आखिर OBC व SC-ST के गौरवशाली इतिहास को छिपाकर उन्हें मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर EWS (सवर्णों) के खिलाफ भड़काने वाले लोग कौन हैं? ऐसे भारत द्रोहियों को पहचानिए!


आखिर OBC व SC-ST के गौरवशाली इतिहास को छिपाकर उन्हें मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर EWS (सवर्णों) के खिलाफ भड़काने वाले लोग कौन हैं? ऐसे भारत द्रोहियों को पहचानिए!

(Who are the people who are hiding the glorious history of OBCs and SCs and inciting them against upper castes by telling them fabricated stories? Identify these traitors!)
"सच कहूं तो इतिहास का अध्ययन नारे या भावनाओं से नहीं, बल्कि शिलालेखों, अभिलेखों, साहित्य, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और विश्वसनीय इतिहासकारों के शोध के आधार पर होना चाहिए। यही दृष्टिकोण सबसे संतुलित और प्रमाण-आधारित समझ विकसित करता है।"

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत के हिन्दू समाज को वर्णों के बजाय जातियों-उपजातियों में बांटकर एक-दूसरे के खिलाफ सामाजिक विषबमन करने-करवाने की जो अरबी (मुगलिया) और ब्रितानी चालें चली गईं, वही यदि आजाद भारत का सियासी एजेंडा बना दिया गया तो ऐसा करने वाले राजनेता नहीं, बल्कि सामाजिक 'खलनायक' थे, हैं और रहेंगे! और इनके नापाक इरादों से निपटे बिना समकालीन भारत का कोई भविष्य नहीं है। 

जरा गौर कीजिए कि इनका अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क और राष्ट्रीय संवैधानिक चक्रब्यूह कितना मजबूत है, जिसकी ये मनमाफिक व्याख्या करते रहने को स्वतंत्र हैं। ये वर्तमान नहीं, मनगढ़ंत इतिहास से अभिप्रेरित हैं। इनकी सियासी, प्रशासनिक, न्यायिक, मीडिया, पेशेवर और कारोबारी पैठ/नीतियां कितनी मजबूत व घटिया हैं कि इन पर सवाल उठाना भी मना है। तब भी जब कोई दलित/आदिवासी/ओबीसी समूह के संपन्न लोग अपने ही समूह के विपन्न लोगों की खुलेआम हकमारी करें और पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेता जाए।

जरा सोचिए, कांग्रेस, समाजवादी (क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय गठजोड़) और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल भी इनके चक्रब्यूह में फंसकर खुद ही अप्रासंगिक होते चले गए, या चले जा रहे हैं, क्योंकि समरस भारतीय सामाजिक प्रवृत्तियों के बारे में इन्होंने सदैव गलत अनुमान लगाया और अपनी राजनीतिक मनमानी थोपनी चाहिए, जिसके बाद ये धीरे-धीरे जनता में अलोकप्रिय होते चले गए। स्थायी सत्ता तक गंवा दिये। यही सोचकर अब भाजपा भी बेचैन है।

कोढ़ में खाज यह कि जब राजनीति ही नहीं दलित-आदिवासी-ओबीसी साहित्यिक विमर्श के नाम पर भी ऊंच-नीच की कथित खाई पैदा करके हिंदुओं को परस्पर लड़ाने-भिड़ाने के प्रयत्न चलते रहे हैं। इस दिशा में विदेशी/स्वदेशी सहायता प्राप्त कई एनजीओज सक्रिय हैं, जो विषैले साहित्य व अन्य प्रचार सामग्री, जिसमें सोशल मीडिया भी प्रमुख है, से सामाजिक समरसता की जड़ में मट्ठा डाल रहे हैं।.......और इस पर भविष्य में कोई प्रबुद्ध सवाल पैदा न हो, इसलिए सियासत के इतने घटिया योग्यता रूपी कानूनी मानदंड स्थापित किए गए, ताकि समझदार नेता पैदा ही न हो और सत्ताधीशों की पूंजीवादी, परिवारवादी, सम्पर्कवादी व साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों पर कोई समतावादी/समाजवादी अंगुली उठे ही नहीं। 

वाकई, राष्ट्र हित में इस बौद्धिक कुचक्र को समझना और समझाना दोनों जरूरी है, ताकि आये दिन बिखरते जा रहे भारतीय समाज को पुनः एकजुट किया जा सके। जाति, भाषा व धर्म की खाई अधिक चौड़ी न हो। इतिहास का बेवाक विश्लेषण इसके मौके हमें प्रदान करता है। देखा जाए तो भारत में अनेक सामाजिक समूहों ने अलग-अलग समय पर सत्ता भी संभाली और संघर्ष भी किया। चाहे सवर्ण हों या ओबीसीज हों, या फिर एससी-एसटी- सबने राज किया, कोई कम, कोई ज्यादा।

