भारत की राष्ट्रनीति बनाम राज्यों की मनमानी: क्या भारत को नए संघीय अनुबंध की जरूरत है?

भारत की राष्ट्रनीति बनाम राज्यों की मनमानी: क्या भारत को नए संघीय अनुबंध की जरूरत है?

(India's National Policy vs. Arbitrary Actions by States: Does India Need a New Federal Compact?)

"21वीं सदी की भारतीय राष्ट्रनीति निम्नलिखित पंक्तियां हो सकती है- नया संघीय अनुबंध सत्ता के केंद्रीकरण का दस्तावेज नहीं, सत्ता की जवाबदेही का समझौता होना चाहिए। भारत को न कमजोर केंद्र चाहिए, न बेलगाम राज्य। भारत को चाहिए- “संविधान से ऊपर कोई सरकार नहीं, राजनीति से ऊपर राष्ट्रहित, और सत्ता से ऊपर नागरिक।” यही वह सूत्र है जो भारत को ‘केंद्र बनाम राज्य’ की अंतहीन लड़ाई से निकालकर ‘Team India’ की वास्तविक शासन-पद्धति तक ले जा सकता है।"

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत की राष्ट्रनीति को केवल केंद्र सरकार की नीति मानना सही नहीं होगा। भारतीय संविधान की दृष्टि से राष्ट्रनीति का मूल आधार है—संविधान की सर्वोच्चता, राष्ट्रीय एकता, विधि का शासन, नागरिकों की समानता और संघ–राज्य के बीच संवैधानिक संतुलन। सर्वोच्च न्यायालय भी संविधान को विधायी, कार्यकारी और न्यायिक सत्ता का सर्वोच्च विधिक आधार तथा भारत को संघीय शासन-व्यवस्था वाला गणराज्य मानता है। इसलिए सवाल उठता है कि आखिर भारत की राष्ट्रनीति क्या है? और इसके दृष्टिगत प्रदेश की मनमानी कैसे थमेगी?

# आखिर राष्ट्रनीति का सही मॉडल क्या होना चाहिए?

मेरे विचार से भारत को “केंद्रीय नियंत्रण” नहीं, बल्कि “संवैधानिक अनुशासन और सहकारी संघवाद” की व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। नीति आयोग स्वयं “मजबूत राज्य, मजबूत राष्ट्र” की अवधारणा के साथ सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने की बात करता है। इसलिए व्यवस्था के पांच स्पष्ट स्तंभ होने चाहिए— पहला, राष्ट्रीय कानून सर्वोपरि: कोई राज्य संसद के वैध कानून को राजनीतिक कारणों से निष्प्रभावी न कर सके। दूसरा, राज्यों की स्वायत्तता सुरक्षित: राज्य सूची के विषयों पर राज्यों को वास्तविक प्रशासनिक स्वतंत्रता मिले। तीसरा, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता: राज्यपाल, पुलिस, प्रशासन और जांच एजेंसियां राजनीतिक हथियार न बनें। चौथा, अंतर-सरकारी जवाबदेही: केंद्र और राज्य दोनों अपने संवैधानिक दायित्वों के लिए जवाबदेह हों। पांचवां, न्यायपालिका अंतिम निर्णायक: केंद्र–राज्य विवाद का समाधान राजनीतिक शक्ति से नहीं, संविधान और न्यायिक समीक्षा से हो। 

