आखिर 21वीं सदी की भारतीय सरकार कैसी होनी चाहिए?
आखिर 21वीं सदी की भारतीय सरकार कैसी होनी चाहिए?
After all, what should the Indian government of the 21st century be like?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
जब केंद्र या राज्यों की मौजूदा सरकारें अपनी 'तुगलकी नीतियों' से समाज के एक बड़े वर्ग यानी बुद्धिजीवियों पर बोझ प्रतीत होने लगी हों, तो फिर प्रबुद्ध लोगों के दिलोदिमाग में यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक है कि आखिर 21वीं सदी की भारतीय सरकार कैसी होनी चाहिए? मेरे विचार से 21वीं सदी की भारतीय सरकार का लक्ष्य “बड़ी सरकार” या “छोटी सरकार” नहीं, बल्कि “सक्षम, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित सरकार” होना चाहिए।
ऐसा इसलिए कि भारत जैसे विशाल और विविध देश में सरकार को एक साथ सुरक्षा, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, रोजगार, शिक्षा और अवसर सुनिश्चित करने हैं। इसलिए इसका मॉडल कुछ ऐसा होना चाहिए:
पहला, सरकार कम नहीं—स्मार्ट हो: जहां सरकार की जरूरत है वहां पर्याप्त स्थायी कर्मचारी हों—पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा, न्याय, रक्षा, नियमन, वैज्ञानिक अनुसंधान और संवेदनशील प्रशासन में। जहां तकनीक काम आसान कर सकती है वहां automation और AI का उपयोग हो।
और केवल non-core सेवाओं में उचित सीमा तक outsourcing हो। सिद्धांत: “Right people, right place, right technology.”
दूसरा, रोजगार नीति को राष्ट्रीय नीति बनाया जाए: सरकारी भर्ती को अलग-अलग परीक्षाओं का विषय नहीं, राष्ट्रीय मानव-संसाधन योजना बनाया जाए। हर वर्ष सरकार बताए कि- कितने पद स्वीकृत हैं, उनमें कितने भरे हैं और कितने रिक्त हैं, कितने पद समाप्त किए गए, कितने outsource किए गए और अगले वर्ष कितनी भर्ती होगी? क्योंकि लंबे समय तक vacancy रखना भी प्रशासनिक विफलता माना जाए।
तीसरा, सरकारी नौकरी को विशेषाधिकार नहीं, सार्वजनिक सेवा बनाया जाए: स्थायी नौकरी का अर्थ केवल job security नहीं होना चाहिए। इसके साथ performance + accountability + continuous training + ethical standards भी अनिवार्य हों। अर्थात कर्मचारी को सुरक्षा मिले, लेकिन जनता को भी सेवा की गारंटी मिले।
चौथा, निजी रोजगार को सरकारी नौकरी का कमजोर विकल्प न रहने दिया जाए: यह बहुत बड़ा सुधार होगा।
युवा यह महसूस करे: “सरकारी नौकरी मिले तो अच्छा; नहीं मिले तो निजी क्षेत्र में भी सम्मानजनक भविष्य है।” इसके लिए चाहिए: बेहतर wages, social security, skill development, apprenticeships, transparent contracts, workplace protection and career mobility. यानी कि भारत को सरकारी नौकरी के लिए करोड़ों युवाओं की अंतहीन प्रतियोगिता से बाहर निकालना होगा।
पांचवां , शिक्षा → कौशल → रोजगार की एक ही श्रृंखला हो:विश्वविद्यालयों को केवल graduates पैदा करने की मशीन नहीं होना चाहिए। हर बड़े शिक्षा कार्यक्रम का मूल्यांकन इस आधार पर हो: कितने विद्यार्थी निकले → कितनों को रोजगार मिला → किस वेतन पर मिला → पांच साल बाद उनकी स्थिति क्या है?
छठा, AI युग की सरकार: AI सरकारी कर्मचारियों को हटाने का हथियार नहीं, उत्पादकता बढ़ाने का साधन होना चाहिए। Routine paperwork मशीन करे। मानवीय निर्णय—जहां न्याय, संवेदना और विवेक चाहिए—मानव के पास रहें। और जिन jobs पर AI का प्रभाव पड़े, उनके लिए reskilling और redeployment हो।
सातवां, भ्रष्टाचार के बजाय प्रक्रिया को सुधारना: हर काम के लिए नया कानून बनाने से ज्यादा जरूरी है सरकारी प्रक्रिया सरल करना। जहां संभव हो: कम forms → कम approvals → कम human discretion → ज्यादा digital tracking → ज्यादा transparency. यही corruption के अवसर कम करेगा।
आठवां, सामाजिक न्याय का केंद्र “वंचित व्यक्ति” हो:
आरक्षण और affirmative action की संवैधानिक व्यवस्था अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन सामाजिक न्याय का लक्ष्य केवल जातीय प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके साथ गरीबी + शिक्षा + क्षेत्रीय पिछड़ापन + सामाजिक वंचना + आर्थिक अवसर को भी नीति में पर्याप्त महत्व मिले।
नौवां, सांसद और विधायक भी accountability से बाहर न हों: लोकतंत्र में प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता। जनता को नियमित रूप से पता चलना चाहिए: सांसद/विधायक ने कितने दिन सदन में भाग लिया, कितने प्रश्न पूछे, कितनी समितियों में काम किया, अपने क्षेत्र के लिए क्या परिणाम हासिल किए,
सार्वजनिक धन का कितना उपयोग हुआ, क्योंकि
लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं—निरंतर accountability है।
दसवां, सबसे महत्वपूर्ण—राज्य नागरिक को “लाभार्थी” नहीं, “अधिकार-संपन्न नागरिक” माने: सरकार की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि उसने कितनी योजनाएं घोषित कीं। बल्कि क्या बच्चे को अच्छी शिक्षा मिली? क्या युवा को अवसर मिला? क्या बीमार व्यक्ति को इलाज मिला? क्या किसान को उचित बाजार मिला? क्या महिला सुरक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुई? क्या उद्यमी बिना अनावश्यक लालफीताशाही के व्यवसाय कर पाया? क्या सामान्य नागरिक को न्याय समय पर मिला?
अंततः 21वीं सदी की भारतीय सरकार का सूत्र होना चाहिए: छोटी सरकार नहीं—सक्षम सरकार, बड़ी नौकरशाही नहीं—उत्पादक नौकरशाही, अंधी outsourcing नहीं—जवाबदेह outsourcing, सिर्फ सरकारी रोजगार नहीं—संपूर्ण रोजगार अर्थव्यवस्था,
सिर्फ कल्याण नहीं—अवसर और आत्मनिर्भरता,
सिर्फ कानून नहीं—न्यायपूर्ण और तेज implementation, सिर्फ चुनाव नहीं—लगातार लोकतांत्रिक accountability, और इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य शायद यही है कि 21वीं सदी की भारतीय सरकार वह नहीं होगी जो सबसे ज्यादा लोगों को नियंत्रित करे; वह होगी जो सबसे ज्यादा भारतीयों को अपनी क्षमता विकसित करने और सम्मानजनक जीवन बनाने में सक्षम बनाए। यही “कम सरकार, अधिक शासन” से आगे का मॉडल है—“सक्षम सरकार, सक्षम नागरिक और समान अवसर वाला भारत।”
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