वहीं, सामाजिक असमानता और भेदभाव के प्रमाण भी मिलते हैं। साथ ही, ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं जहाँ आज के वंचित माने जाने वाले समुदायों से जुड़े शासकों ने बड़े-बड़े राज्य स्थापित किए। इसलिए न तो "सदियों तक किसी एक समूह के पास ही पूरी सत्ता थी" और न ही "किसी समुदाय ने कभी कोई वंचना नहीं झेली"—इनमें से कोई भी निष्कर्ष पूरे भारतीय इतिहास का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करता। 

फिर भी यदि कुछ विरोधाभासी बातें एक-दूसरे के खिलाफ यानी सामान्य जातियों (सवर्ण) व कथित दलित/आदिवासी/ओबीसीज (अवर्ण) वर्ग के बीच फैलाई जाती हैं तो उनका अंतर्राष्ट्रीय मकसद है जो मुगलिया/ब्रिटिश गुलामी काल से अभिप्रेरित है। हद तो यह कि खुद दलितों के खिलाफ महादलितों को, मूल आदिवासियों के खिलाफ धर्मांतरित आदिवासियों को और ओबीसीज के खिलाफ एमबीसीज को भी सियासी रूप से भड़काया जाता है। 

ऐसा इसलिए कि 'इंडिया' के चहेते लोगों ने सदैव 'भारत' व भारतीयों को कमजोर रखकर पराधीन बनाए रखने के लिए फूट डालो-शासन करो की नीति अपनाई और इसे ही स्थायित्व देने के वास्ते कई षड्यंत्रकारी सिद्धांत पैदा किए, जिससे सवर्णों और अवर्णों के बीच की सामाजिक खाई और अधिक चौड़ी हुई यानी बढ़ी। जबकि वास्तविकता यह है कि प्राचीन भारत में राजनीतिक सत्ता केवल क्षत्रिय जन्म पर निर्भर नहीं थी; बल्कि जो व्यक्ति समर्थन और संसाधन जुटाने में सक्षम था, वह राजनीतिक शक्ति हासिल कर सकता था।

लिहाजा भारतीय इतिहास को केवल ‘एक जाति हमेशा शासक और बाकी जातियाँ हमेशा शोषित’ की सरल कहानी में नहीं समेटा जा सकता। क्योंकि अलग-अलग काल खण्ड और क्षेत्रों में सत्ता का सामाजिक आधार बदलता रहा; अनेक जनजातीय, कृषक, पशुपालक और अन्य गैर-परंपरागत शासक शक्तियाँ उभरीं। .......और यही बात “हजारों साल से रोटी नहीं मिली” जैसे पूर्णतावादी दावों को ऐतिहासिक प्रमाण की कसौटी पर जांचने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

सच कहूं तो इतिहास का अध्ययन नारे या भावनाओं से नहीं, बल्कि शिलालेखों, अभिलेखों, साहित्य, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और विश्वसनीय इतिहासकारों के शोध के आधार पर होना चाहिए। यही दृष्टिकोण सबसे संतुलित और प्रमाण-आधारित समझ विकसित करता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत के इतिहास में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दलित-आदिवासी (SC-ST) समुदायों से आने वाले कम से कम दर्जनाधिक (4 दर्जन से लेकर 8 दर्जन) बड़े राजा हुए हैं। 

इसलिए जो लोग यह आरोप मढ़ते हैं कि उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ और 'हज़ारों साल से रोटी नहीं मिली' या पानी नहीं पीने दिया गया, उनकी ये बातें मनगढ़ंत हैं। राजनीतिक गोलबंदी से अभिप्रेरित हैं। ऐसे अपुष्ट दावे करने वालों को सबसे पहले अपना स्वर्णिम इतिहास पढ़ना चाहिए। 

यहां पर एक स्वाभाविक सवाल उपजता है कि जब ये तमाम लोग राजा थे तो पानी कहाँ से पीते थे? क्या राजा थे लेकिन पानी नहीं पीते थे? क्या ये संभव है? आखिर ये कैसा मजाक है? जो सनातन धर्म के अनुयायियों में फूट डालकर उनको कमजोर करता है। समाज के जागरूक और सामर्थ्यवान सवर्ण समूह के प्रति जातीय विद्वेष की भावना पैदा करता है। 

