़ सकती है। वहीं भारत में आयात महंगा होगा, करंट अकाउंट घाटा बढ़ेगा, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी और चाबहार पोर्ट रणनीति भी प्रभावित होगी।

इन हमलों से अमेरिका और इजरायल का गठबंधन मजबूत, हुआ है, जबकि रूस-चीन, ईरान का समर्थन तो कर रहे हैं  लेकिन सीधे हस्तक्षेप से परहेज भी कर रहे हैं। वहीं गल्फ देश अपने ऊपर ईरान के हमलों की निंदा कर रहे हैं। अरब लीग ने भी इसे ईरानी आक्रामकता बताया। वहीं, ईरान को कूट देने के बाद अब इजरायल अपना ध्यान तुर्किये पर केंद्रित करेगा और उसके भी सनकी नेतृत्व एरदोगान की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी। फिर पाकिस्तान का भी नम्बर आ सकता है।

स्वाभाविक है कि अब खाड़ी देशों की सुरक्षा धारणाएं बदलेंगी, जिससे अमेरिका के साथ ही चीन- रूस गठजोड़ को भी फायदा मिल सकता है। वहीं इस युद्ध से भारत को ऊर्जा सुरक्षा का खतरा पैदा हो चुका है, रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई बाधित हुई है, और खाड़ी देशों में लगभग 25,000 भारतीयों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ चुकी हैं। जबकि पाकिस्तान-चीन को इस संघर्ष के रणनीतिक लाभ मिलेंगे। खासकर भारत नियंत्रित ईरान के चाबहार पोर्ट बनाम चीन नियंत्रित पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के बीच प्रतिस्पर्धा तेज होगी। इसलिए भारत को कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना होगा।

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