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नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन: भारत की कूटनीतिक परीक्षा और मोदी की वैश्विक रणनीति

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नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन: भारत की कूटनीतिक परीक्षा और मोदी की वैश्विक रणनीति # क्या नई दिल्ली दुनिया को नया शक्ति-संतुलन दिखाने जा रही है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  नई दिल्ली में 12–13 सितंबर को होने वाला 18वां ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं है। यह उस समय हो रहा है जब दुनिया एक साथ कई संकटों से गुजर रही है—युद्ध, व्यापारिक टकराव, ऊर्जा असुरक्षा, प्रतिबंधों की राजनीति, आपूर्ति-श्रृंखलाओं का दबाव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नई भू-राजनीति। ऐसे समय में BRICS की अध्यक्षता भारत के हाथ में होना अपने आप में महत्वपूर्ण है।  भारत ने इस वर्ष के लिए जिस दृष्टिकोण को सामने रखा है—Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability—उसमें केवल आर्थिक सहयोग का कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलती विश्व-व्यवस्था के बीच भारत की कूटनीतिक सोच भी दिखाई देती है। सवाल इसलिए बड़ा है कि दिल्ली सम्मेलन के बाद दुनिया भारत को किस रूप में देखेगी—एक बड़े विकासशील देश के रूप में, BRICS के संयोजक के रूप में या एक ऐसे स्वतंत्...

जानिए ISRO की सफलता का वैज्ञानिक मॉडल और कीजिए NASA, SpaceX और चीन से तुलना

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जानिए ISRO की सफलता का वैज्ञानिक मॉडल और कीजिए NASA, SpaceX और चीन से तुलना "समझिए, आखिर कैसे संभव हुई इसरो की सफलता-दर-सफलता वाली उपलब्धि? क्या इसके पीछे टीम नरेंद्र मोदी यानी पीएमओ से जुड़े लोगों के राष्ट्रीय समर्पण का भी बड़ा योगदान है? जी हां, सच्चाई यही इशारे करती है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जन्माष्टमी की शुभ घड़ी यानी 4 सितंबर 2026 की रात जब श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 ने उड़ान भरी और EOS-05 को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया, तब यह केवल एक और रॉकेट लॉन्च नहीं था, बल्कि यह भारत की चार दशक से अधिक पुरानी अंतरिक्ष-यात्रा में तकनीकी परिपक्वता, संस्थागत अनुशासन और असफलताओं से सीखने की वैज्ञानिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) के आधिकारिक रिकॉर्ड में GSLV-F17/EOS-05 को 4 सितंबर 2026 के सफल मिशन के रूप में दर्ज किया गया है। हालांकि, इस सफलता का मूल्यांकन केवल राष्ट्रवादी उत्साह से करना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा होगा। असली सवाल यह है— आखिर ISRO बार-बार कठिन अंतरिक्ष अभियानों...

भारत की राष्ट्रनीति बनाम राज्यों की मनमानी: क्या भारत को नए संघीय अनुबंध की जरूरत है?

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भारत की राष्ट्रनीति बनाम राज्यों की मनमानी: क्या भारत को नए संघीय अनुबंध की जरूरत है? (India's National Policy vs. Arbitrary Actions by States: Does India Need a New Federal Compact?) "21वीं सदी की भारतीय राष्ट्रनीति निम्नलिखित पंक्तियां हो सकती है- नया संघीय अनुबंध सत्ता के केंद्रीकरण का दस्तावेज नहीं, सत्ता की जवाबदेही का समझौता होना चाहिए। भारत को न कमजोर केंद्र चाहिए, न बेलगाम राज्य। भारत को चाहिए- “संविधान से ऊपर कोई सरकार नहीं, राजनीति से ऊपर राष्ट्रहित, और सत्ता से ऊपर नागरिक।” यही वह सूत्र है जो भारत को ‘केंद्र बनाम राज्य’ की अंतहीन लड़ाई से निकालकर ‘Team India’ की वास्तविक शासन-पद्धति तक ले जा सकता है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत की राष्ट्रनीति को केवल केंद्र सरकार की नीति मानना सही नहीं होगा। भारतीय संविधान की दृष्टि से राष्ट्रनीति का मूल आधार है—संविधान की सर्वोच्चता, राष्ट्रीय एकता, विधि का शासन, नागरिकों की समानता और संघ–राज्य के बीच संवैधानिक संतुलन। सर्वोच्च न्यायालय भी संविधान को विधायी, कार्यकारी और न्यायिक सत्ता का...

आखिर OBC व SC-ST के गौरवशाली इतिहास को छिपाकर उन्हें मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर EWS (सवर्णों) के खिलाफ भड़काने वाले लोग कौन हैं? ऐसे भारत द्रोहियों को पहचानिए!