ऐसे पक्षपाती आरोपों से तो अमेरिका, चीन, यूरोप, पाकिस्तान, बंगलादेश आदि जैसे देशों के खुफिया षड्यंत्र ही सफल होंगे, जो कि लगभग 1-2 सदी से भारत के लोगों के बीच फूट डालो, शासन करो वाले हालात पैदा करते हैं। ये सभी विचार अरबी-यूरोपीय-अमेरिकी उपज हैं, जिनका अगुवा अब ब्रिटेन नहीं अमेरिका है। बेशक उपर्युक्त बात का मूल तर्क सही दिशा में है, लेकिन इतिहास के स्तर पर इसे थोड़ा अधिक सटीक बनाना जरूरी है। 

इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारत के इतिहास में अनेक ऐसे शासक हुए जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि आज के OBC, SC या ST समुदायों से जोड़ी जाती है—लेकिन “कम से कम 8 दर्जन बड़े राजा” जैसी संख्या को बिना स्रोतों के निश्चित तथ्य की तरह कहना उचित नहीं होगा।

ऐसा इसलिए कि प्राचीन और मध्यकालीन जातीय पहचान को आज की SC/ST/OBC श्रेणियों में सीधे रख देना भी इतिहास की दृष्टि से जटिल है। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठता है, वह यह कि यदि भारतीय समाज में हजारों वर्षों तक हर वंचित समुदाय को सत्ता, सम्मान और संसाधनों से पूरी तरह वंचित रखा गया था, तो फिर उन समुदायों से निकले अनेक स्थानीय, क्षेत्रीय और साम्राज्यवादी शासकों, सैनिक समूहों, जमींदारों और राजनीतिक शक्तियों के इतिहास को कैसे समझाया जाए?

और उससे भी बड़ा आरोप यह कि “हजारों साल से रोटी नहीं मिली” जैसे नारों को भी इसी कारण ऐतिहासिक प्रमाणों और सामाजिक विविधता के संदर्भ में परखा जाना चाहिए। अलबत्ता, किसी पूरे समुदाय के हजारों वर्षों के अनुभव को एक ही वाक्य में समेट देना इतिहास नहीं, बल्कि राजनीतिक सरलीकरण हो सकता है। हाँ, तब यह वर्ग “पानी कहाँ से पीते थे?” वाले तर्क में भी एक सावधानी जरूरी है। वाकई राजा का होना यह प्रमाण नहीं कि उसके पूरे समुदाय को सामाजिक बराबरी प्राप्त थी। 

इतिहास में शासक वर्ग और उसी समुदाय के सामान्य लोगों की सामाजिक स्थिति अलग हो सकती थी। जैसा कि आज भी दिखाई देती है। ब्राह्मण वर्ग सत्ता के शीर्ष पर रहे, लेकिन उनमें भी गरीबी है। इनमें जो गरीब हैं, आपसी उपेक्षा व हिकारत भाव के शिकार हैं। क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र- सभी जगहों पर संपन्न और विपन्न के बीच चौड़ी खाई है, जिसे समझते हुए प्राचीन व मध्यकालीन इतिहास का अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा। 

इसलिए अधिक मजबूत सवाल यह होगा कि “क्या भारतीय इतिहास को केवल शोषित बनाम शोषक की दो श्रेणियों में बांटकर समझा जा सकता है, जबकि इसी इतिहास में वंचित माने जाने वाले अनेक समुदायों से शक्तिशाली राजवंश और शासक भी उभरे?”

यही सवाल जाति और सामाजिक न्याय की बहस को नारे से निकालकर इतिहास, प्रमाण और वास्तविक सामाजिक अनुभव की ओर ले जाता है। लिहाजा, इस विषय पर गहराई से विचार करने के लिए तीन अलग-अलग बातों को अलग रखना आवश्यक है—(1) राजनीतिक सत्ता, (2) सामाजिक स्थिति, और (3) आधुनिक आरक्षण श्रेणियाँ।

पहला, सत्ता और सामाजिक सम्मान हमेशा एक जैसी चीज़ नहीं रहे: इतिहास में अनेक समुदायों से राजा, सेनापति और स्थानीय शासक बने। लेकिन किसी समुदाय का राजा होना अपने-आप यह सिद्ध नहीं करता कि उस समुदाय के सभी लोगों को समान सामाजिक प्रतिष्ठा या अवसर मिले थे। दूसरी ओर, यह कहना भी सही नहीं होगा कि किसी समुदाय को हर जगह और हर समय केवल उत्पीड़न ही झेलना पड़ा, क्योंकि भारत का सामाजिक इतिहास क्षेत्र, काल और समुदाय के अनुसार काफी भिन्न रहा है।