# क्या असली समस्या संविधान में कम और राजनीतिक संस्कृति में अधिक है?

भारत में तीनों सूचियों के माध्यम से विधायी शक्तियों का विभाजन किया गया है और समवर्ती सूची में टकराव होने पर निर्धारित संवैधानिक परिस्थितियों में संसद का कानून प्रभावी होता है। इसलिए सवाल उठता है कि असली समस्या कहाँ है? तो जवाब होगा कि समस्या संविधान में कम और राजनीतिक संस्कृति में अधिक है। जब केंद्र में सत्तारूढ़ दल राज्य में अपने विरोधी दल की सरकार को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है, या राज्य सरकार राष्ट्रीय कानून और संस्थागत मर्यादाओं को राजनीतिक असहमति के नाम पर चुनौती देती है, तब संघवाद सहयोग की जगह टकराव में बदल जाता है। इसीलिए “प्रदेश की मनमानी” रोकने का समाधान दिल्ली से राज्यों को आदेश देना भर नहीं हो सकता। उसी तरह राज्यों की स्वायत्तता का अर्थ भी राष्ट्रीय संवैधानिक व्यवस्था से बाहर निकलने की स्वतंत्रता नहीं है।

# क्या भारत की राष्ट्रनीति का कोई स्थायी सूत्र होना चाहिए?

भारत की राष्ट्रनीति का स्थायी सूत्र होना चाहिए कि,
 “राज्य मजबूत हों, लेकिन संविधान से ऊपर नहीं; केंद्र शक्तिशाली हो, लेकिन राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता से ऊपर नहीं।” और अंततः अनुच्छेद 365 जैसी संवैधानिक व्यवस्था यह बताती है कि संघ के संवैधानिक निर्देशों का पालन न होने की स्थिति को संविधान गंभीरता से लेता है; हालांकि इसका इस्तेमाल असाधारण संवैधानिक परिस्थितियों में ही होना चाहिए। यानी प्रदेश की मनमानी रोकने का स्थायी रास्ता राष्ट्रपति शासन नहीं, बल्कि “संवैधानिक अनुशासन, स्वतंत्र संस्थाएं, समयबद्ध न्यायिक समीक्षा और सहकारी संघवाद” है।

# आखिर प्रदेश की मनमानी कैसे थमेगी?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि राज्य सरकारों को मनमानी की असीमित स्वतंत्रता संविधान नहीं देता। राज्य अपने अधिकार-क्षेत्र में स्वतंत्र हैं, लेकिन उनकी कार्यपालिका संविधान और लागू कानूनों के अधीन है।
अनुच्छेद 256 स्पष्ट करता है कि राज्य की कार्यपालिका शक्ति इस प्रकार चले कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और लागू कानूनों का पालन सुनिश्चित हो। इसी अनुच्छेद के तहत संघ सरकार आवश्यक होने पर राज्यों को निर्देश भी दे सकती है। अनुच्छेद 257 राज्य की कार्यपालिका को संघ की कार्यपालिका के प्रयोग में बाधा डालने से रोकता है। 
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि केंद्र जब चाहे राज्य सरकार के रोजमर्रा के प्रशासन में हस्तक्षेप करे। यही भारतीय संघवाद की असली कसौटी है।

# आखिर 21वीं सदी के भारत में राष्ट्रहित, राज्यहित और नागरिकहित के बीच संवैधानिक संतुलन कैसे कायम हो?

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि केंद्र कितना शक्तिशाली हो और राज्य कितने स्वायत्त। असली सवाल यह है कि 21वीं सदी के भारत में राष्ट्रहित, राज्यहित और नागरिकहित के बीच वह संवैधानिक संतुलन कैसे कायम हो, जिसमें न दिल्ली राज्यों की आवाज दबा सके और न प्रदेश अपनी राजनीतिक सुविधा को राष्ट्रनीति का विकल्प बना सकें।
क्योंकि भारत का संघवाद आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां पुरानी बहस—“केंद्र बनाम राज्य”—धीरे-धीरे अपर्याप्त होती जा रही है। नई चुनौती है—“संवैधानिक राष्ट्रनीति बनाम राजनीतिक मनमानी।”