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आखिर OBC व SC-ST के गौरवशाली इतिहास को छिपाकर उन्हें मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर EWS (सवर्णों) के खिलाफ भड़काने वाले लोग कौन हैं? ऐसे भारत द्रोहियों को पहचानिए! (Who are the people who are hiding the glorious history of OBCs and SCs and inciting them against upper castes by telling them fabricated stories? Identify these traitors!) "सच कहूं तो इतिहास का अध्ययन नारे या भावनाओं से नहीं, बल्कि शिलालेखों, अभिलेखों, साहित्य, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और विश्वसनीय इतिहासकारों के शोध के आधार पर होना चाहिए। यही दृष्टिकोण सबसे संतुलित और प्रमाण-आधारित समझ विकसित करता है।" @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत के हिन्दू समाज को वर्णों के बजाय जातियों-उपजातियों में बांटकर एक-दूसरे के खिलाफ सामाजिक विषबमन करने-करवाने की जो अरबी (मुगलिया) और ब्रितानी चालें चली गईं, वही यदि आजाद भारत का सियासी एजेंडा बना दिया गया तो ऐसा करने वाले राजनेता नहीं, बल्कि सामाजिक 'खलनायक' थे, हैं और रहेंगे! और इनके नापाक इरादों से निपटे बिना समकालीन भारत का कोई भविष्य नहीं है।  जरा ग...

आखिर 21वीं सदी की भारतीय सरकार कैसी होनी चाहिए?

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आखिर 21वीं सदी की भारतीय सरकार कैसी होनी चाहिए? After all, what should the Indian government of the 21st century be like? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जब केंद्र या राज्यों की मौजूदा सरकारें अपनी 'तुगलकी नीतियों' से समाज के एक बड़े वर्ग यानी बुद्धिजीवियों पर बोझ प्रतीत होने लगी हों, तो फिर प्रबुद्ध लोगों के दिलोदिमाग में यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक है कि आखिर 21वीं सदी की भारतीय सरकार कैसी होनी चाहिए? मेरे विचार से 21वीं सदी की भारतीय सरकार का लक्ष्य “बड़ी सरकार” या “छोटी सरकार” नहीं, बल्कि “सक्षम, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित सरकार” होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि भारत जैसे विशाल और विविध देश में सरकार को एक साथ सुरक्षा, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, रोजगार, शिक्षा और अवसर सुनिश्चित करने हैं। इसलिए इसका मॉडल कुछ ऐसा होना चाहिए: पहला, सरकार कम नहीं—स्मार्ट हो: जहां सरकार की जरूरत है वहां पर्याप्त स्थायी कर्मचारी हों—पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा, न्याय, रक्षा, नियमन, वैज्ञानिक अनुसंधान और संवेदनशील प्रशासन में। जहां तकनीक काम आसान कर सकती है वहां auto...

जंतर-मंतर से सियासी झाड़फूंक: संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय की असली परीक्षा!

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जंतर-मंतर से सियासी झाड़फूंक: संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय की असली परीक्षा! (Political exorcism from Jantar Mantar: The real test of the Constitution, politics and social justice!) @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक धरना-प्रदर्शन स्थल "जंतर-मंतर" (वोट क्लब के बाद) पर 21 अगस्त 2026 को हुआ ‘आरक्षण हटाओ’ आंदोलन वास्तव में आरक्षण सुधार मुहिम बनकर रह गया। हालांकि इसके सामाजिक मिजाज और जनहितकारी तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति के लिए महज एक और धरना नहीं है, बल्कि यह उस असंतोष की राजनीतिक अभिव्यक्ति है जो सरकारी नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में अवसरों को लेकर सामान्य वर्ग के एक प्रतिभाशाली हिस्से, खासकर जेन-जी युवाओं में दिखाई दे रहा है। साथ ही प्रौढ़ और बुजुर्ग समाजसेवियों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त है।  इसलिए जंतर-मंतर की सियासी झाड़फूंक पर गौर फरमाना आवश्यक है, क्योंकि संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय की असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है जो कब खत्म होगी, शायद नेताओं को भी...

Is political, social, economic, cultural, administrative and judicial 'hooliganism' the Yaksha question of contemporary democracy?

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क्या राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और न्यायिक 'गुंडागर्दी' समकालीन लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक  समय के साथ-साथ जैसे-तैसे मैं बड़ा हुआ तो घर-परिवार, गांव-समाज, देश-दुनिया के हर क्षण बदलते चेहरों से वाकिफ होता रहा। कहीं भुक्तभोगी, कहीं प्रत्यक्षदर्शी की तरह और प्रायः समाचार/मीडिया माध्यमों में, जो कुछ देखा-सुना-समझा, उसने हमारे छात्र जीवन और पेशेवर जीवन को झकझोर कर रख दिया।  शायद इसी से हमारे लोक चिंतन की शुरुआत हुई, लेखन को तरह तरह की धार पर धार मिली और समकालीन विश्व का सबसे बड़ा सवाल मन में कौंधा कि आखिर में "राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और न्यायिक 'गुंडागर्दी' समकालीन लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न क्यों बना हुआ है?"  आखिर हर बार हमारा-आपका संविधान खामोश क्यों हो जाता है? संसद, शीर्ष सचिवालय, सुप्रीम कोर्ट, और प्रसार भारती सबकुछ रफा-दफा करने के चक्कर में क्यों पड़ जाता है? आखिर इस सर्वहितकारी विषयों पर कभी राजनेताओं, नौकरशाहों, न्यायविदों, पत्रकारों, शिक्षाविदों, लोक चि...