दूसरा, भारत का इतिहास एकरूप नहीं था: भारत कभी एक केंद्रीकृत राज्य नहीं रहा। यहाँ सैकड़ों राज्यों, गणराज्यों और रियासतों का अस्तित्व रहा। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग जातियों और जनजातियों के शासक हुए। इसलिए "सभी जगह, हजारों साल तक एक ही व्यवस्था थी" जैसे दावे इतिहास की जटिलता को पूरी तरह नहीं दर्शाते।

तीसरा, आज की SC, ST और OBC श्रेणियाँ आधुनिक संवैधानिक वर्गीकरण हैं: SC, ST और OBC की वर्तमान कानूनी श्रेणियाँ स्वतंत्र भारत में बनीं। इसके पीछे मुगलिया और ब्रिटिश नौकरशाहों की विभाजनकारी सोच रही, जो सफल हुई। जबकि प्राचीन और मध्यकालीन राजवंशों को सीधे इन श्रेणियों में रखना हमेशा इतिहाससम्मत नहीं होता। इसलिए यह कहना कि "8 दर्जन से अधिक OBC राजा थे" या "फलाँ राजा SC था"—ऐसे दावों के लिए ठोस ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक हैं।

चौथा, राजनीतिक नारों और इतिहास में अंतर: "हजारों साल से रोटी नहीं मिली" जैसे नारे सामाजिक अन्याय की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए दिए जाते हैं, लेकिन यदि इन्हें शाब्दिक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो वे अतिरंजित हो सकते हैं। दूसरी ओर, केवल कुछ राजाओं का उदाहरण देकर यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं कि किसी समुदाय के साथ कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ।

पांचवां, इसलिए संतुलित निष्कर्ष जरूरी है: जैसा कि इतिहास से ही यह स्पष्ट होता है कि भारत में अनेक सामाजिक समूहों ने अलग-अलग समय पर सत्ता भी संभाली और संघर्ष भी किया। इनके बीच सामाजिक असमानता और भेदभाव के प्रमाण भी मिलते हैं। साथ ही, ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं जहाँ आज के वंचित माने जाने वाले समुदायों से जुड़े शासकों ने बड़े राज्य स्थापित किए। इसलिए न तो "सदियों तक किसी एक समूह के पास ही पूरी सत्ता थी" और न ही "किसी समुदाय ने कभी कोई वंचना नहीं झेली"—इनमें से कोई भी निष्कर्ष पूरे भारतीय इतिहास का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करता।

सच कहूं तो इतिहास का अध्ययन नारे या भावनाओं से नहीं, बल्कि शिलालेखों, अभिलेखों, साहित्य, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और विश्वसनीय इतिहासकारों के शोध के आधार पर होना चाहिए। यही दृष्टिकोण सबसे संतुलित और प्रमाण-आधारित समझ विकसित करता है।

आज की OBC/SC/ST सूची में जो शासक आते हैं” और “ऐतिहासिक रूप से उस समुदाय से जुड़े माने जाते हैं”—इन दोनों को अलग अलग प्रस्तुत कर रहा हूँ। सबसे मजबूत उदाहरण ये हैं:

