विभिन्न युद्धों में उलझे देशों को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस से प्रेरणा लेनी चाहिए


विभिन्न युद्धों में उलझे देशों को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस से प्रेरणा लेनी चाहिए 
       (अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2अक्टूबर पर विशेष)

"भारत के लिए यह दिवस अपनी ऐतिहासिक विरासत के कारण विशेष महत्व रखता है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को केवल व्यक्तिगत नैतिकता नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के साधन के रूप में प्रयोग किया। उनके आंदोलनों ने दिखाया कि बड़े पैमाने पर नागरिक भागीदारी हिंसा के बिना भी राजनीतिक परिवर्तन के लिए दबाव बना सकती है।"

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्मतिथि 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में  मनाने का निर्णय लिया। इसका मूल संदेश है कि संघर्षों का समाधान हिंसा के बजाय संवाद, समझ, न्याय और शांतिपूर्ण साधनों से खोजा जाए।  जब दुनिया के कई हिस्से सशस्त्र संघर्षों, हिंसा और मानवीय संकटों से जूझ रहे हैं,  तो ऐसे समय में यह दिवस और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
भारत के लिए यह दिवस अपनी ऐतिहासिक विरासत के कारण विशेष महत्व रखता है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को केवल व्यक्तिगत नैतिकता नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के साधन के रूप में प्रयोग किया। उनके आंदोलनों ने दिखाया कि बड़े पैमाने पर नागरिक भागीदारी हिंसा के बिना भी राजनीतिक परिवर्तन के लिए दबाव बना सकती है।
लेकिन आज की दुनिया में गांधी के विचारों को केवल स्मरण करने के बजाय उन्हें आधुनिक परिस्थितियों से जोड़ना अधिक उपयोगी होगा—जैसे संघर्ष-निवारण, शांति शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, नागरिक संवाद और डिजिटल दुनिया में जिम्मेदार व्यवहार।
सवाल है कि आज इसकी प्रासंगिकता क्यों बढ़ गई है?

एक, युद्ध का सबसे बड़ा भार आम नागरिक उठाते हैं: सशस्त्र संघर्ष केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहते। नागरिकों का विस्थापन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान तथा आजीविका का नुकसान लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है। अहिंसा का सिद्धांत नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखने की याद दिलाता है।
दो, अहिंसा का अर्थ निष्क्रियता नहीं है: गांधी की अहिंसा को केवल हिंसा से दूर रहना समझना अधूरा होगा। इसमें अन्याय का विरोध करते हुए शांतिपूर्ण जनभागीदारी, सत्य, संवाद और नैतिक दबाव जैसे साधन शामिल हैं।

तीन, बातचीत के रास्ते खुले रखना जरूरी है: युद्ध की स्थिति में भी संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद हो जाने पर संघर्ष लंबा खिंच सकता है। मध्यस्थता, बातचीत, मानवीय सहायता और विश्वास-निर्माण के प्रयास शांति की संभावनाएँ बनाए रखते हैं।

चार, हिंसा केवल युद्धक्षेत्र में नहीं होती: घरेलू हिंसा, सामुदायिक तनाव, नस्लीय या धार्मिक घृणा, ऑनलाइन नफरत और राजनीतिक हिंसा भी समाज को विभाजित करती हैं। अहिंसा का संदेश इन सभी स्तरों पर लागू किया जा सकता है।

पांच, बच्चों और युवाओं के लिए विशेष महत्व: स्कूलों में अहिंसा का अर्थ केवल "लड़ाई मत करो" बताना नहीं होना चाहिए। बच्चों को मतभेद सुलझाना, दूसरे की बात सुनना, असहमति का सम्मान करना और संवाद से समाधान निकालना सिखाना इसके अधिक उपयोगी रूप हैं।

# दुनिया के लिए पांच व्यावहारिक अहिंसात्मक संदेश

एक, अहिंसक दृष्टिकोण की चुनौती: युद्ध संवाद, मध्यस्थता और शांति वार्ता के जरिए समाप्त किया जा सकता है।

दो, सामुदायिक तनाव : परस्पर संवाद और विश्वास निर्माण बहाल करके सामुदायिक तनाव को कम किया जा सकता है।

तीन, घृणा भाषण : तथ्य, संयम और जिम्मेदार अभिव्यक्ति ही घृणा भाषण पर रोक लगा सकती है।

चार, राजनीतिक मतभेद: संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ में राजनीतिक मतभेदों को ज्यादा तूल नहीं देना।

पांच, सामाजिक अन्याय : शांतिपूर्ण जनभागीदारी और वैधानिक आंदोलन को मजबूती प्रदान करना।

# अहिंसा का मूल संदेश क्या है?

अहिंसा का अर्थ अन्याय के सामने चुप रहना नहीं है; बल्कि इसका अर्थ अन्याय का विरोध ऐसे साधनों से करना है जो मानव जीवन और गरिमा को नष्ट किए बिना परिवर्तन की संभावना पैदा करें। आज 
युद्धों से घिरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस हमें यह प्रश्न पूछने का अवसर देता है—क्या हम हर विवाद में पहले हिंसा की संभावना तलाशते हैं, या बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान की संभावना? यही इस दिवस की सबसे महत्वपूर्ण समकालीन प्रासंगिकता है। यह प्रश्न वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस का केंद्रीय संदेश बन सकता है। “क्या हम हर विवाद में पहले हिंसा की संभावना तलाशते हैं, या बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान की संभावना?”

इसका उत्तर केवल सरकारों या सेनाओं से नहीं, हम सभी से जुड़ा है। परिवार में मतभेद हो, समाज में विवाद हो या देशों के बीच तनाव—पहली प्रतिक्रिया यदि आरोप, बदला और टकराव के बजाय संवाद, संयम और समाधान हो, तो हिंसा की संभावना कम की जा सकती है।

# अहिंसा: अन्याय का विरोध भी ऐसे साधनों से किया जाए जो मानव जीवन, गरिमा और भविष्य को बचाए रखें

अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए। इसका अर्थ है कि अन्याय का विरोध भी ऐसे साधनों से किया जाए जो मानव जीवन, गरिमा और भविष्य को बचाए रखें। आज की दुनिया के लिए इसे पाँच शब्दों में कहा जा सकता है: संवाद, समझ, विश्वास, समझौता और शांति। और गांधी के विचारों से प्रेरित एक आधुनिक संदेश हो सकता है: “विवाद का पहला हथियार शब्द हों, हथियार नहीं; समाधान का पहला रास्ता संवाद हो, संघर्ष नहीं।”

# लेखक
कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक 

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