सच कहूं तो भारत न तो अमेरिका जैसा शुद्ध संघीय मॉडल है और न ब्रिटेन जैसा एकात्मक, बल्कि भारतीय संविधान ने एक ऐसा संघीय ढांचा बनाया जिसमें राष्ट्रीय एकता के लिए केंद्र को पर्याप्त शक्ति दी गई, लेकिन राज्यों को भी लोकतांत्रिक शासन की वास्तविक इकाइयों के रूप में स्थापित किया गया। यही भारतीय प्रयोग की खूबसूरती है और यही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी। इसलिए आज सवाल उठता है—क्या भारत को एक नए संघीय अनुबंध की आवश्यकता है? मेरा उत्तर है—हाँ, लेकिन यह नया अनुबंध संविधान बदलकर नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना को राजनीतिक आचरण में पुनर्स्थापित करके होना चाहिए।

# आखिर पूरे देश के लिए एकसमान राष्ट्रनीति, जननीति क्यों नहीं विकसित की गई?

भारत की राष्ट्रनीति किसी एक दल, सरकार या प्रधानमंत्री की निजी राजनीतिक नीति नहीं हो सकती। राष्ट्रनीति का आधार होना चाहिए—संविधान, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, नागरिक अधिकार, संघीय संतुलन और दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित। थोड़ी और गहराई में जाएं तो एक देश, एक कानून वाली मूल भावना, समान मताधिकार की तरह। चाहे शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, परिवहन हो, सिविल प्रशासन हो, सबके लिए एक ही राष्ट्रीय कानून लागू हो। भले ही इससे पूर्व सभी राज्यों की सहमति अनिवार्य बना दी जाए, और यदि कोई जानबूझकर कर असहमति जताए तो बहुमत से उसके ऊपर भी कानून लागू करवा दिया जाए। ऐसा इसलिए कि सरकारें बदल सकती हैं। मुख्यमंत्री बदल सकते हैं। राजनीतिक गठबंधन बदल सकते हैं। लेकिन राष्ट्रनीति को चुनावी चक्र का बंधक नहीं बनाया जा सकता।

यहीं से पहली समस्या शुरू होती है, क्योंकि केंद्र में सत्ता बदलते ही राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की व्याख्या बदलने लगती है और राज्यों में सत्ता बदलते ही राष्ट्रीय नीतियों के प्रति रवैया बदल जाता है। एक ही नीति जब अपने दल की सरकार लागू करती है तो “राष्ट्रहित” और विरोधी दल की सरकार लागू करे तो “तानाशाही”—यह राजनीतिक सुविधा संघवाद को कमजोर करती है। इसी प्रकार राज्य सरकार यदि केंद्र की किसी नीति का विरोध केवल इसलिए करे कि उसका राजनीतिक लाभ मिलेगा, तो यह भी संघीय मर्यादा का उल्लंघन है।

# राष्ट्रनीति का अर्थ केंद्र की मनमानी नहीं और संघवाद का अर्थ राज्य की मनमानी भी नहीं। 

राष्ट्रनीति का अर्थ केंद्र की मनमानी नहीं और संघवाद का अर्थ राज्य की मनमानी भी नहीं। इस निमित्त संविधान ने रास्ता पहले ही बता दिया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 256 और 257 केंद्र और राज्यों के प्रशासनिक संबंधों की महत्वपूर्ण सीमाएं निर्धारित करते हैं। अनुच्छेद 256 राज्यों से संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुपालन की अपेक्षा करता है और कुछ परिस्थितियों में केंद्र को राज्यों को आवश्यक निर्देश देने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 257 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य की कार्यपालिका संघ की कार्यपालिका के प्रयोग में बाधा न डाले।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इन प्रावधानों को केंद्र की राजनीतिक सर्वोच्चता का लाइसेंस नहीं बनाया जा सकता। संविधान ने शक्तियों का विभाजन इसलिए किया है कि भारत एक विशाल और विविध लोकतंत्र के रूप में काम कर सके। कृषि, पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य जैसे अनेक विषयों पर राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूसरी तरफ रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, राष्ट्रीय सुरक्षा और अनेक अखिल भारतीय विषयों पर संघ की निर्णायक भूमिका स्वाभाविक है। इसलिए समस्या अधिकारों के विभाजन में नहीं, अधिकारों के राजनीतिक उपयोग में है।