क्रम- शासक- ऐतिहासिक समुदाय/वंश- क्षेत्र- प्रमाण की स्थिति

1. रानी दुर्गावती- गोंड- गढ़ा-कटंगा, मध्य प्रदेश- मजबूत ST/आदिवासी।
2. संग्राम शाह- गोंड- गढ़ा-मंडला- मजबूत ST/आदिवासी।
3. दलपत शाह- गोंड, गढ़ा-कटंगा- मजबूत ST/आदिवासी।
4. हृदय शाह- गोंड- गढ़ा-मंडला- मजबूत ST/आदिवासी।
5. बख्त बुलंद शाह- गोंड- देवगढ़, मध्य भारत- मजबूत ST/आदिवासी।
6. चंद्र शाह- गोंड, गढ़ा-मंडला, मजबूत ST/आदिवासी।
7. राजा जाटबा- गोंड- देवगढ़- मजबूत ST/आदिवासी।
8. सुकाफा ताई-अहोम- असम जनजातीय पृष्ठभूमि- आधुनिक ST वर्गीकरण अलग प्रश्न।
9. सुहुनमुङ/दिहिंगिया राजा- अहोम- असम- वही सावधानी।
10. सुक्लेनमुङ- अहोम- असम-वही सावधानी।
11. सुतामला/जयध्वज सिंह- अहोम- असम- वही सावधानी।
12. सुपुंगमुङ/चक्रध्वज सिंह- अहोम- असम- वही सावधानी।
13. गदाधर सिंह- अहोम- असम- वही सावधानी।
14. रुद्र सिंह- अहोम- असम- वही सावधानी।
15. शिव सिंह- अहोम- असम- वही सावधानी।
16. राजाराम जाट- जाट- ब्रज/भरतपुर- मजबूत OBC।
17. चूड़ामन- जाट- भरतपुर- मजबूत OBC।
18. बदन सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत OBC।
19. सूरजमल- जाट- भरतपुर- बहुत मजबूत।
20. जवाहर सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत।
21. रतन सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत।
22. रंजित सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत।
23. रणधीर सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत।
24. बलदेव सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत।
25. बलवंत सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत।
26. मल्हार राव होलकर- धनगर- मालवा समुदाय- संबंध मजबूत।
27. अहिल्याबाई होलकर- धनगर- मालवा/इंदौर- बहुत मजबूत।
28. तुकोजी राव होलकर- धनगर- मालवा- मजबूत।
29. यशवंतराव होलकर- होलकर/धनगर परंपरा- मालवा मजबूत।
30. काशीराव होलकर- होलकर- इंदौर- मजबूत।
31. भिल्लम V- सेउना/यादव- देवगिरि- ऐतिहासिक यादव पहचान, आधुनिक OBC समानता विवादित।
32. जैतुगी- सेउना/यादव- देवगिरि- वही सावधानी।
33. सिंघण II- सेउना/यादव, दक्कन- वही सावधानी।
34. कृष्ण- सेउना/यादव- दक्कन- वही सावधानी।
35. महादेव- सेउना/यादव- दक्कन- वही सावधानी।
36. रामचंद्र यादव- सेउना/यादव- देवगिरि- वही सावधानी।
37. गोकुला- जाट- मथुरा/ब्रज- मजबूत समुदाय-संबंध।
38. राजा नाहर सिंह- जाट- बल्लभगढ़/हरियाणा- मजबूत।
39. राजा किशन सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत
40. महाराजा ब्रजेन्द्र सिंह- जाट- भरतपुर- मजबूत।

यहां पर कुछ नामों को मैंने जानबूझकर बाहर रखा है। यथा, चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक को मैंने OBC की पक्की सूची में नहीं रखा। क्योंकि मौर्यों की सामाजिक उत्पत्ति पर प्राचीन स्रोतों में ही मतभेद हैं; इसलिए उन्हें आधुनिक OBC घोषित करना ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित निष्कर्ष नहीं है। 

इसी तरह से शिवाजी महाराज को सीधे “OBC राजा” कहना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि उनके भोंसले परिवार की सामाजिक उत्पत्ति और 1674 के राज्याभिषेक में क्षत्रिय वंशावली के दावे पर इतिहासकारों में बहस है। स्रोतों में भोंसले परिवार को दक्कनी कृषक/कुनबी-मराठा पृष्ठभूमि से जोड़ने वाली बातें भी मिलती हैं, लेकिन इसे आधुनिक OBC श्रेणी के बराबर रखना ठीक नहीं होगा। 

इसी तरह देवगिरि के यादवों को आधुनिक “यादव OBC” मान लेना भी सावधानी मांगता है। क्योंकि महाराष्ट्र गजेटियर के ऐतिहासिक विवरण में साफ कहा गया है कि उनका “यादव” दावा संभवतः बाद की पुराणिक वंशावली से मजबूत हुआ और उन्हें तकनीकी रूप से सेउना कहना अधिक उचित हो सकता है। 

सबसे मजबूत राजनीतिक उदाहरण कौन-से हैं? यदि आपका उद्देश्य उपर्युक्त मूल दावे—“वंचित/पिछड़े समुदायों के लोग कभी सत्ता में नहीं रहे”—का ऐतिहासिक परीक्षण करना है, तो मैं इन उदाहरणों को सबसे प्रभावशाली मानूँगा:
रानी दुर्गावती → गोंड;  संग्राम शाह → गोंड; बख्त बुलंद शाह → गोंड; सूरजमल → जाट; बदन सिंह → जाट;
चूड़ामन → जाट; अहिल्याबाई होलकर → धनगर; मल्हार राव होलकर → धनगर; यशवंतराव होलकर → धनगर;
सिंघण II → सेउना/यादव परंपरा; रामचंद्र → सेउना/यादव परंपरा; और सुकाफा → अहोम।

