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दिल्ली के श्रम मंत्री कपिल मिश्रा से मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति, दिल्ली के अध्यक्ष रविन्द्र गुप्ता ने भेंट की

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दिल्ली के श्रम मंत्री कपिल मिश्रा से मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति, दिल्ली के अध्यक्ष रविन्द्र गुप्ता ने भेंट की राजनैतिकदुनिया टीम नई दिल्ली: हिंदी पत्रकारिता दिवस के 200वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता को उनके श्रम मंत्री कपिल मिश्रा के मार्फ़त "मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति, दिल्ली" के अध्यक्ष रविन्द्र गुप्ता और सदस्य अशोक कौशिक आदि ने हार्दिक शुभकामनाएँ एवं दिली बधाई प्रेषित की। इसी सिलसिले में मंत्री मिश्रा के आवास पर मुलाकात की और उन्हें एक स्मरण-पत्र सौंपा, जिसमें अपनी उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए विभिन्न लंबित मांगों से भी उन्हें अवगत कराया गया। स्मरण-पत्र में लिखा हुआ है कि आपको अत्यंत हर्ष के साथ सूचित करना है कि हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली 200 वर्ष पूर्ण होने के इस ऐतिहासिक अवसर पर, समिति द्वारा पत्रकारिता दिवस की पूर्व संध्या पर एक भव्य और गरिमामयी राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक समागम में देश के कोने-कोने से आए प्रबुद्ध पत्रकारों, संपादकों और मार्गदर्शकों ...

पश्चिम बंगाल में टीएमसी की बढ़ती सियासी मुश्किलों के अहम राजनीतिक मायने

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पश्चिम बंगाल में टीएमसी की बढ़ती सियासी मुश्किलों के अहम राजनीतिक मायने  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पश्चिम बंगाल में टीएमसी और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बढ़ती राजनीतिक मुश्किलें केवल एक दल का संकट नहीं हैं; बल्कि वे बंगाल की सत्ता-राजनीति, विपक्षी एकता, भाजपा के विस्तार और राज्य की भविष्य की राजनीतिक दिशा से जुड़ा बड़ा घटनाक्रम हैं। यदि पार्टी आंतरिक चुनौतियों पर नियंत्रण नहीं कर पाती, तो बंगाल में आने वाले वर्षों में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत हो सकती है।  वैसे तो टीएमसी की बढ़ती मुश्किलें कई स्तरों पर दिखाई दे रही हैं। हालांकि पार्टी अभी भी पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है, लेकिन उसे कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आइए पहले समझते हैं कि आखिर उसकी बढ़ती मुश्किलें क्या क्या हैं-  पहली, भ्रष्टाचार के आरोप और छवि का संकट: शिक्षक भर्ती, नगर निकाय भर्ती और अन्य कथित घोटालों को लेकर पार्टी के कई नेताओं पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई हुई है। इससे "सुशासन" और "परिवर्तन" की वह छवि...

आखिर हर बार अनुत्तरित क्यों रह जाता है सभ्यता का नैतिक प्रश्न?

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आखिर हर बार अनुत्तरित क्यों रह जाता है सभ्यता का नैतिक प्रश्न?  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार “सभ्यता का नैतिक प्रश्न” वे मूलभूत प्रश्न हैं जो किसी समाज, राष्ट्र या पूरी मानवता के सामने यह चुनौती रखते हैं कि विकास, शक्ति, विज्ञान और समृद्धि का उपयोग किस उद्देश्य और किस नैतिक आधार पर किया जाए। इस हेतु थोड़ी गहराई में जाकर चिंतन-मनन करें तो अंतर्मन कह उठेगा कि अंततोगत्वा मनुष्य के पास बढ़ती हुई शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए होगा—स्वार्थ, प्रभुत्व और उपभोग के लिए, या न्याय, करुणा, स्वतंत्रता और मानव कल्याण के लिए?” यही प्रश्न किसी भी सभ्यता की दिशा और भविष्य को निर्धारित करता है। मानव इतिहास बताता है कि बढ़ती हुई शक्ति—चाहे वह सैन्य शक्ति हो, आर्थिक संपन्नता, राजनीतिक प्रभाव या वैज्ञानिक-तकनीकी क्षमता—अपने आप में न तो नैतिक होती है और न अनैतिक। उसका नैतिक मूल्य इस बात से तय होता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता है।  अनुभूत सत्य है कि जब शक्ति का उपयोग प्रभुत्व, शोषण और असीमित उपभोग के लिए होता है, तब साम्राज्यवाद, ...