# राज्यों की मनमानी भी उतनी ही खतरनाक है

राज्यों की मनमानी भी उतनी ही खतरनाक है। संघवाद का मतलब यह नहीं कि कोई मुख्यमंत्री अपने राज्य की राजनीतिक लोकप्रियता के आधार पर संविधान की सीमाओं को चुनौती देने लगे। यदि कोई राज्य राष्ट्रीय कानूनों के अनुपालन से इनकार करे, केंद्रीय संस्थाओं के काम में बाधा डाले, राष्ट्रीय परियोजनाओं को केवल राजनीतिक विरोध के कारण रोक दे या प्रशासनिक मशीनरी को पार्टी हितों के लिए इस्तेमाल करे, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। पश्चिम बंगाल की निवर्तमान टीएमसी सरकार की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली की निवर्तमान आप सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे कई उदाहरण इस देश में मौजूद हैं, जहाँ राष्ट्रनीति के साथ हठधर्मिता से आमलोगों को लोकप्रिय योजनाओं का लाभ नहीं मिला पाया। बेवजह विवाद जो बढ़ाया गया, वो अलग।

# आखिर समस्या का समाधान क्या है? हर विवाद में केंद्र बनाम राज्य का राजनीतिक युद्ध तो कतई नहीं?

लेकिन समाधान क्या है? हर विवाद में केंद्र बनाम राज्य का राजनीतिक युद्ध? कतई नहीं। भारत को संस्थागत समाधान चाहिए। यही वह बिंदु है जहां नए संघीय अनुबंध की आवश्यकता सामने आती है। केंद्र की शक्ति भी निरंकुश नहीं हो सकती है। दूसरी ओर केंद्र सरकार भी यदि राज्यपालों, केंद्रीय एजेंसियों, वित्तीय संसाधनों या प्रशासनिक अधिकारों को राजनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करती दिखाई दे, तो संघवाद का विश्वास कमजोर होता है। क्योंकि लोकतंत्र केवल बहुमत से सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का दूसरा नाम है—संस्थागत विश्वास।

यदि विपक्षी दल की सरकार वाले राज्य को यह भरोसा न हो कि केंद्र उसके साथ समान संवैधानिक इकाई की तरह व्यवहार करेगा, तो सहकारी संघवाद का पूरा ढांचा खोखला हो जाएगा। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा दोनों की राष्ट्रनीति सवालों से परे नहीं बताए जा सकते। इसीलिए “मजबूत केंद्र” और “मजबूत राज्य” को एक-दूसरे का विरोधी मानना बुनियादी भूल है। नीति आयोग स्वयं सहकारी संघवाद की अपनी अवधारणा में कहता है कि मजबूत राज्य मजबूत राष्ट्र बनाते हैं, और राज्यों को राष्ट्रीय विकास एजेंडे में सहभागी बनाने के लिए प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के बीच संस्थागत संवाद की व्यवस्था करता है। यानी सिद्धांत स्पष्ट है। मजबूत भारत = मजबूत केंद्र + सक्षम राज्य + जवाबदेह स्थानीय शासन।

# अब पुराने संघीय मॉडल को अपग्रेड करने का समय है, क्योंकि मौजूदा भारत 1950 का भारत नहीं है?

अब पुराने संघीय मॉडल को अपग्रेड करने का समय है, क्योंकि मौजूदा भारत 1950 का भारत नहीं है। तब केंद्र और राज्यों के बीच मुख्य प्रश्न प्रशासनिक नियंत्रण का था। लेकिन आज प्रश्न कहीं अधिक जटिल हैं— डिजिटल अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय अवसंरचना, जल संकट, आंतरिक सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, रोजगार, प्रवासी श्रम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, शिक्षा और शहरीकरण। इनमें से कोई समस्या केवल दिल्ली हल नहीं कर सकती। और कोई राज्य अकेले भी नहीं। इसलिए भारत को “सहकारी संघवाद 2.0” की आवश्यकता है।