भरतपुर के मामले में तो प्रमाण विशेष रूप से स्पष्ट हैं—राज्य पर Sinsinwar Jat शासकों का शासन था और सूरजमल ने उसे एक बड़ी क्षेत्रीय शक्ति बनाया। जबकि
देवगिरि के यादवों ने भी 12वीं–13वीं शताब्दी में दक्कन में बड़ा साम्राज्य बनाया; भिल्लम V ने देवगिरि को राजधानी बनाया और सिंघण II के समय राज्य अपने चरम विस्तार पर पहुँचा। इसलिए उपर्युक्त मूल तर्क को सबसे मजबूत और तथ्यात्मक रूप में ऐसे रखना बेहतर होगा: “भारतीय इतिहास को केवल ‘सदियों तक कुछ जातियाँ शासक और बाकी केवल शोषित’ की एकरेखीय कहानी में नहीं समेटा जा सकता। 

वास्तव में, गोंड, जाट, धनगर तथा अन्य कृषक-जनजातीय समुदायों से शक्तिशाली राज्य और शासक उभरे। लेकिन इन ऐतिहासिक उदाहरणों को आधुनिक SC/ST/OBC श्रेणियों में डालते समय प्रमाण और कालगत अंतर का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।” और एक महत्वपूर्ण बात यह कि SC के नाम पर 40–50 राजा गिनाकर संख्या पूरी करने की कोशिश मैं नहीं करूंगा, क्योंकि उससे सूची ऐतिहासिक रूप से कमजोर हो जाएगी। बेहतर है कि 30–40 ठोस प्रमाण वाले उदाहरण दिए जाएँ, बजाय 100 संदिग्ध नामों के।

आज की OBC/SC/ST संवैधानिक श्रेणियों को प्राचीन या मध्यकालीन राजाओं पर सीधे लागू करना ऐतिहासिक रूप से हमेशा सही नहीं है।

देखा जाए तो आज की OBC/SC/ST संवैधानिक श्रेणियों को प्राचीन या मध्यकालीन राजाओं पर सीधे लागू करना ऐतिहासिक रूप से हमेशा सही नहीं है। उदाहरण के लिए NCERT भी बताती है कि मौर्यों की सामाजिक उत्पत्ति विवादित रही है और प्राचीन भारत में राजनीतिक सत्ता केवल जन्म से क्षत्रिय होने पर निर्भर नहीं थी। इसलिए आगे मैं “आज की OBC/SC-ST सूचियों या समुदाय-परंपराओं से संबद्ध” शासकों को अलग-अलग स्तर की ऐतिहासिक निश्चितता के साथ दे रहा हूँ। फिर भी इसे “100 प्रमाणित OBC/SC/ST राजा” कहना उचित नहीं होगा।

पहला, अहोम/ताई-अहोम शासक — असम: अहोमों ने असम में लगभग छह शताब्दियों तक राज्य किया। प्रमुख शासकों में: 1. सुकाफा— असम, 2. सुतुफा— असम, 3. सुबिनफा— असम, 4. सुखांगफा— असम, 5. सुतुपफा— असम, 6. सुहुतफा— असम, 7. सुतोफा — असम, 8. सुहुनमुङ— असम, 9. सुक्लेनमुङ— असम, 10. सुकाम्फ— असम, 11. सुसेनफा/प्रताप सिंह— असम, 12. सुरम्फा— असम, 13. सुतिनफा— असम, 14. सुतामला/जयध्वज सिंह— असम, 15. सुपुंगमुङ/चक्रध्वज सिंह— असम, 16. सुपत्फा/गदाधर सिंह— असम, 17. सुखरुंगफा/रुद्र सिंह— असम, 18. सुतनफा/शिव सिंह— असम, 19. सुनेंफा/प्रमत्त सिंह— असम, 20. सुरम्फा/राजेश्वर सिंह— असम, 21. सुनेओफा/लक्ष्मी सिंह— असम, 22. सुहितपंगफा/गौरीनाथ सिंह— असम, 23. सुक्लिंगफा/कमलेश्वर सिंह— असम, 24. सुदिनफा/चंद्रकांत सिंह— असम और 25. पुरंदर सिंह— असम। इन अहोम राजाओं की लंबी सूची असम के ऐतिहासिक स्रोतों में मिलती है। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि अहोमों को सीधे आज की ST श्रेणी में रख देना भी सही नहीं होगा; क्योंकि उनकी वर्तमान संवैधानिक स्थिति और ऐतिहासिक पहचान अलग-अलग प्रश्न हैं।

दूसरा, गोंड शासक — मध्य भारत: गोंड राजवंश इस विषय में सबसे मजबूत आदिवासी/ST ऐतिहासिक उदाहरणों में आता है। इनमें 26. संग्राम शाह— गढ़ा-मंडला, मध्य प्रदेश, 27. दलपत शाह— गढ़ा-मंडला, 28. रानी दुर्गावती— गढ़ा-कटंगा/मंडला,29. चंद्र शाह— गढ़ा-मंडला, 30. मधुकर शाह— गढ़ा-मंडला, 31. प्रेम नारायण— गढ़ा-मंडला, 32. हृदय शाह— गढ़ा-मंडला, 33. नरेंद्र शाह— गढ़ा-मंडला, 34. निजाम शाह— गढ़ा-मंडला, 35. नरेन्द्र शाह— गढ़ा-मंडला, 36. सुमेर शाह— गढ़ा-मंडला, 37. शंकर शाह— गढ़ा-मंडला, 38. रघुनाथ शाह— गढ़ा-मंडला, 39. राजा भोज सिंह— देवगढ़ गोंड राज्य, 40. कोकशाह— देवगढ़, 41. जाटबा— देवगढ़, 42. कोंड्या शाह— देवगढ़, 43. गोंड राजा बख्त बुलंद शाह— देवगढ़, 44. चांद सुल्तान— देवगढ़, 45. राजा रघुजी— देवगढ़/नागपुर क्षेत्र। यहाँ “राजा” और “गोंड राजनीतिक नेतृत्व” का संबंध ऐतिहासिक रूप से अधिक स्पष्ट है; इसलिए इन्हें आधुनिक ST इतिहास के संदर्भ में रखना अपेक्षाकृत सुरक्षित है।

तीसरा, यादव/अहीर/सेउना परंपरा— महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्कन। आज उत्तर भारत में अहीर/यादव OBC सूची में आते हैं; उत्तर प्रदेश/बिहार की OBC सूची में Ahir/Yadav/Gwala आदि स्पष्ट रूप से शामिल हैं। 
46. दृढ़प्रहार— सेउना/यादव परंपरा, 47. सेउणचंद्र I — देवगिरि, 48. धाडियप्पा— दक्कन, 49. भिल्लम II — दक्कन, 50. सेउणचंद्र II— देवगिरि, 51. मल्लुगी— देवगिरि, 52. अमरगांगेय— देवगिरि, 53. भिल्लम V — देवगिरि, 54. जैतुगी I — देवगिरि, 55. सिंघण II — देवगिरि, 56. कृष्ण — देवगिरि, 57. महादेव — देवगिरि,
58. रामचंद्र — देवगिरि, और 59. शंकरदेव — देवगिरि।
लेकिन सावधानी यह बरतनी है कि “सेउना यादव” राजवंश को आधुनिक उत्तर भारतीय अहीर/OBC जाति के साथ हूबहू समान मानना इतिहासकारों के बीच निर्विवाद तथ्य नहीं है।

चौथा, होलकर/धनगर परंपरा — मालवा: धनगर समुदाय कई राज्यों में OBC श्रेणी से जुड़ा है और होलकर परिवार की उत्पत्ति धनगर समुदाय से मानी जाती है। 60. मल्हार राव होलकर — मालवा, 61. खंडेराव होलकर — मालवा,
62. अहिल्याबाई होलकर — मालवा/इंदौर, 63. तुकोजी राव होलकर I — मालवा, 64. काशीराव होलकर — इंदौर,
65. यशवंतराव होलकर I — मालवा, 66. मल्हार राव होलकर II — इंदौर, 67. मार्तंड राव होलकर — इंदौर,
68. हरि राव होलकर — इंदौर। अहिल्याबाई का उदाहरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—वह केवल “स्थानीय शासक” नहीं थीं बल्कि 18वीं शताब्दी की अत्यंत प्रभावशाली भारतीय शासक थीं।

पांचवां, जाट शासक— उत्तर भारत। उत्तर प्रदेश में जाट OBC सूची में हैं। 69. गोकुला— मथुरा/ब्रज, 70. राजाराम जाट— भरतपुर, 71. चूड़ामन— भरतपुर, 72. बदन सिंह— भरतपुर, 73. महाराजा सूरजमल— भरतपुर, 74. जवाहर सिंह— भरतपुर, 75. रतन सिंह— भरतपुर, 76. केहरी सिंह— भरतपुर, 77. रणजीत सिंह— भरतपुर, 78. रणधीर सिंह— भरतपुर। सूरजमल इस सूची का सबसे मजबूत उदाहरण हैं—18वीं शताब्दी में भरतपुर राज्य को एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति बनाया।