इसका पहला सिद्धांत होना चाहिए—राष्ट्रीय लक्ष्य साझा हों, लेकिन उन्हें हासिल करने के रास्ते राज्यों को परिस्थितियों के अनुरूप चुनने की पर्याप्त स्वतंत्रता हो। दूसरा—केंद्र और राज्य के विवादों के लिए स्थायी संस्थागत तंत्र हो। तीसरा—राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और वित्तीय अनुशासन दोनों सुनिश्चित हों। चौथा—राज्यपाल की भूमिका को राजनीतिक विवाद का केंद्र बनने से रोकने के लिए स्पष्ट संवैधानिक परंपराएं विकसित हों। पांचवां—केंद्रीय एजेंसियों और राज्य पुलिस के बीच अधिकारों की सीमाएं अधिक स्पष्ट हों। छठा—राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से मुक्त रखने के लिए बहुदलीय सहमति विकसित की जाए।

# समझिए क्यों जरूरी है ‘संघीय आचार संहिता’? 

भारत में संविधान है, कानून हैं, न्यायपालिका है। फिर भी केंद्र-राज्य विवाद बार-बार क्यों पैदा होते हैं? क्योंकि हर संवैधानिक विवाद का समाधान केवल कानून की धाराओं से नहीं होता। लोकतंत्र को संवैधानिक परंपराओं की भी आवश्यकता होती है। इसलिए समय आ गया है कि केंद्र और राज्यों के बीच एक “संघीय आचार संहिता” पर राजनीतिक सहमति बने। इसमें यह तय हो- राज्य राष्ट्रीय कानूनों के अनुपालन को राजनीतिक हथियार नहीं बनाएंगे। केंद्र राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को राजनीतिक दंड के रूप में सीमित नहीं करेगा। राज्यपाल संवैधानिक पद की मर्यादा बनाए रखेंगे। केंद्र और राज्य विवादों के समाधान के लिए समयबद्ध संस्थागत संवाद होगा। वित्तीय हस्तांतरण को राजनीतिक निष्ठा से नहीं जोड़ा जाएगा। राष्ट्रीय परियोजनाओं पर राजनीतिक दलों की सरकारें सत्ता परिवर्तन के बावजूद न्यूनतम निरंतरता बनाए रखेंगी। पुलिस और प्रशासन को दलगत राजनीति से अधिकतम संभव दूरी पर रखा जाएगा।

# यह कोई नया संविधान नहीं होगा, बल्कि यह संविधान के राजनीतिक आचरण का नया अनुबंध होगा!

यह कोई नया संविधान नहीं होगा। यह सिर्फ संविधान के राजनीतिक आचरण का नया अनुबंध होगा। संघवाद को राज्यों से आगे जिलों तक ले जाना होगा। एक और बड़ी विडंबना है। हम दिल्ली और राज्यों के बीच अधिकारों की बहस तो करते हैं, लेकिन उसी राज्य के भीतर जिला, नगर और पंचायत कितने स्वायत्त हैं—इस पर कम चर्चा होती है।
यदि दिल्ली राज्यों को नियंत्रित करे तो उसे केंद्रीकरण कहते हैं। लेकिन यदि राज्य सरकारें जिलों, नगर निकायों और पंचायतों को राजनीतिक नियंत्रण में रखें तो उसे क्या कहेंगे? यह भी एक प्रकार का केंद्रीकरण ही है—बस राजधानी बदल गई है।