छठा, मराठा/कुनबी पृष्ठभूमि से जुड़े शासक: यहाँ भी सावधानी आवश्यक है। “मराठा” कोई एक सरल जातीय श्रेणी नहीं थी। आधुनिक महाराष्ट्र में Kunbi को OBC माना जाता है, जबकि “Maratha” की संवैधानिक स्थिति अलग राजनीतिक-कानूनी प्रश्न है। इतिहासकारों ने मराठा पहचान को विभिन्न सामाजिक समूहों के सम्मिश्रण के रूप में भी समझाया है।  79. छत्रपति शिवाजी महाराज— महाराष्ट्र, 80. संभाजी महाराज— महाराष्ट्र, 81. राजाराम महाराज— महाराष्ट्र, 82. शाहू महाराज— महाराष्ट्र, 83. ताराबाई— महाराष्ट्र, 84. शिवाजी II— कोल्हापुर, 85. राजर्षि शाहू महाराज— कोल्हापुर, 86. प्रतापसिंह भोसले — सतारा। इन सभी को “OBC राजा” कहना उचित नहीं होगा; क्योंकि इन्हें मराठा/कुनबी सामाजिक इतिहास की बहस में देखना चाहिए।

सातवां, कोली समुदाय से जुड़े शासक/स्थानीय राजवंश: 
कोली समुदाय के अनेक समूह विभिन्न राज्यों में OBC या अन्य पिछड़ा वर्ग सूचियों में आते हैं। 87. हिरजी कोली— गुजरात क्षेत्र, 88. भीमा कोली— गुजरात, 89. कोली शासक राणा पुंजा— मेवाड़/गुजरात सीमा क्षेत्र, 90. कोली राजा झुंझार सिंह— गुजरात क्षेत्र, 91. कोली राजा होथी— सौराष्ट्र क्षेत्र। इनमें से कई स्थानीय/क्षेत्रीय सत्ता केंद्र थे, इसलिए इन्हें “भारत के महान सम्राट” कहना अतिशयोक्ति होगी।

आठवां, मौर्य/शाक्य/कुशवाहा परंपरा: यह सबसे विवादास्पद लेकिन राजनीतिक रूप से सबसे अधिक उद्धृत क्षेत्र है। 92. चंद्रगुप्त मौर्य— मगध/मौर्य साम्राज्य, 93. बिंदुसार— मौर्य साम्राज्य, 94. अशोक— मौर्य साम्राज्य, 95. कुणाल— मौर्य परंपरा, 96. दशरथ मौर्य— मौर्य साम्राज्य, 97. सम्प्रति— मौर्य साम्राज्य,
98. शालिशुक— मौर्य साम्राज्य, 99. देववर्मन— मौर्य साम्राज्य,100. शतधन्वन— मौर्य साम्राज्य, और 101. बृहद्रथ— मौर्य साम्राज्य। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मौर्यों की सामाजिक उत्पत्ति स्वयं प्राचीन स्रोतों में विवादित है। NCERT के अनुसार बौद्ध परंपराएँ उन्हें क्षत्रिय बताती हैं, जबकि कुछ ब्राह्मणical ग्रंथ उन्हें निम्न उत्पत्ति का बताते हैं। इसलिए चंद्रगुप्त या अशोक को सीधे आधुनिक “OBC” कहना प्रमाणित ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं है। 

लेकिन SC के मामले में तस्वीर बिल्कुल अलग है। इन 100 राजाओं की सूची बनाते समय “SC” श्रेणी जोड़ना इतिहास की दृष्टि से सबसे कठिन हिस्सा है। क्यों? क्योंकि Scheduled Castes की संवैधानिक सूची आधुनिक भारत की व्यवस्था है। प्राचीन/मध्यकालीन शासकों को आज की SC सूची से जोड़ने के लिए समकालीन अभिलेखीय प्रमाण चाहिए। केवल किसी आधुनिक जातीय संगठन की परंपरा या सोशल मीडिया सूची पर्याप्त नहीं है।

इसलिए “भारत में 100 OBC और SC-ST राजा हुए” कहना एक राजनीतिक/सामाजिक दावा हो सकता है, लेकिन इसे 100 प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। फिर भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सामने आता है, जो ऊपर में चर्चा किया जा चुका है।

इस यह सवाल यहां मौजूं है कि आखिर OBC व SC-ST के गौरवशाली इतिहास को छिपाकर उन्हें मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर EWS (सवर्णों) के खिलाफ भड़काने वाले लोग कौन हैं? ऐसे भारत द्रोहियों को पहचानना और उनका ठोस इलाज करना राष्ट्रहित में है। ये सामाजिक कोढ़ हैं, जिनसे बचना भी जरूरी है।

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