भारत को इसलिए संघवाद को नीचे तक ले जाना होगा।
केंद्र, राज्य, जिला, नगर/पंचायत, और नागरिक। हर स्तर पर अधिकार, संसाधन और जवाबदेही का स्पष्ट संबंध बनाना होगा। वास्तविक लोकतांत्रिक संघवाद तभी बनेगा जब नागरिक को अपने राज्य की राजधानी और देश की राजधानी—दोनों के बीच अपनी आवाज पहुंचाने के लिए किसी राजनीतिक कृपा की आवश्यकता न हो। 

# ‘टीम इंडिया’ नारा नहीं, शासन-पद्धति बने

नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल में प्रधानमंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री और संबंधित केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर साथ बैठते हैं। जून 2026 में इसकी 11वीं बैठक भी हुई। लेकिन केवल बैठकें पर्याप्त नहीं हैं। बैठकों के फैसलों की जवाबदेही, समयसीमा और सार्वजनिक निगरानी भी जरूरी है। सहकारी संघवाद का अर्थ यह नहीं कि मुख्यमंत्री दिल्ली आकर भाषण दें और फिर अपने-अपने राज्य लौट जाएं। सहकारी संघवाद का अर्थ है— साझा लक्ष्य + साझा जिम्मेदारी + साझा जवाबदेही। यही वह बिंदु है जहां भारत की राष्ट्रनीति को राजनीतिक नारों से आगे निकलना होगा।

# नया संघीय अनुबंध आखिर किसके लिए? 

नया संघीय अनुबंध आखिर किसके लिए? केंद्र के लिए नहीं। राज्यों के लिए भी नहीं। यह नागरिक के लिए होना चाहिए। नागरिक को इससे फर्क नहीं पड़ता कि सड़क केंद्र ने बनाई या राज्य ने। उसे सड़क चाहिए। उसे यह फर्क नहीं पड़ता कि अस्पताल केंद्र की योजना से बना या राज्य की।
उसे इलाज चाहिए। उसे यह नहीं जानना कि रोजगार नीति किस मंत्रालय के अधीन है। उसे रोजगार चाहिए। यही राष्ट्रनीति की अंतिम कसौटी है। यदि केंद्र और राज्य अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाओं में रहकर नागरिक को बेहतर जीवन नहीं दे पा रहे हैं, तो संघवाद की सारी बहस अधूरी है।

निष्कर्ष यह कि भारत को ‘केंद्र बनाम राज्य’ नहीं, ‘केंद्र और राज्य’ चाहिए। आज भारत के सामने सबसे बड़ा खतरा केंद्र का मजबूत होना नहीं है। खतरा तब है जब केंद्र की शक्ति राजनीतिक अहंकार में बदल जाए। और खतरा यह भी है कि राज्य की स्वायत्तता क्षेत्रीय राजनीतिक मनमानी में बदल जाए। दोनों स्थितियां राष्ट्रहित के लिए नुकसानदेह हैं।
इसलिए भारत को ऐसे संघीय अनुबंध की जरूरत है जिसमें केंद्र कहे—“मैं राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा और समान अवसर की गारंटी दूंगा।” राज्य कहें, “हम संविधान, राष्ट्रीय कानून और नागरिक अधिकारों की रक्षा करेंगे।” और नागरिक कहे- “मुझे केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक लड़ाई नहीं, परिणाम चाहिए।” 

देखा जाए तो यही 21वीं सदी की भारतीय राष्ट्रनीति हो सकती है। नया संघीय अनुबंध सत्ता के केंद्रीकरण का दस्तावेज नहीं, सत्ता की जवाबदेही का समझौता होना चाहिए। भारत को न कमजोर केंद्र चाहिए, न बेलगाम राज्य। भारत को चाहिए- “संविधान से ऊपर कोई सरकार नहीं, राजनीति से ऊपर राष्ट्रहित, और सत्ता से ऊपर नागरिक।” यही वह सूत्र है जो भारत को ‘केंद्र बनाम राज्य’ की अंतहीन लड़ाई से निकालकर ‘Team India’ की वास्तविक शासन-पद्धति तक ले जा सकता है।

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